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संतोषी सदा सुखी

किसी नगर में हरिदत नामक एक ब्राह्मण परिवार सहित निवास करता था| वह मन लगाकर अपने खेत में काम करता, परंतु फिर भी उसे पर्याप्त आय नही होती थी| उसका जीवन दुख और कठिनाइयों से भरा था| एक दिन ब्राह्मण अपना कार्य समाप्त करके थोड़ा विश्राम कर रहा था कि उसने समीप के रेत के टीले पर एक भयंकर सर्प को फन फैलाए बैठे देखा| ब्राह्मण ने सोचा कि यह मेरे क्षेत्र का देवता है|

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इसकी पूजा न करने के कारण ही मेरा परिश्रम सफल नही हो पा रहा है| अतः उसकी पूजा-अर्चना करने का निश्चय कर ब्राह्मण सीधा घर गया और एक पात्र में दूध भरकर ले आया| पात्र को सर्प देवता के सामने रखकर बोला- ‘देवाधिपति देव! आज तक मैंने आपको स्मरण करके पूजा-अर्चना नही की| मेरे अपराध को क्षमा करे और थोड़ा-सा दूध स्वीकार करने की कृपा करे|’

इस प्रकार कुछ देर तक अनुनय-विनय करने के उपरांत वह ब्राह्मण घर से लाए दूध से भरे बर्तन को वही रखकर चला गया|

अगले दिन सुबह जब ब्राह्मण बर्तन उठाने गया तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा| बर्तन उसी जगह रखा हुआ था और उसमें दूध की जगह एक स्वर्ण मुद्रा पड़ी थी| अब ब्राह्मण का यह कर्म प्रतिदिन चलने लगा| इस प्रकार धीरे-धीरे वह धनवान हो गया|

एक दिन संयोगवश ब्राह्मण को कार्यवश किसी दूसरे नगर में जाना पड़ा| उसने अपने पुत्र को बुलाकर कहा- ‘पुत्र! मैं किसी कार्य से दूसरे नगर जा रहा हूँ| सर्प देवता की आराधना में कोई बाधा न आए, इसलिए तुम हर रोज़ शाम को एक बर्तन में दूध भरकर रेत के टीले के पास रख आना और प्रातःकाल जाकर उसे उठा लेना| उसमें तुम्हें रोज़ एक स्वर्णमुद्रा मिला करेगी| यही सर्प देवता का हमारे लिए प्रसाद है|’

पिता के आदेशानुसार सायंकाल होते ही ब्राह्मण का पुत्र दूध से भरा बर्तन रेत के टीले के सामने रख आया| प्रातः होते ही जब वह उसे उठाने गया तो उसे उसमें स्वर्णमुद्रा मिली|

लालच के वशीभूत होकर ब्राह्मण के पुत्र ने सोचा कि इस रेत के टीले में अवश्य ही स्वर्ण मुद्राएँ भरी पड़ी है और यह सर्प दूध से भरा बर्तन खाली करने के बाद एक मुद्रा उस खज़ाने में से लाकर इस खाली बर्तन में डाल देता है| अतः क्यों न रोज़-रोज़ के इस झंझट से बचने के लिए इस सर्प को मारकर सभी मुद्राएँ एक साथ प्राप्त कर लूँ? यह कुविचार मन में आते ही ब्राह्मण के लड़के ने घर से एक मोटा डंडा लाकर जैसे ही सर्प को मारना चाहा, वैसे ही पलटकर साँप ने लड़के को डस लिया, जिससे वह तत्काल निष्प्राण हो गया|

ब्राह्मण ने घर लौटने पर अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार सुना तो वह दुखी होकर विलाप करने लगा| लेकिन जब उसे पुत्र की मृत्यु का कारण पता चला तो दुखी मन से बोला- ‘मृत्यु का कोई दोष नही, मेरे पुत्र ने स्वयं ही मृत्यु को आमंत्रित किया था|’

अगले दिन शाम को दूध से भरा बर्तन लेकर ब्राह्मण उस रेत के टीले के पास गया और सर्पदेव की स्तुति करने लगा| लेकिन सर्प अपने बिल से बाहर नही निकाला|

‘हे सर्पदेव! क्या आप मुझसे रुष्ट है? अपने बिल से बाहर आकर देखिए- मैं प्रतिदिन की तरह आपके लिए दूध लेकर आया हूँ|’ ब्राह्मण ने कहा|

सर्प बाहर आए बिना बिल में से बोला- ‘ब्राह्मण महाराज! पुत्रशोक भूलकर तुम लोभवश मेरे पास आए अवश्य हो, परंतु अब तुम्हारी और मेरी मित्रता नही निभ सकती| तुम्हारे पुत्र ने लोभवश मेरी हत्या करनी चाही और मैंने प्राणों की रक्षा करते हुए उसे डस लिया| अब न तो तुम पुत्रशोक को भूल सकते हो और न ही मैं तुम्हारे पुत्र की लाठी के प्रहार को भूल सकता हूँ|’

‘फिर तुम ब्राह्मण होने के साथ-साथ इंसान भी हो- और कहा भी गया है कि साँप काटे का उपचार है लेकिन इंसान के काटे का कोई उपचार नही| इसलिए अब तुम जाओ| आज से हमारी और तुम्हारी मित्रता समाप्त हुई|’ कहकर सर्प मौन हो गया|

सर्प के कथन को सुनकर ब्राह्मण अपने पुत्र की मृत्यु का शोक और उसकी मूर्खता पर पश्चाताप करता हुआ अपने घर लौट आया|


कथा-सार

स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में ब्राह्मण-पुत्र की मृत्यु तो हुई ही, सर्प और ब्राह्मण की मित्रता व विश्वास भी खंडित हो गए| लोभ-लालच व्यक्ति के होशो-हवास के साथ-साथ उसका विवेक भी छीन लेता है| जो मिल रहा है उसे पाकर ही संतोष के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए|

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