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संत का हृदय

किसी नगर में राबिया नाम की बड़ी ऊंची संत थीं| उनका जीवन अत्यंत सादा, सरल और सात्विक था| उनका हृदय हर घड़ी प्रेम से छलछलाता रहता था और उनका द्वार सबके लिए हमेशा खुला रहता था|

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कभी कोई उनके घर से भूखा-प्यासा निराश नहीं लौटता था| वे सबकी सेवा किया करती थीं और बदले में कभी किसी से कुछ नहीं चाहती थीं|

एक दिन राबिया कुरान का पाठ कर रही थीं| उसकी अच्छी-अच्छी बातें पढ़कर उनका मन भीग-भीग आता था|

वे सोचने लगती थीं कि इंसान कैसा है जो लोभ-लालच में पड़ा रहता है और अपनी जिंदगी भटकते-भटकते पूरी कर डालता है! नहीं आदमी के लिए यह शोभा नहीं देता| उसे मन से अच्छी बातें सोचनी चाहिए और हाथों से दूसरों की भलाई के काम करने चाहिए|

राबिया और न जाने क्या-क्या सोच रही थीं कि उनकी निगाह अचानक कुरान की एक बात पर गई – ‘अल्लाह से मोहब्बत करो और शैतान से नफरत|’

इस वाक्य को पढ़ते की राबिया ने पेंसिल हाथ में ली और उस वाक्य के आखिरी हिस्से को काट दिया|

उनके पास बैठे आदमी ने यह देखकर उनसे कहा – “बहन आपने यह क्या किया? एक मजहबी किताब को गंदा कर दिया!”

राबिया ने कहा – “नहीं, मैंने किताब को गंदा नहीं किया, बल्कि अपनी परेशानी दूर की है| इसमें लिखा है शैतान से नफरत करो, लेकिन मैं अपने दिल को टटोलती हूं, तो मुझे उसमें कहीं भी नफरत दिखाई नहीं देती| मेरे भाई अब तुम्हीं बताओ कि शैतान के लिए मैं कहां से नफरत लाऊंगी?”

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