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भाग्य का खेल

भाग्य का खेल

चंद्रिका नगर के निवासी लालाराम नामक बनिये का लड़का सौ रूपये मूल्य की एक पुस्तक खरीद लाया| उस पुस्तक में एक स्थान पर लिखा था कि मनुष्य अपने भाग्य का लिखा तो बड़ी ही आसानी से पा लेता है, लेकिन जो भाग्य में नही लिखा होता उसे जी-तोड़ परिश्रम करने के उपरांत भी पाने में असमर्थ रहता है|

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यह एक अटल सत्य है और इसमें परिवर्तन के लिए कोई भी उपाय नही है|

बनिये ने इतनी महँगी पुस्तक खरीदने पर आपने पुत्र की काफ़ी भर्त्सना की| पुत्र द्वारा अपने निर्णय को उचित बताने पर लालाराम क्रोधित हो उठा और अपने पुत्र को निखट्टू तथा विवेकहीन बताकर घर से निकल दिया|

बनिये का बेटा अपने पिता के व्यवहार से दुखी होकर किसी दूसरे शहर में चला गया| जो भी उसके सम्पर्क में आता उसे वह एक ही वाक्य में अपना परिचय देता- ‘मनुष्य अपने प्राप्तव्य को अनायास ही पा लेता है|’

एक दिन राजा की पुत्री चंद्रवती किसी उत्सव को देखने उस नगर में आई तो उसकी दृष्टि एक सुंदर राजकुमार पर पड़ गई| राजकुमारी ने अपनी एक सखी से उस राजकुमार से अपना मिलाप कराने के लिए अनुरोध किया| सखी ने राजकुमार के पास जाकर अपनी स्वामिनी की पीड़ा का वर्णन करके उससे राजकुमारी के पास चलने की प्रार्थना की|

राजकुमार ने राजकुमारी की सखी से महल के भीतर गुप्त रूप से जाने का उपाय पूछा तो सखी ने कहा, मैं रात्रि में महल के ऊपर से चमड़े की एक मज़बूत रस्सी नीचे लटका दूँगी, आप उसे पकड़कर निश्चिंत होकर ऊपर आ जाइएगा|’

रात्रि होने पर राजकुमार ने मन में विचार किया कि इस प्रकार छिपकर किसी पराई नारी से मिलना सर्वथा अनुचित होगा| राजकुमार ने उधर न जाने का ही निश्चय किया| उधर जब बनिये का लड़का संयोगवश रात में राजमहल के समीप पहुँचा तो नीचे लटकती रस्सी को देखकर कौतूहलवश ऊपर चढ़ गया| राजकुमारी ने उसे ही राजकुमार समझकर छिपाने के विचार से अँधेरा करके उसे अपनी बाँहों का सहारा दिया और स्नेह व आदर के साथ अपने पलंग पर बैठा दिया| राजकुमारी ने प्रेमपूर्वक उसे बढ़िया और स्वादिष्ट व्यंजन खिलाए और फिर बड़े ही प्रेमभरे शब्दों में पूछा, ‘आप कुछ बोलते क्यों नही?’

उसने अपना प्रिय वाक्य दोहरा दिया, ‘मनुष्य अपने प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लेता है|’

यह शब्द सुनते ही राजकुमारी को आभास हो गया कि यह युवक राजकुमार नही है, अतः उसे राजमहल से बाहर निकाल दिया|

आधी रात का समय था| महल से निकलकर बनिये का पुत्र समीप के एक खंडहरनुमा मंदिर में आकर सो गया| संयोगवश उस नगर का रक्षक अपनी प्रेयसी से मिलने वहाँ आ पहुँचा| उसको वहाँ सोया देखकर नगर रक्षक ने उसे जगाकर पूछा, ‘कौन हो भाई तुम, यहाँ क्यों सो रहे हो?’

‘भाई! मुझ अभागे का न तो कोई घर है न द्वार| दुनिया में मेरा कोई सगा-संबंधी भी नही है|’

‘कोई काम-धंधा क्यों नही करते?’ नगर रक्षक ने सख्त लहजे में पूछा|

‘कोई कितना भी परिश्रम क्यों न करे, मनुष्य अपने प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लेता है|’ उसने अपना वही पुराना रटा-रटाया वाक्य दोहरा दिया|

नगर रक्षक ने सोचा कोई बेवकूफ़ है, बोला, ‘यहाँ सोना मना है, कहीं और जाकर सोओ|’

नगर रक्षक का आदेश सुन वह उठकर चल दिया| परंतु अर्धनिद्रा की स्थिति में होने कारण कुछ दूर एक छोटे-से मकान के आंगन में जाकर सो गया| वही नगर रक्षक की युवा पुत्री विनयवती अपने प्रेमी से मिलने की प्रतीक्षा में बैठी थी| उसने अँधेरे में उसे ही अपना प्रेमी समझा और बोली, ‘क्या अभी तक आप मुझसे नाराज़ है, जो मुझसे बोल नही रहे?’

‘मनुष्य अपने प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लेता है|’ उसने अपने वही शब्द उसके सामने भी दोहरा दिए|

उसके इस प्रकार मुहँ खोलते ही विनयवती अपनी मूर्खता और अधीरता पर पश्चाताप करने लगी| उसने बनिये के लड़के को उसी वक्त वहाँ से भगा दिया|

विनयवती द्वारा दुत्कारे जाने के बाद वह नगर की गलियों में भटकने लगा| रास्ते में उसे गाजे-बाजे के साथ जाती बारात मिली तो वह भी उसी में शामिल हो गया| बारात जब लड़कीवालों के घर पहुँची और दुल्हन हाथ में जयमाला लिए जैसे ही दूल्हे के पास आई, उसी वक्त एक मदमस्त हाथी वहाँ आ पहुँचा| उसे देखते ही सारे बाराती इधर-उधर छिप गए| दूल्हा भी दुल्हन को छोड़कर कही जा छिपा| दुल्हन बनकर खड़ी युवती हाथी को देखकर थर-थर काँपने लगी| बनिये के पुत्र ने साहस करके उस युवती का हाथ थामा और सुरक्षित स्थान पर ले गया|

हाथी के चले जाने के बाद सारे बाराती और दूल्हा एक जगह इकट्ठे हुए| वर पक्ष ने दुल्हन के व्यवहार पर आपति करते हुए कहा, ‘तुम्हारी पुत्री पर-पुरुष को स्पर्श कर चुकी है|’

‘आप लोग कैसी बातें कर रहे है?’ दुल्हन के पिता ने वर पक्ष वालों से हाथ जोड़ते हुए कहा|

तभी दुल्हन बनी निरपराध युवती आगे बढ़ी और बोली, ‘मुझे मौत के मुहँ में धकेलकर केवल अपने प्राणों की चिंता करने वाला मेरा पति होने के योग्य ही नही है|’

‘ब…बेटी यह तू क्या कह रही है?’ युवती का पिता घबराकर बोला|

‘मैं ठीक कह रही हूँ पिताजी, संकट में साथ निभाने वाले अपने प्राणों को संकट में डालकर मेरी रक्षा करने वाले इस युवक से ही मैं विवाह करूँगी|’

इस वाद-विवाद में सवेरा हो गया| संयोगवश राजकुमारी और नगर रक्षक की पुत्री विनयवती भी वहाँ आ पहुँची| लोगों से सूचना पाकर राजप्रमुख भी वहाँ आ पहुँचा| राजप्रमुख ने बनिये के पुत्र से पूछा, ‘कौन हो तुम?’

मनुष्य अपने प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लेता है|’ उसने अपने शब्द दोहरा दिए|

यह सुनते ही राजकुमारी के मुहँ से निकल पड़ा- ‘विधाता भी उसे रोक नही सकता|’

उधर विनयवती भी अपने आप पर संयम खो बैठी और कहने लगी, ‘मुझे न अपने किए पर दुख है और न ही आश्चर्य|’

राज और नगर रक्षक को अपनी-अपनी पुत्रियों के मुहँ खोलने पर काफ़ी हैरानी हुई| राजा ने इस सारे कांड की गुप्तरूप से जाँच करवाई और सत्य का पता चलने पर दोनों कन्याओं का विवाह भी बनिये के पुत्र से कर दिया| सेठ ने भी अपनी पुत्री की इच्छानुसार उसका विवाह उसी के साथ कर दिया| इस प्रकार उसने ‘अपने प्राप्तव्य को अनायास ही प्राप्त कर लिया|’


कथा-सार

मनुष्य भाग्य से ज्यादा और समय से पहले कुछ भी प्राप्त नही कर सकता| इसलिए मनुष्य को अपना धन नष्ट हो जाने पर मायूस नही होना चाहिए और यदि कुछ अनायास ही प्राप्त हो जाए तो उसमें आश्चर्य भी नही करना चाहिए| इसके पीछे भाग्य रचयिता का ही हाथ होता है| न चाहते हुए भी बनिये के बेटे को इतना कुछ मिल गया, जो वह चाहकर भी प्राप्त नही कर सकता था|

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