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सिंदबाद जहाजी की पहली यात्रा (अलिफ लैला) – शिक्षाप्रद कथा

सिंदबाद जहाजी की पहली यात्रा (अलिफ लैला) - शिक्षाप्रद कथा

खलीफा हारूं रशीद के शासन काल में एक गरीब मजदूर रहता था, जिसका नाम हिन्दबाद था| एक दिन जब बहुत गरमी पड़ रही थी, वह एक भारी बोझ उठाकर शहर के एक भाग से दूसरे भाग में जा रहा था| रास्ते में थककर वह एक बड़े-से घर की दीवार के साए में सुस्ताने के लिए बैठ गया|

उस घर से इत्र, फुलेल और नाना प्रकार की अन्य सुगंधियां आ रही थीं| इसके साथ ही एक ओर से पक्षियों का मनोहारी कलरव सुनाई दे रहा था और दूसरी ओर जहां रसोईघर था, वहां से नाना प्रकार के व्यंजनों के पकने की सुगंध आ रही थी| उसने सोचा कि यह तो किसी बहुत बड़े आदमी का मकान मालूम होता है| जानना चाहिए कि किसका है?

मकान के दरवाजे से कई सेवक आ जा रहे थे| मजदूर ने उनमें से एक से पूछा कि इस मकान का स्वामी कौन है?

सेवक ने कहा, “बड़े आश्चर्य की बात है कि तू बगदाद का निवासी है और इस मकान के परम प्रसिद्ध मालिक को नहीं जानता| यह घर सिंदबाद जहाजी का है, जो लाखों-करोड़ों की संपत्ति का मालिक है|”

हिन्दबाद ने यह सुनकर आकाश की ओर हाथ उठाए और कहा, “हे संसार को बनाने और उसको पालने वाले भगवान! यह क्या अन्याय है| एक सिंदबाद है जो रात-दिन ऐश करता है, एक मैं हूं हिन्दबाद जो रात-दिन जी तोड़ परिश्रम करके किसी प्रकार अपने स्त्री-बच्चों का पेट पालता हूं| हम दोनों ही मनुष्य है, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों है?” यह कहकर उसने जैसे भगवान पर अपना रोष प्रकट करने के लिए पृथ्वी पर पांव पटका और सिर हिलाकर निराशापूर्वक अपने दुर्भाग्य पर दुख व्यक्त करने लगा|

इतने में उस विशाल भवन का एक सेवक निकला और उसकी बांह पकड़कर बोला, “चल अंदर! हमारे मालिक सिंदबाद ने तुझे बुलाया है|”

हिन्दबाद यह सुनकर डरा| उसने सोचा कि मैंने जो कहा है, उसे जरूर सिंदबाद ने सुन लिया है और क्रुद्ध होकर मुझे बुला भेजा है, ताकि मुझे गुस्ताखी के लिए सजा दे| वह घबराकर कहने लगा, “मैं अंदर नहीं जाऊंगा| मेरा बोझ यहां पड़ा है, इसे कोई उठा ले जाएगा|”

किंतु सेवकों ने उसे न छोड़ा| उन्होंने कहा, “तेरे बोझ को हम सुरक्षापूर्वक अंदर रख देंगे और तुझे भी कोई नुकसान नहीं होगा|”

सेवक हिन्दबाद को कई अंगनों से होता हुआ एक बड़ी-सी दालान में ले गया, जहां बहुत-से लोग भोजन करने के लिए बैठे थे| नाना प्रकार के व्यंजन वहां रखे थे और इन सबके बीच में एक शानदार आदमी, जिसकी सफेद दाढ़ी छाती पर लटकी थी, बैठा था| उसके पीछे सेवकों का पूरा समूह हाथ बांधे खड़ा था| सिंदबाद ने उसके फटे और मैले कपड़ों पर ध्यान न दिया और प्रसन्नतापूर्वक उसके सवाल का जवाब दिया और अपनी दाहिनी ओर बिठाकर उसके सामने अपने हाथ से उठाकर स्वादिष्ट खाद्य और मदिरा पात्र रखा|

जब सिंदबाद ने देखा कि सभी उपस्थित जन भोजन कर चुके है तो उसने हिन्दबाद की ओर फिर ध्यान दिया| उस समय बगदाद में जन किसी को सम्मानपूर्वक बुलाना होता था तो उसे ‘अरबी’ कहते थे| सिंदबाद ने हिन्दबाद से कहा, “अरबी! तुम्हारा नाम क्या है? मैं और यहां उपस्थित अन्य जन तुम्हारी यहां पर उपस्थिति से अति प्रसन्न हैं| अब मैं चाहता हूं कि तुम्हारे मुंह से फिर वे बातें सुनूं जो तुमने गली में बैठे हुए कही थीं|” सिंदबाद जहां बैठा था, वह भाग गली से लगा हुआ था और खुली खिड़की से उसने वह सबकुछ सुन लिया था, जो हिन्दबाद ने रोष की दशा में कहा था|

सिंदबाद ने लज्जा से सिर नीचा कर लिया और कहा, “सरकार! उस समय मैं थकान और गरमी के कारण आपे में नहीं था| मेरे मुंह से ऐसी दशा में कुछ अनुचित बातें निकल गई थीं| इस सभा में उन्हें दुहराने की गुस्ताखी मैं नहीं करना चाहता| आप कृपया मेरी इस उद्दंडता को क्षमा कर दें|”

सिंदबाद ने कहा, “भाई! मैं कोई अत्याचारी नहीं हूं, जो किसी को बिना कारण हानि पहुंचाऊं| मुझे तुम्हारी बातों पर क्रोध नहीं, बल्कि दया ही आई थी और तुम्हारी दशा देखकर और भी दुख हुआ| लेकिन मेरे भाई, तुमने गली में बैठकर जो कुछ कहा, उससे तुम्हारा अज्ञान ही प्रकट होता है| तुम समझते होगे कि यह धन-दौलत और यह ऐशो-आराम मुझे बगैर कुछ किए-धरे मिल गया है, ऐसी बात नहीं है| मैंने संसार में जितनी विपत्तियां किसी पर पड़ सकती थीं, लगभग सभी झेली हैं| इसके बाद भगवान ने मुझे आराम की यह सामग्री दी हैं|”
फिर सिंदबाद ने दूसरे मेहमानों को सुनाकर कहा, “मुझ पर विगत वर्षों में बड़ी-बड़ी मुसीबतें आईं और बड़े-बड़े विचित्र अनुभव हुए| मेरी कहानी सुनकर आप लोगों को घोर आश्चर्य होगा| मैंने धन प्राप्त करने के निमित्त सात बार बड़ी-बड़ी यात्राएं की और बड़े दुख और कष्ट उठाए| आप लोग चाहें तो मैं वह सब सुनाऊं|”

मेहमानों ने कहा, “जरूर सुनाइए!”

सिंदबाद ने अपने सेवकों से कहा, “वह बोझ, जो हिन्दबाद बाजार से अपने घर लिए जा रहा था, उसके घर पहुंचा दो|”

उन्होंने ऐसा ही किया| अब सिंदबाद ने अपनी यात्रा का वृत्तांत कहना आरंभ किया|

“मैंने अच्छी-खासी पैतृक संपत्ति पाई थी, किंतु मैंने नौजवानों की मूर्खताओं के वश में पड़कर उसे भोग-विलास में उड़ा डाला| मेरे पिता जब जीवित थे, तो कहते थे कि निर्धनता की अपेक्षा मृत्यु श्रेयस्कर है| सभी बुद्धिमानों ने ऐसा कहा है| मैं इस बात को बार-बार सोचता और मन-ही-मन अपनी दुर्दशा पर रोता|

अंत में जब निर्धनता मेरी सहनशक्ति के बाहर हो गई तो मैंने अपना बचा-खुचा सामान बेच डाला और जो पैसा मिला, उसे लेकर समुद्री व्यापारियों के पास पहुंच गया| मैंने उनसे कहा कि अब मैं भी व्यापार के लिए निकलना चाहता हूं| उन्होंने मुझे व्यापार के बारे में बड़ी अच्छी सलाह दी| उनके अनुसार मैंने व्यापार की वस्तुएं मोल ले लीं और उन्हें लेकर उनमें से एक व्यापारी के जहाज पर किराया देकर सामान लादा और खुद सवार हो गया| जहाज अपनी व्यापार यात्रा पर चल पड़ा|

जहाज फारस की खाड़ी में से होकर फारस देश में पहुंचा, जो अरब के बाईं ओर बसा है और हिंदुस्तान के पश्चिम की ओर| फारस की खाड़ी लंबाई में ढाई हजार मील और चौड़ाई में सत्तर मील थी| मुझे समुद्री यात्रा का अभ्यास नहीं था, इसलिए कई दिनों तक मैं समुद्री बिमारी से ग्रस्त रहा, फिर अच्छा हो गया| रास्ते में हमें कई टापू मिले, जहां हम लोगों ने माल खरीदा और बेचा|

एक दिन हमारे जहाज ने एक अज्ञात द्वीप पर लंगर डाला| जहाज के मालिक ने कहा, “जिन लोगों का जी चाहे, वे इस द्वीप की सैर कर आएं|”

मैं और कई अन्य व्यापारी जो जहाज पर बैठे-बैठे ऊब गए थे, खाने का सामान लेकर उस द्वीप पर नाव द्वारा चले गए| किंतु वह द्वीप उस समय हिलने लगा, जब हमने खाना पकाने के लिए आग जलाई| यह देखकर व्यापारी चिल्लाने लगे, “भागकर जहाज पर चलो| यह टापू नहीं, एक बड़ी मछली की पीठ है!”

सब लोग कूद-कूदकर जहाज की छोटी नाव पर बैठ गए| मैं अनाड़ी होने के कारण ऐसा न कर सका| नाव जहाज की ओर चल पड़ी| इधर मछली ने, जो हमारे आग जलाने से जाग गई थी, पानी में गोता लगाया| मैं समुद्र में बहने लगा| मेरे हाथ में सिर्फ एक लकड़ी थी, जिस मैं जलाने के लिए लाया था| उसी के सहारे समुद्र में तैरने लगा| मैं जहाज तक पहुंच पाऊं, इससे पहले ही जहाज लंगर उठाकर चल दिया|

मैं पूरा एक दिन और एक रात उस अथाह जल में तैरता रहा| थकान ने मेरी सारी शक्ति निचोड़ ली और मैं तैरने के लिए हाथ-पांव चलाने योग्य नहीं रहा| मैं डूबने ही वाला था कि बड़ी समुद्री लहर ने मुझे उछालकर किनारे पर फेंक दिया| किंतु किनारा समतल नहीं था, बल्कि खड़े ढलवान का था| मैं किसी प्रकार गिरता-पड़ता, वृक्षों की शाखाएं पकड़ता हुआ ऊपर पहुंचा और मुर्दे की भांति जमीन पर गिर पड़ा|

जब सूर्योदय हुआ तो मेरा भूख से बुरा हाल हो गया| पैरों में चलने की शक्ति नहीं थी, इसलिए घुटनों के बल घिसटता हुआ चला| सौभाग्य से कुछ ही दूर पर मुझे मीठे पानी का एक सोता मिला, जिसका पानी पीकर मुझे जान आई| मैंने तलाश करके कुछ मीठे फल और खाने लायक पत्तियां भी पा लीं और उनसे पेट भर लिया| फिर मैं द्वीप में इधर-उधर घूमने लगा| मैंने एक घोड़ी चरती देखी| घोड़ी बहुत सुंदर थी, किंतु पास जाकर देखा तो पाया कि वह एक खूंटे से बंधी थी| फिर पृथ्वी के नीचे से मुझे कुछ मनुष्यों के बोलने की आवाजें सुनाईं दीं और कुछ देर में एक आदमी जमीन से निकलकर मेरे पास आकर पूछने लगा, “तुम कौन हो, क्या करने आए हो?”

मैंने उसे अपना हाल बताया तो वह मुझे एक तहखाने में ले गया| वहां कई और मनुष्य थे| उन्होंने मुझे खाने को दिया| मैंने उनसे पूछा, “तुम लोग इस निर्जन द्वीप में तहखाने में बैठे क्या कर रहे हो?”

तब उन्होंने बताया, “हम लोग बादशाह के साईस हैं| इस द्वीप के स्वामी बादशाह एक वर्ष में एक बार यहां अपनी अच्छी घोड़ियां भेजते हैं ताकि उन्हें दरियाई घोड़ों से गर्भवती कराया जाए| इस तरह जो बच्चे पैदा होते हैं, वे राजघराने के लोगों की सवारी के काम आते हैं| हम घोड़ियों को यहां बांध देते हैं और छुपकर बैठे जाते हैं| दरियाई घोड़े की आदत होती है कि वह संभोग के बाद घोड़ी को मार डालता है| जब घोड़ा संभोग के बाद हमारी घोड़ी को मारना चाहता है तो हम लोग तहखाने से बाहर निकलकर चिल्लाते हुए उसकी ओर दौड़ते हैं| घोड़ा हमारी आवाजें सुनकर भाग जाता है और समुद्र में डुबकी लगा लेता है| कल हम लोग अपनी राजधानी को वापस होंगे|”

मैंने उनसे कहा, “मैं भी तुम लोगों के साथ चलूंगा, क्योंकि इस द्वीप से तो मैं किसी तरह खुद अपने देश को जा नहीं सकता|”

हम लोग बातचीत कर ही रहे थे एक दरियाई घोड़ा समुद्र से निकला और घोड़ी से संभोग करके उसे मार ही डालना चाहता था कि साईस लोग चिल्लाते हुए दौड़े और घोड़ा भागकर समुद्र में जा छुपा| दूसरे दिन वे सारी घोड़ियों को इकट्ठा करके राजधानी में लाए| मैं भी उनके साथ चला आया| उन्होंने मुझे बादशाह के सामने पेश किया| उसके पूछने पर मैंने अपना सारा हाल कहा| बादशाह को मुझ पर बड़ी दया आई| उसने अपने सेवकों को आज्ञा दी कि इस आदमी को आराम से रखा जाए| इस प्रकार मैं वहां सुख-सुविधापूर्वक रहने लगा|
मैं वहां व्यापारियों और बाहर से आने वाले लोगों से मिलता रहता था, ताकि कोई ऐसा मनुष्य मिले, जिसकी सहायता से मैं बगदाद पहुंच सकूं| वह नगर काफी बड़ा और सुंदर था और प्रतिदिन कई देशों के जहाज उसके बंदरगाह पर लंगर डालते थे| हिन्दुस्तान तथा अन्य कई देशों के लोग मुझसे मिलते रहते और मेरे देश की रीति-रस्मों के बारे में पूछते रहते| मैं भी उनसे देश की बातें पूछता|

उस समय बादशाह के राज्य में एक सील नाम का द्वीप था| उसके बारे में सुना था कि वहां से रात-दिन ढोल बजने की ध्वनि आया करती है| जहाजियों ने मुझे यह भी बताया कि वहां के मुसलमानों का विश्वास है कि सृष्टि के अंतकाल में एक अधार्मिक और झूठा आदमी पैदा होगा, जो यह दावा करेगा कि ‘मैं ईश्वर हूं|’ वह काना होगा और गधा उसकी सवारी होगा

 

मैं एक बार एक द्वीप देखने भी गया| रास्ते में समुद्र में मैंने विशालकाय मछलियां देखीं| वे सौ-सौ हाथ लंबी थीं, बल्कि उनमें से कुछ तो दो-दो सौ हाथ लंबी थी| उन्हें देखकर डर लगता था, किंतु वे स्वयं इतनी डरपोक थीं कि तख्ते पर आवाज करने से ही भाग जाती थीं| एक और तरह की मछली भी मैंने देखी| उसकी लंबाई एक हाथ से अधिक न थी| किंतु उसका मुंह उल्लू का सा था| मैं इसी प्रकार बहुत समय तक सैर-सपाटा करता रहा|

एक दिन मैं उस नगर के बंदरगाह पर खड़ा था| वहां एक जहाज ने लंगर डाला और उसमें से कई व्यापारी, व्यापार करने की वस्तुओं की गठरियां लेकर उतरे| गठरियां जहाज के ऊपर तख्ते पर जमा थीं और तट से साफ दिखाई देती थीं| अचानक एक गठरी पर मेरी नजर पड़ी, जिस पर मेरा नाम लिखा था| मैं पहचान गया कि यह वही गठरी है, जिसे मैंने बसरा में जहाज पर लादा था| मैं जहाज के कप्तान के पास गया| उसने समझ लिया था कि मैं डूब चुका हूं| वैसे भी इतने दिनों की मुसीबतों और चिंता के कारण मेरी सूरत बदल गई थी, इसलिए वह मुझे पहचान न सका|

मैंने उससे पूछा, “यह लावारिस-सी लगने वाली गठरी कैसी है?”

उसने कहा, “हमारे जहाज पर बगदाद का एक व्यापारी सिंदबाद था| हम एक रोज समुद्र के बीच में थे कि एक छोटा-सा टापू दिखाई दिया और कुछ व्यापारी उस पर उतर गए| वास्तव में वह टापू न था, बल्कि एक बहुत बड़ी मछली की पीठ थी, जो सागर के ऊपर सो गई थी| जब व्यापारियों ने खाना बनाने के लिए उस पर आग जलाई तो पहले तो वह हिली, फिर समुद्र में गोता लगा गई| सारे व्यापारी नाव पर या तैरकर जहाज पर आ गए, किंतु बेचारा सिंदबाद वहीं डूब गया| यह गठरियां उसी की हैं| अब मैंने इरादा किया है कि इस गठरी का माल बेच दूं और इसका जो दाम मिले, उसे बगदाद में सिंदबाद के परिवार वालों के पास पहुंचा दूं|”

मैंने उससे कहा, “जिस सिंदबाद को तुम मरा समझ रहे हो, वह मैं ही हूं और यह गठरी तथा उसके साथ की गठरियां मेरी ही हैं|”

उसने कहा, “यह भी खूब रही| मेरे आदमी का माल हथियाने के लिए तुम सिंदबाद बन गए| वैसे तो शक्ल सूरत से भोले लगते हो, मगर यह क्या सूझी है कि इतना बड़ा छल करने को तैयार हो गए| मैंने स्वयं सिंदबाद को डूबते देखा है| इसके अतिरिक्त कई व्यापारी भी साक्षी हैं कि वह डूब गया है| मैं तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास करूं?”

मैंने कहा, “भाई कुछ सोच-समझकर बात करो| तुमने मेरा हाल तो सुना ही नहीं और मुझे झूठा बना दिया|”

उसने कहा, “अच्छा, बताओ अपना हाल|”

मैंने उसे सारा हाल बताया कि किस प्रकार मैं लकड़ी के सहारे तैरता रहा और चौबीस घंटे समुद्र में तैरने के बाद निर्जन द्वीप में पहुंचा और किस तरह से बादशाह के सईसों ने मुझे वहां से लाकर बादशाह के सामने पेश किया|

कप्तान को पहले तो मेरी कहानी पर विश्वास न हुआ| फिर अपने ध्यानपूर्वक मुझे देखा और अन्य व्यापारियों को भी मुझे दिखाया| सभी ने कुछ देर में मुझे पहचान लिया और कहा कि वास्तव में यह सिंदबाद ही है| सब लोगों ने मुझे नया जीवन पाने पर बधाई दी और भगवान को धन्यवाद दिया|

कप्तान ने मुझे गले लगाकर कहा, “ईश्वर की बड़ी दया है कि तुम बच गए| अब तुम अपना माल संभालो और इसे जिस प्रकार चाहो, बेचो|”

मैंने कप्तान की ईमानदारी की बड़ी प्रशंसा की और कहा, “मेरे माल में से थोड़ा-सा तुम भी ले लो|” किंतु उसने कुछ भी नहीं लिया और सारा माल मुझे दे दिया|
मैंने अपने सामान में से कुछ सुंदर और बहुमूल्य वस्तुएं बादशाह को भेंट कीं|

उसने पूछा, “तुझे यह मूल्यवान वस्तुएं कहां से मिलीं?”

मैंने उसे पूरा हाल सुनाया| यह सुनकर वह बहुत खुश हुआ| उसने मेरी भेंट सहर्ष स्वीकार कर लीं और उसके बदले में उनसे कहीं अधिक मूल्यवान वस्तुएं मुझे दे दीं| मैं उनसे विदा होकर फिर जहाज पर आया और अपना माल बेचकर उस देश की पैदावार यथा चंदन, आबनूस, कपूर, जायफल, लौंग काली मिर्च आदि लीं और फिर जहाज पर सवार हो गया| कई देशों और टापुओं से होता हुआ हमारा जहाज बसरा के बंदरगाह पर पहुंचा| वहां से स्थल मार्ग से मैं बगदाद आया| इस व्यापार में मुझे एक लाख दीनार का लाभ हुआ| मैं अपने परिवार वालों और बंधु-बांधवों से मिलकर बड़ा प्रसन्न हुआ| मैंने एक विशाल भवन बनवाया और कई दास और दासियां खरीदे और आनंद से रहने लगा| कुछ ही दिनों में मैं अपनी यात्रा के कष्टों को भूल गया|”

सिंदबाद ने अपनी कहानी पूरी करके गाने-बजाने वालों से, जो यात्रा वर्णन के समय चुप हो गए थे, दुबारा गाना-बजाना शुरू करने को कहा| इन्हीं बातों में रात हो गई| सिंदबाद ने चार सौ दीनारों की एक थैली मंगाकर उस मजदूर हिन्दबाद को दी और कहा, “अब तुम अपने घर जाओ, कल फिर इसी समय आना तो मैं तुम्हें अपनी यात्राओं की और कहानियां सुनाऊंगा|”

हिन्दबाद ने इतना धन पहले कभी नहीं देखा था| उसने सिंदबाद को बहुत धन्यवाद दिया| उसके आदेश के अनुसार हिन्दबाद दूसरे दिन अच्छे और नए वस्त्र पहनकर उसके घर आया| सिंदबाद उसे देखकर प्रसन्न हुआ और उसने मुस्कराकर हिन्दबाद से उसकी कुशल-क्षेम पूछी| कुछ देर में सिंदबाद के अन्य मित्र भी आ गए और नित्य के नियमों के अनुसार स्वादिष्ट व्यंजन सामने लाए गए| जब सब लोग खा-पीकर तृप्त हो चुके तो सिंदबाद ने कहा, “दोस्तों! अब मैं तुम लोगों को अपनी दूसरी सागर यात्रा की कहानी सुनाता हूं| यह पहली यात्रा से कम विचित्र नहीं है|”

सब लोग ध्यान से सुनने लगे और सिंदबाद ने कहना शुरू किया|

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