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बेदाग़ दाढ़ी

एक स्त्री थी| उसके रिश्तेदारों में एक अच्छा कमाई वाला महात्मा था| कुछ तो कमाई और कुछ बेफ़िक्री और बेपरवाही के फलस्वरूप उसके चेहरे पर हमेशा रौनक़ और ख़ुशी रहती थी| उसकी शोभायमान दाढ़ी थी जिसे वह कई वर्षों से पाल रहा था| एक दिन उस स्त्री ने पूछा, “तेरे मुँह पर यह क्या है? दाढ़ी है या झाड़ी?” वह महात्मा चुप रहा| इसी प्रकार वह औरत अकसर उसे चिढ़ाती रहती क्योंकि उसने किसी की इतनी सुन्दर दाढ़ी नहीं देखी थी पर वह महात्मा ख़ामोश रहता| जब उसकी मौत का समय निकट आया तो उसने उस स्त्री को बुलवाया| वह औरत सामने आयी तो महात्मा ने उससे कहा, “अब वह बात पूछो|” उसने आदेश का पालन करते हुए पूछा, “आपके मुँह पर क्या है? दाढ़ी है कि झाड़ी?” महात्मा ने उत्तर दिया, “अब मैं इस स्थिति में हूँ कि तुझे बता सकूँ|” आज मेरे मुँह पर दाढ़ी है और मैं इसको बेदाग़ और पवित्र लेकर जा रहा हूँ|” वह कहने लगी, “उस वक़्त क्यों नहीं बताया? इतने साल चुप क्यों रहे?” महात्मा ने स्नेहपूर्वक कहा, “बहन, मन का कुछ पता नहीं| इसका क्या भरोसा कि कब गिरा दे| इनसान को ज़िन्दगी में कभी गर्व नहीं करना चाहिए|”

दुनिया में दम मारने की गुंजाइश नहीं है|

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