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मुल्ला की पगड़ी (बादशाह अकबर और बीरबल)

बादशाह अकबर अक्सर बीरबल की पगड़ी की तारीफ किया करते थे, क्योंकि वे पगड़ी बहुत ही बढ़िया ढंग से बांधा करता था, किंतु मुल्ला दोप्याजा को इससे जलन होती थी| मुल्लाजी ने तय कर लिया कि वह भी एक दिन इतनी अच्छी तरह से पगड़ी बांधेंगे कि उसकी तारीफ बादशाह को करनी ही पड़ेगी|

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कई दिनों की कोशिश के बाद आखिर एक दिन मुल्लाजी सुंदर तरीके से पगड़ी बांधने में कामयाब हो ही गए| जब मुल्लाजी दरबार में पहुंचे तो बादशाह अकबर ने भी मुल्लाजी की पगड़ी की तारीफ की और बोले – “मुल्लाजी आज तो कमाल हो गया, आपने बीरबल से भी बेहतरीन तरीके से पगड़ी बांधी है|”

अपनी तारीफ सुनकर मुल्लाजी बेहद खुश थे, किंतु बीरबल अपने स्थान पर खड़ा होकर बोला – “जहांपनाह, आप नाहक ही मुल्लाजी की तारीफ किए जा रहे हैं क्योंकि मुल्लाजी को पगड़ी बांधनी आती ही नहीं, यह तो उनकी बीवी ने इतने खूबसूरत तरीके से पगड़ी बांधी है|”

“यह क्या कह रहे हो बीरबल, मैंने यह पगड़ी खुद बांधी है|” मुल्लाजी गुस्से से बोले|

“अगर ऐसी बात है तो दुबारा सबके सामने बांध कर दिखाएं|” बीरबल ने कहा|

बीरबल जानते थे कि पगड़ी को दर्पण के सामने बांधा जाता है और दरबार में दर्पण है नहीं| अत: मुल्लाजी दुबारा वैसी पगड़ी बांध ही नहीं पाएंगे| मुल्ला ने भी ताव में आकर पगड़ी तो खोल ली किंतु कई कोशिशों के बाद भी उसे दुबारा वैसी खूबसूरत तो क्या, ठीक तरह से भी नहीं बांध सके| यह देखकर बादशाह अकबर बोले – “क्या मुल्लाजी, आप अपने छोटे-मोटे काम भी अपनी बीवी से करवाते हैं, लानत है|”

मुल्ला दोप्याजा शर्म से इधर-उधर देखने लगा| वह समझ गया कि बीरबल ने इस बार भी उसे करारी मात दी है|

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