Homeभगवान शिव जी की कथाएँदेवों का अभिमान भंग (भगवान शिव जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

देवों का अभिमान भंग (भगवान शिव जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

देवों का अभिमान भंग (भगवान शिव जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

समुद्र मंथन हो चुका था|
भगवान शिव की कृपा से देवताओं को अमृत प्राप्त हो गया|

असुरों के हिस्से में कुछ भी नहीं पड़ा था, इससे क्रुद्ध होकर असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया| लेकिन भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र की मार से घबराकर असुर सेना भाग खड़ी हुई| देवता विजयी हुए| इंद्र को अमरावती मिल गई और इस विजय से देवताओं में अभिमान पैदा हो गया| प्रत्येक देवता यह कहने लगा कि उसी के प्रताप से इस युद्ध में देवों को विजय मिली है| भगवान शिव की उपेक्षा कर दी गई जिन्होंने देवों के हित में जहर पीकर उन्हें मुक्ति दिलाई थी| उन्होंने देवों का अभिमान भंग करने का निश्चय किया|

एक दिन उन्होंने एक विशाल यक्ष का रूप धारण किया और अमरावती के वायुमंडल में प्रकट हो गए| उस महाकाय यक्ष को देखकर देवताओं में खलबली मच गई| वे घबराकर देवराज इंद्र के पास गए और भयभीत होकर बोले – “महाराज! आज अमरावती में एक अद्भुत यक्ष दिखाई दिया| हमें तो वह कोई मायावी असुर प्रतीत होता है| कहीं वे लोग पुन: अमरावती को हथियाने की चेष्टा तो नहीं कर रहे हैं|”

देवों की बात सुनकर इंद्र ने वायुदेव को आदेश दिया – “वायुदेव! आप जाकर उस यक्ष का पता करें कि वह कौन है और अमरावती में किस प्रयोजन से आया है?”

आज्ञा पाकर वायुदेव यक्ष के पास पहुंचकर बोले – “तुम कौन हो? तुम्हारी शक्ति क्या है? यहां इस प्रकार सुरों को देखकर तुमने उनका सम्मान भी नहीं किया|”

यक्ष ने उपेक्षा भरी आवाज में उत्तर दिया – “और तुम कौन हो? तुम्हारी शक्ति क्या है? तुम दूसरों से यह उम्मीद क्यों करते हो कि वे तुम्हारा सम्मान करें?”

“मैं वायुदेव हूं| तुम शायद मेरी शक्ति नहीं पहचानते| मैं चाहूं तो समस्त ब्रह्मांड को एक तिनके के समान उड़ाकर फेंक सकता हूं| मुझसे शक्तिशाली और कोई नहीं है|” वायुदेव ने गर्व से उत्तर दिया|

यक्ष ने वायुदेव के अभिमान को देखकर मुस्कुराते हुए एक सूखा तिनका उनके समक्ष रख दिया और बोले – “जरा इस तिनके को उड़ाकर तो दिखाओ वायुदेव! मैं भी तो देखूं, कितने शक्तिशाली हो तुम|”

वायुदेव ने बहुत प्रयत्न किया, लेकिन निराशा ही हाथ लगी| तिनका टस से मस नहीं हुआ| उन्होंने देवराज को समस्त समाचार कह सुनाया|

इस बार इंद्र ने अग्निदेव को आदेश दिया – “आप सबको प्रकाशित करने वाले हैं अग्निदेव! आप जाकर पता करें कि वह यक्ष कौन है?”

अग्निदेव अभिमान से चूर यक्ष के पास पहुंचकर बोले – “आप कौन हैं और कहां से आए हैं? आपकी शक्ति क्या है?”

यक्ष बोला – “और तुम कौन हो? तुम्हारी शक्ति क्या है? क्या तुम्हें इतना भी पता नहीं कि दूसरों का परिचय पूछने से पहले स्वयं का परिचय दिया जाता है|”

अग्निदेव बोले – “मैं संपूर्ण भुवन को प्रकाशित करनेवाला अग्निदेव हूं| ब्रह्मांड में ऐसा कोई भी नहीं है, जिसे में भस्म न कर सकूं| मैं एक पल में समस्त ब्रह्मांड को जलाकर राख कर सकता हूं|”

यक्ष बोला – “ओह! ऐसा है तो जरा इस तिनके को जलाकर दिखा दो तो मैं तुम्हारी शक्ति का लोहा मान जाऊंगा|”

अग्निदेव ने उस तुच्छ तिनके को भस्म करने के लिए पूरी शक्ति लगा दी| लेकिन वे सफल नहीं हो पाए और लज्जा से सिर झुकाए वापस इंद्र के पास लौट आए| अग्निदेव ने भी आपबीती देवराज को कह सुनायी|

तब इंद्रदेव ने स्वयं यक्ष के पास जाने का निर्णय किया| जब इंद्र वहां पहुंचे तो भौचक्के से रह गए| इंद्र जरा-सी झलक देख पाए थे कि यक्ष अंतर्धान हो गया| इंद्र समझ गए कि अवश्य वह यक्ष कोई परम शक्ति थी| उन्होंने एक बार फिर ऊपर की ओर नजरें उठाईं| अंतरिक्ष में जहांथोड़ी देर पहले यक्ष मौजूद था वहां अब इंद्र को देवी उमा का चेहरा दिखाई दिया| इंद्र ने श्रद्धा से मातेश्वरी के सम्मुख शीश झुकाया| मां पार्वती ने मुस्कुराते हुए कहा – “आश्चर्य में न पड़ो देवराज! यह यक्ष कोई और नहीं स्वयं भगवन शिव ही थे| देवों में प्रमाद और अहंकार पैदा हो गया था, भगवान उसी को दूर करने आए थे| भगवान शिव की कृपा से ही समुद्र मंथन संभव हो सका था| उन्हीं की शक्ति से अमृत प्रकट हुआ था और उन्हीं की शक्ति से असुरों का शमन हुआ था| अंत में सुरों की रक्षा के लिए ही भगवान शिव ने विषपान भी किया था| इसलिए देव अपने मस्तिष्क से यह गलत धारणा निकाल दें कि सिर्फ आप लोगों की शक्ति के परिणाम स्वरूप असुरों पर विजय हुई थी|” इतना कहकर देवी उमा भी अंतर्धान हो गईं|

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