महान् तीर्थ - माता-पिता

  • font size
  • 571 Views



माँ! पहले विवाह मैं करूँगा| एकदन्त के सहसा ऐसे वचन सुनकर पहले तो शिवा हँसीं और अपने प्रिय पुत्र विनायक से स्नेहयुक्त स्वर में बोलीं-'हाँ, हाँ! विवाह तो तेरा भी होगा ही, पर स्कन्द तुझसे बड़ा है| पहले उसका विवाह होगा|'

"महान् तीर्थ - माता-पिता" सुनने के लिए Play Button क्लिक करें | Listen Audio

'नहीं माँ! वह बड़ा हुआ तो क्या हुआ, पहले मेरा विवाह करना पड़ेगा|' माँ की बात बीच में ही काटते हुए लम्बोदर ने कहा| 

अपनी आप बीती, आध्यात्मिक या शिक्षाप्रद कहानी को अपने नाम के साथ इस पोर्टल में सम्मलित करने हेतु हमें ई-मेल करें । (Email your story with your name, city, state & country to: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. ) Submit your story to publish in this portal

'अरे! वह देख, स्कन्द भी आ रहा है|'-शिवा बोली|

स्कन्द ने जब यह सुना तब अपने हठी स्वभाव के कारण उन्होंने कहा-'माँ! नियमानुसार पहले मेरा विवाह होगा|'

एकदन्त ने कहा-'नहीं, पहले मेरा विवाह होगा|'

शशांकशेखर ने दूर से ही देखा-दोनों बालक माँ के पास खड़े हैं वे भी बालकों के पास आ गये| शिवा ने उन्हें प्रणाम करते हुए कहा-'प्रभो! ये दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं, आप ही इन्हें समझाइये न!'

शिव ने पूर्ण वृत्तान्त सुना और बड़ी देर तक हँसने के पश्चात् वे गम्भीर होकर बोले-'गणेश और स्कन्द! पहले किसका विवाह हो, इसके लिये तुम दोनों को परीक्षा देनी होगी, जो उसमें उत्तीर्ण होगा, उसी का विवाह पहले कर दिया जायगा|' दोनों ने सहमति प्रकट की|

आशुतोष ने परीक्षा अत्यन्त सूक्ष्म विवरण बताया-'देखो, जो पृथ्वी की परिक्रमा कर पहले लौटेगा, उसी का विवाह पहले होगा|

मयूरवाहन कार्तिकेय तत्क्षण मंदरगिरि से द्रुतगति से चल पड़े| मूषकवाहन मूक शान्त खड़े थे| बेचारा चूहा भी अपनी गोल-गोल आँखों से टुकुर-टुकुर निहार रहा था|

'अरे, खड़ा-खड़ा मुँह क्या तक रहा है! तेरा बड़ा भाई चला भी गया| तू भी जा न परिक्रमा पर|'-भगवती ने गणेश से कहा|

अचानक गणेश को न जाने क्या सुझा, उन्होंने माता-पिता से विनय करते हुए कहा-'मैं अभी आ रहा हूँ, तबतक आप दोनों यहीं बैठें,-कहते हुए गणेश भवन की ओर दौड़ पड़े| शिवा-शिव एक दूसरे को देखते रह गये| 

'क्या करने गया है?' अभी दोनों आश्चर्यचकित एक-दूसरे को देख ही रहे थे कि गणेश हाथ में पूजा की थाली लिये शीघ्रतापूर्वक आते दीख पड़े| निकट आकर उन्होंने पूजा की थाली दोनों के चरणों में रख दी और हाथ जोड़कर माता-पिता की परिक्रमा करने लगे| शिव-पार्वती इस विचित्र दृश्य को देखकर अपनी हँसी रोक न सके और बोले-'अरे, यह क्या नवीन आयोजन हो रहा है?' बिना प्रत्युत्तर दिये गणेश ने सात परिक्रमाएँ पूर्ण कीं तथा पूजा की थाली उठाकर माता-पिता की आरती उतारी, उन्हें चन्दन लगाया, भोग की कटोरी सामने रखी और दोनों को साष्टांगङ दण्डवत् प्रणाम किया! फिर वे उठकर बोले-'करो मेरा विवाह|'

शिवा-शिव दोनों जी भरकर हँसे| शिव ने पूछा-'अरे, क्या गिरि-काननोंसहित सप्तद्वीपमयी सम्पूर्ण वसुन्धरा की परिक्रमा हो गयी?'

बुद्धिसिन्धु गणेश स्वीकृत में सिर हिलाते हुए कहा-'अब और रह ही क्या गया है?' वेद-शास्त्रों के द्वारा उद्घोषित प्रणाम के अनुसार माता-पिता की परिक्रमा करने से पृथ्वी की परिक्रमा पूरी होती है| आशुतोष भगवान् शिव और माता पार्वती ने भी यह स्वीकार किया| इस प्रतियोगिता में सिद्धिविनायक गणेश की विजय हुई|

इससे सिद्ध हुआ कि माता-पिता ही महान् तीर्थ हैं| यदि कोई पुत्र सम्पूर्ण धरा की परिक्रमा करने का फल प्राप्त करना चाहता है ओ वह अपने माता-पिता को छोड़कर तीर्थयात्रा करने वाला पुत्र माता-पिता की हत्या के पाप का भागी बनता है| अन्य तीर्थ तो दूर हैं, परंतु धर्म का साधनभूत तीर्थ तो निकट ही सुलभ हैं| पुत्र के लिये माता-पिता तथा स्त्री के लिये पति-जैसे शुभ तीर्थ घर में ही विद्यमान हैं| 

श्री शिव जी शिव विवाह शिव का क्रोध श्री शिव चालीसा

Please write your thoughts or suggestions in comment box given below. This will help us to make this portal better.

SpiritualWorld.co.in, Administrator
अपनी आप बीती, आध्यात्मिक या शिक्षाप्रद कहानी को अपने नाम के साथ इस पोर्टल में सम्मलित करने हेतु हमें ई-मेल करें । (Email your story with your name, city, state & country to: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. ) Submit your story to publish in this portal

 

नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

Disclaimer

 

इस वेबसाइट का उद्देश्य जन साधारण तक अपना संदेश पहुँचाना है| ताकि एक धर्म का व्यक्ति दूसरे धर्म के बारे में जानकारी ले सके| इस वेबसाइट को बनाने के लिए विभिन्न पत्रिकाओं, पुस्तकों व अखबारों से सामग्री एकत्रित की गई है| इसमें किसी भी प्रकार की आलोचना व कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया|
Special Thanks to Dr. Rajni Hans, Ms. Karuna Miglani, Ms. Anisha Arora, Mr. Ashish Hans, Ms. Mini Chhabra & Ms. Ginny Chhabra for their contribution in development of this spiritual website. Privacy Policy | Media Partner | Wedding Marketplace

Vulnerability Scanner

Connect With Us