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धर्मदास का भोज

धर्मदास एक अमीर व्यापारी था और कबीर साहिब के काफ़ी निकट था क्योंकि पिछले कई जन्मों में भी उन का साथी रह चुका था| कबीर साहिब उसे मुक्त करना चाहते थे| एक दिन जब धर्मदास ठाकुरों की पूजा कर रहा था तो कबीर साहिब वहाँ प्रकट होकर उसके पीछे खड़े हो गये| जब वह पूजा कर चुका तो कबीर साहिब उसके ठाकुरों की ओर इशारा करके बोले, “ये जो बड़े हैं ये तो दो सेर के बाट होंगे और जो छोटे-छोटे हैं, वे क्या हैं – छटाँके?” यह सुनकर धर्मदास को बहुत ग़ुस्सा आया कि कबीर साहिब ठाकुरों की बेईज्ज़ती कर रहे हैं| फिर बोले, “बताओ ये कभी बोले भी हैं?” यह कहकर आप अलोप हो गये| अब धर्मदास ने विचार किया कि बोले तो कभी नहीं, बात तो ठीक है, मुझे कितना वक़्त हो गया पूजा करते|

कुछ दिनों के बाद कबीर साहिब साधु के वेश में धर्मदास के घर गये| उस समय धर्मदास एक चूल्हे में आग जला रहा था और उसकी पत्नी आमना उसके पास बैठी थी| कबीर साहिब ने कहा, “धर्मदास! तुम बड़े पापी हो| तुम जीवों की हत्या करते हो” अब स्त्री अपने पति की निन्दा नहीं सुन सकती| उसने कहा, “तू पापी होगा, मेरा पति कैसे पापी है? तूने उसका क्या पाप देखा है?” कबीर साहिब ने कहा, “धर्मदास! तुम जो यह लकड़ी जला रहे हो उसको ज़रा फाड़कर देखो|” जब फाड़कर देखा तो उसके अन्दर से ज़िन्दा और जले हुए सैकड़ों कीड़े निकले| कबीर साहिब ने कहा, “देखो, तुमने कितने जीव जलाये हैं, यह पाप नहीं तो और क्या है?” यह कहकर आप फिर अलोप हो गये|

धर्मदास ने सोचा कि बात तो सच्ची कही है| एक दिन पहले भी यह साधु मिला था| अगर मेरी स्त्री नाराज़ न होती तो मैं उससे परमात्मा के घर का रास्ता पूछता|

अपने ऊपर इलज़ाम न लेने की ग़रज़ से धर्मदास की पत्नी ने उससे कहा, “आपके पास करोड़ों रुपये हैं, यज्ञ करें| वह ख़ुद ही यज्ञ में आ जायेगा| साधुओं की क्या कमी है, गुड़ पर मक्खियाँ तो आती हैं हैं|”

धर्मदास ने काशी में कई यज्ञ किये| लेकिन कबीर साहिब वहाँ न आये| दूसरी जगह किये, लेकिन कबीर साहिब न आये| गंगा के पास यज्ञ किये, लेकिन कबीर साहिब को न ही आना था और न ही आये| ज्यों-ज्यों धर्मदास यज्ञों पर रुपया ख़र्च करता गया, उसके दिल में कबीर साहिब से मिलने की तड़प बढ़ती गयी, मगर कबीर साहिब न आये|

धर्मदास ने अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर यज्ञों में लगा दी, लेकिन फिर भी कबीर साहिब ना आये| जब सारा रुपया ख़र्च हो गया और कबीर साहिब भी न आये तो बहुत निराश हुआ| हारकर बोला, रुपया भी गया, साधु भी न मिला, अब घर जाकर क्या करूँगा, यमुना नदी में डूबकर मर जाऊँ| सोचा, अगर आबादी के नज़दीक डूबकर मरूँगा तो लोग पकड़कर निकाल लेंगे| चलो कहीं दूर जाकर डूब मरें| जब बस्ती से दूर गया तो आगे कबीर साहिब बैठे थे| चरणों पर गिर पड़ा| बोला कि मैंने आपके लिए यह किया, वह किया| कबीर साहिब ने कहा, “देख धर्मदास! मैं इसलिए नहीं आया कि जब तक तुम्हारा धन से मोह था तुम नाम की दीक्षा के योग्य नहीं थे और अगर मैं पहले आकर मिलता तो तू कहता यह लालची है| तेरी स्त्री ने भी कहा था कि ‘गुड़ पर मक्खियाँ बहुत|’ अब मैं तुझे वह चीज़ दूँगा, जो कभी नष्ट नहीं होगी|” आख़िर उसे रूहानी दौलत से मालामाल कर दिया| वही धर्मदास फिर कबीर साहिब की गद्दी पर बैठा|

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