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महर्षि दधीचि की शिव साधना (भगवान शिव जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

महर्षि दधीचि की शिव साधना (भगवान शिव जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

ब्रह्मा जी के पौत्र क्षुप एवं महर्षि-च्यवन के पुत्र दधीचि आपस में घनिष्ठ मित्र थे| एक बार दोनों में एक विवाद उठ खड़ा हुआ| विषय था – ‘क्षत्रिय श्रेष्ठ है अथवा ब्राह्मण|’ क्षुप का कहना था कि क्षत्रिय श्रेष्ठ है जबकि दधीचि ब्राह्मण को श्रेष्ठ बता रहे थे| उनका विवाद कुछ ज्यादा ही बढ़ गया| उग्र स्वभाव के दधीचि ने अपने बाएं हाथ की मुष्टि से क्षुप के मस्तिष्क पर आघात कर दिया| मुष्टि का प्रहार होते देख क्षुप क्षुब्ध हो उठा| उसने अपना वह व्रज उठाया जो उसने तपस्या करके पितामह ब्रह्मा से प्राप्त किया था, उसे दधीचि पर चला दिया| वज्र के वार से दधीचि की पसलियां टूट गईं और वह बेहोश होकर नीचे गिर गए| फिर जैसे ही उनकी मूर्च्छा भंग हुई, उन्होंने अपने योगबल से शुक्राचार्य का स्मरण किया| तुरंत ही शुक्राचार्य वहां उपस्थित होकर बोले – “क्या हुआ वत्स! तुम्हें ये चोट कैसे लगी?”

दधीचि ने कराहते हुए कहा – “आचार्य! पितामह के पौत्र क्षुप द्वारा मुझ पर वज्राघात किया गया है| पीड़ा से मेरी बुरी हालत हो रही है| कुछ उपाय कीजिए|”

शुक्राचार्य तुरंत उपचार में जुट गए और कुछ ही पलों में दधीचि की टूटी पसलियों को जोड़ दिया| दधीचि फिर से भले-चंगे हो गए| उन्होंने शुक्राचार्य का आभार व्यक्त करते हुए कहा – “आचार्य! आपने तो मुझे क्षण मात्र में ही एकदम स्वस्थ कर दिया| कहां से सीखी यह विद्या आपने?”

शुक्राचार्य बोले – “यह सब देवाधिदेव महादेव की कृपा का फल है| मैंने उन्हीं से यह ज्ञान सीखा था| तुम भी यदि चाहो तो उनसे सब कुछ प्राप्त कर सकते हो| भोले भंडारी बहुत ही दयालु हैं|”

शुक्राचार्य दधीचि को शिव साधना की विधि बताकर लौट गए और दधीचि शिव साधना में लीन हो गए| उन्होंने वर्षों कष्ट सहकर शिव की तपस्या की| अंत में उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा|

दधीचि ने शिव को प्रणाम करके कहा – “भगवन! यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मैं कभी कमजोर न रहूं| किसी शस्त्र का मुझ पर कोई असर न हो| देवताओं के किसी भी अस्त्र-शस्त्र से मेरी मृत्यु न हो|”

शिव ने ‘तथास्तु’ कहा और अंतर्धान हो गए| दधीचि बदले की आगे में सुलग रहे थे| वे क्षुप के पास पहुंचे और जाते ही उसके सिर में अपनी लात का प्रहार किया| क्षुप कुछ क्षणों के लिए संज्ञा शून्य होकर गिर गया| लेकिन वह तुरंत ही उठा और अपना वज्र निकालकर दधीचि का किंचित मात्र भी असर नहीं हुआ था| वज्र उनके शरीर से यूं टकराया जैसे किसी ठोस फौलादी वस्तु से टकराया हो|

फिर इससे पहले कि दधीचि उस पर फिर से वार करते वह वहां से भागकर एक निर्जन स्थान में पहुंचा और विष्णु की आराधना करनी आरंभ कर दी| विष्णु प्रकट हुए| क्षुप ने उनकी स्तुति करते हुए कहा – “भगवन! मैं दधीचि को जीतना चाहता हूं| मेरी इच्छा पूर्ण करें|”

विष्णु बोले – “वत्स! मैं तुम्हें ऐसा वर देने के लिए विवश हूं| दधीचि भगवान शिव का परम भक्त है| मैं भगवान शिव के भक्त का कोई अहित होते नहीं देख सकता| तुम कोई और वर मांग लो|”

विष्णु की बात सुनकर क्षुप सोच में पड़ गया| फिर कुछ क्षण बाद बोला – “भगवन! यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम दधीचि से मेरी संधि ही करा दीजिए| अगर ऐसा नही हुआ तो वह अवश्य ही मेरी हत्या कर डालेगा|”

विष्णु ने क्षुप की बात पर सहमति जताई और वे उसे लेकर दधीचि के पास पहुंचे| विष्णु ने ब्राह्मण का वेष धारण किया और क्षुप को एक जगह रुकने को कहकर स्वयं दधीचि के पास पहुंचे| दधीचि ने ब्राह्मण का स्वागत-सत्कार करके कहा – “मेरे अहो भाग्य| आइए विप्रवर! मुझ अंकिचन के पास आने का कैसे कष्ट किया?”

ब्राह्मण वेषधारी विष्णु बोले – “मैं आपसे कुछ मांगने आया हूं मुनिवर! आप शिव के परम भक्त हैं| आशा है निराश नहीं करेंगे|”

दधीचि ने अपनी अंतर्शक्ति से तुरंत विष्णु को पहचान लिया| विष्णु के इस तरह छल करके कुछ मांगने के प्रयोजन को भी वे भांप गए| अत: बोले – “मैंने आपको पहचान लिया है देव! किंतु इस तरह वेष बदलकर आने का क्या प्रयोजन है| अगर आप क्षुप के जीवन दान को मांगने आए हैं, तो मैं असमर्थ हूं| क्षुप मेरे हाथों जरूर मरेगा|”

दधीचि की बात सुनकर विष्णु अपने असली रूप में आ गए, बोले – “लेकिन क्षुप मेरा भक्त है और अपने भक्त का कोई अहित होते देखना मैं कैसे बर्दाश्त कर सकता हूं| तुम्हें मेरे कोप का भोजन बनना पड़ेगा|”

दधीचि बोले – “भगवान शिव का भक्त दुनिया में किसी से भी नहीं डरता प्रभु! आप जो चाहें शौक से कर लीजिए|”

दधीचि की बात सुनकर विष्णु को क्रोध आ गया| उन्होंने चक्र का प्रयोग दधीचि पर कर दिया| लेकिन उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ| चक्र उनकी उंगली से घूसा, आगे बढ़ा और फिर तुरंत ही वापस उनकी उंगली पर आकर टिक गया|

दधीचि ने हंसते हुए कहा – “यह चक्र मुझ पर प्रहार नहीं कर सकेगा प्रभु! आपने देख ही लिया है| क्योंकि यह चक्र भी तो भगवान शिव द्वारा ही आपको दिया हुआ है| भगवान शिव के भक्त का चक्र कैसे अहित कर सकता है|”

दधीचि की बात सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें प्रणाम किया| फिर उन्होंने संकेत से एक ओट में छिपे क्षुप को बुलाया और उसे दधीचि के सामने करते हुए बोले – “क्षुप से बहुत बड़ी भूल हो गई थी विप्रवर! आप इसे क्षमा कर दीजिए| इसे मालूम नहीं था कि ब्राह्मण की शक्ति राजा, महराजा यहां तक कि देवों से भी बड़ी होती है| इसका अपराध क्षमा करें|”

क्षुप दधीचि के चरणों में गिर गया| उसने दधीचि से क्षमा याचना की – “मुझे क्षमा कर दो मित्र! मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया था| अहंकार में आकर मैं ब्राह्मण की शक्ति को समझ नहीं सका था| मुझे क्षमा कर दो|”

करुण हृदय दधीचि ने कहा – “तुमने अपनी भूल की क्षमा मांग ली| यही उचित है| पश्चाताप सारे पापों को धो देता है| मैं तुम्हें क्षमा करता हूं| हम मित्र हैं और आगे भी मित्र ही रहेंगे|”

दोनों का मिलन कराकर विष्णु वापस अपने धाम लौट गए| क्षुप अपने निवास स्थान पर चला गया और दधीचि अपनी कुटिया में दाखिल हो गए और फिर कई वर्षों तक दधीचि भगवान शिव की आराधना में लीन हो गए|

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