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मक्खियों से छुटकारा

जब राजा गोपीचन्द और भरथरी योगी हुए तो लोग भेड़ों की तरह उनके पीछे लग गये| लोगों का ख़याल था कि जो राज छोड़कर योगी बने हैं, वे कुछ करनीवाले होंगे और उनकी इच्छाएँ पूरी कर देंगे| इनमें से परमार्थ का सच्चा ग्राहक तो कोई विरला ही होता, नहीं तो वे जहाँ जाते उनसे कोई बेटा माँगता, कोई बेटी माँगता, कोई कुछ माँगता तो कोई कुछ| रजा गोपीचन्द ने मन में कहा कि इस मान-बड़ाई को तो पहले ही छोड़कर आये हैं, यह अब फिर पीछे लग गयी| यह सोचकर वे शहर से बहार एक कुम्हार के घर में ठहर गये और भजन-सुमिरन करने लगे| अब जहाँ इत्र होता है, खुशबू भी आती है| पहले पड़ोसियों को ख़बर हुई कि यहाँ दो महात्मा आये हुए हैं, फिर औरों को पता चला| इसके बाद शहर में बात फैल गयी और धीरे-धीरे वहाँ के राजा के कानों तक जा पहुँची कि शहर में दो महात्मा ठहरे हुए हैं| राजा ने कहा, चलो दर्शन करें| जब राजा चला तो अमीर, वज़ीर, अहलकार और बहुत सारी प्रजा भी साथ हो गयी| दर्शनों को आ रहे बहुत-से लोगों का शोर सुनकर भरथरी ने कुम्हार से पूछा कि यह शोर कैसा है? उसने कहा कि राजा आपके दर्शनों को आ रहा है और साथ में प्रजा है| भरथरी और गोपीचन्द ने कहा कि यह तो बहुत बुरा हुआ| सोचने लगे कि अब क्या करें? ये मक्खियाँ किस तरह हटायी जायें? आख़िर एक उपाय मन में आया| आपस में सलाह करके चुप हो गये|

इतने में राजा और प्रजा, सब आ गये| जब अपनी-अपनी जगह पर बैठ गये तो इंतज़ार होने लगा कि अब महात्मा आयेंगे और ज्ञान-वार्ता करेंगे| उधर एक महात्मा उठा और कहने लगा कि आक भिक्षा माँगने में जाऊँगा| दूसरे ने कहा कि कल तू गया था और भिक्षा में मिला सारा हलवा अकेले ही खा गया था| पहले ने कहा कि क्या परसों तूने माल-पूए नहीं खाये थे? दूसरे ने कहा कि चार दिन पहले तूने खीर नहीं खायी थी? एक ने डण्डा पकड़ लिया, दूसरे ने फावड़ी उठा लो, आपस में लड़ने लगे| राजा ने कहा कि ये अच्छे महात्मा हैं जो खाने पर ही लड़ पड़े हैं! चलो चलें| लोगों ने हँसकर तालियाँ बजायीं और सब अपने-अपने घर आ गये|

उन महात्माओं ने कहा कि अब चैन मिल गया, मक्खियाँ उड़ गयीं|

हे प्रियतम| तेरे सिवाय मैं किसी दूसरे के बारे में सोच भी नहीं
सकता| तेरे प्यार में मुझे किसी दूसरे की परवाह नहीं है| मेरे
दिल में तू-ही-तू बस गया है| इसमें किसी और के लिए जगह
नहीं है| (पीरे हरात)

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