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सच्चा प्रेम

नौआखाली के दिनों की बात है| वहां गांधीजी की पद-यात्रा चल रही थी| एक दिन गांधीजी देवीपुर नामक ग्राम में पहुंचे, जहां उनका भव्य स्वागत किया गया| ध्वज-तोरण, पताका आदि से सजावट की गई| गांधीजी ने वह सब देखा तो बड़े गंभीर हो गए, पर उस दिन मौनवार होने के कारण बोले कुछ नहीं| शाम को मौन समाप्त होने पर उन्होंने मुख्य कार्यकर्ता को बुलाकर पूछा – “आप ये चीजें कहां से लाए?”

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उस भाई ने कहा – “हम सबने आठ-आठ आने देकर तीस सौ रुपए इकट्ठे किए| उसी में से ये चीजें मंगवाई हैं बापू, आप यहां कब-कब आते हैं?”

गांधीजी को बड़ी वेदना हुई|

गांधीजी बोले – “ये सब फूल और यह सब सजावट क्षणभर में मुरझा जाएगी| मुझे लगता है, आप सब मुझे धोखा दे रहे हैं| मेरे लिए आप सारा ठाठ-बाट रचकर साम्प्रदायिक भावना को भड़का रहे हैं| मैं इस समय अग्नि की ज्वाला में जल रहा हूं| इन फूल-मालाओं के स्थान पर सूत के हार सजाए जाते तो मुझे इतना न खटकता| सूत के हार शोभा बढ़ाते और उनसे कपड़ा भी बनता| मेरे प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए आपने यह सजावट की है तो भी वह अनुचित है| आपको मेरे प्रति प्रेम हो तो मेरी बातों पर अमल करें| इतने कत्लेआम के बाद इन फूलों पर इतना रुपया खर्च करना आपको कैसे सूझा यह मैं नहीं समझ सका| आप तो कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं फिर आपने विलायती और देशी मिल का कपड़ा रेशम और रिबन, इन सबका सजावट में इस्तेमाल किया| यह सब मेरी निगाह में बहुत बुरा है|”

गांधीजी की अंतव्यर्था में से निकले ये शब्द शत-शत मुख से आज भी चीख-चीखकर देशवासियों से कह रहे हैं अगर मेरे लिए तुम्हारे मन में प्रेम और आदर है तो मुझे धोखा मत दो| मैंने जो कुछ कहा है उस पर चलो, उस पर अमल करो|

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