अविमुक्त-क्षेत्र में शिवार्चन से यक्ष को गणेशत्व-प्राप्ति

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प्राचीन काल में हरिकेश नाम से विख्यात एक सौन्दर्यशाली यक्ष हुआ था, जो पूर्णभद्र का पुत्र था| हरिकेश महाप्रतापी, ब्राह्मण भक्त एवं धर्मात्मा था| जन्म से ही उसकी शंकरजी में प्रगाढ़ भक्ति थी|

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वह तन्मय होकर उन्हीं को नमस्कार करने, उन्हीं की भक्ति करने और उन्हीं का ध्यान करने में तत्पर रहता था| वह बैठते, सोते, चलते, खड़े होते, घूमते तथा खाते-पीते-सब समय सदा भगवान् शंकर के ध्यान में मग्न रहता था| 

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इस प्रकार पुत्र को शिव में लीं देखकर उसके पिता पूर्णभद्र ने कहा-'पुत्र! मैं तुम्हें अपना पुत्र नहीं मानता, मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अन्यथा ही उत्पन्न हुए हो; क्योंकि यक्षकुल में उत्पन्न होने वालों का आचरण ऐसा नहीं होता| तुम तो गुह्वाक हो| हे पुत्र! तुम ऐसा कर्म मत करो; क्योंकि तुम्हारे लिये ऐसी वृत्त नहीं बतलायी गयी है| गृहस्थ भी अन्य आश्रमों का कर्म नहीं करते| अतः तुम मानव-सुलभ आचारण को त्याग करके यक्षों के अनुकूल विविध कर्मों को सम्पन्न करो| यदि तुम इस प्रकार विमार्ग पर ही स्थिति रहोगे तो मनुष्य से उत्पन्न हुआ ही समझे जाओगे| अतः यक्ष जाति के अनुकूल विविध कर्मों का ठीक-ठीक आचरण करो| देखो, मैं भी निःसंदेह वैसा ही आचरण कर रहा हूँ|' प्रतापी पूर्णभद्र ने अपने पुत्र को इस प्रकार समझाने की चेष्टा की, परन्तु हरिकेश का मन शिवमय हो जाने के कारण पिता के समझाने का उस पर कोई प्रभाव न पड़ा| तब पिता पूर्णभद्र कुपित होकर बोला-'पुत्र! तुम शीघ्र ही मेरे घर से जाओ और जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाओ|' पिता के शब्दों को सुनकर उनकी आज्ञा का पालन करते हुए वह यक्ष अपने गृह तथा सम्बन्धियों का त्याग के निकल पड़ा और अविमुक्त-क्षेत्र (वाराणसी)-में जाकर अत्यन्त दुष्कर तपस्या में संलग्न हो गया|

वहाँ वह इन्द्रिय-समुदाय को संयमित कर शुष्क काष्ठ और पत्थर की भाँति निश्चल हो एकटक स्थाणु की भाँति स्थित हो गया| इस प्रकार निरन्तर तपस्या में लगे रहने वाले हरिकेश के एक सहस्त्र दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये| उसके शरीर पर विमौट जम गया| व्रज के सामान कठोर एवं तीखे मुखवाली चींटियों ने उसके शरीर में छिद्र कर उसका मांस, रुधिर और चमड़ा खा डाला, जिससे उसका अस्थिमात्र ही अवशेष रह गया| वह कुन्द, शंख और चन्द्रमा के सामान चमक रहा था| इतने पर भी वह भगवान् शंकर के ध्यान में ही लीन था| इसी समय कैलास पर्वत पर पार्वती देवी ने भगवान् शंकर से निवेदन किया-'प्रभो! मैं अविमुक्त-क्षेत्र का दर्शन करना चाहती हूँ; क्योंकि वाराणसी आपको परम प्रिय है|' इस प्रकार भवानी द्वारा निवेदन किये जाने पर भगवान् शंकर पार्वती के साथ वहाँ से चल पड़े और अविमुक्त-क्षेत्र का उन्हें दर्शन कराते हुए उसकी महिमा का वर्णन करने लगे| तदन्तर भगवान् शिव और पार्वती चलते-चलते उस स्थान पर जा पहुँचे, जहाँ हरिकेश यक्ष घोर तपस्या में निरत था| तब महादेवजी ने गिरिराजकुमारी पार्वती से भक्तराज यक्ष को कृपापूर्वक वर प्रदान करने के लिये इस प्रकार कहा-'भामिनी! यह मेरा भक्त है| तपस्या से इसके पाप नष्ट हो चुके हैं| अतः यह हम लोगों से वर प्राप्त करने का अधिकारी हो गया है|' तदन्तर भगवान् शंकर के ऐसा कहने पर पार्वती देवी उस गुह्वाक की ओर देखने लगीं, जिसका शरीर श्वेत रंग का हो गया था| चमड़ा गल गया था और मात्र अस्थिपंजर नसों से आबद्ध था| यक्ष को इस रूप में देखकर भगवती पार्वती ने महादेव जी से कहा-'महादेव! इस घोर तपस्वी को आप वरदान दीजिये, बड़ी कठिन तपस्या कर रहा है|'

भगवान् शंकर और भगवती पार्वती के आने की आहट पाकर वह यक्ष उनके चरणों पर गिर पड़ा| इस प्रकार उस हरिकेश को प्रदान किया, जिससे उसने गणसहित वृषध्वज महादेव जी को सामने उपस्थित देखा| तब भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर यक्ष से कहा-'यक्ष! मैं तुम्हें पहले वह वर देता हूँ, जिससे तुम्हारे शरीर का वर्ण सुन्दर हो जाय तथा तुम त्रिलोकी में देखने योग्य हो जाओ|' वरदान पाकर वह यक्ष अक्षत-शरीर से युक्त होकर भगवान् के चरणों में प्रणिपात करता हुआ बोला-'भगवन्! मुझे ऐसा वरदान दीजिये कि आप में मेरी अनन्य एवं अटल भक्ति हो जाय| मैं अक्षय अन्न का दाता तथा लोकों के गणों का अधीश्वर हो जाऊँ, जिससे आपके अविमुक्त स्थान का सदा दर्शन करता रहूँ| देवेश! मैं आप से यही उत्तम वर प्राप्त करना चाहता हूँ|' भगवान् शिव ने पुनः वर देते हुए कहा-'यक्ष! तुम जरा-मरण से विमुक्त, सम्पूर्ण रोगों से सभी के लिये अजेय, योगेश्वर्य से युक्त, लोकों के लिये अन्नदाता, क्षेत्रपाल, महाबली, महान् पराक्रमी, ब्राह्मण भक्त, मेरे प्रिय, त्रिनेत्रधारी, दण्डपाणि तथा महायोगी होओगे|' उद्भ्रम तथा सम्भ्रम-ये दोनों गण तुम्हारे सेवक होकर तुम्हारी आज्ञा से लोक का कार्य करेंगे|

इस प्रकार उस यक्ष को गणेश्वर बनाकर भगवान् शंकर उसके साथ कैलास लौट गये| अविमुक्त-क्षेत्र वाराणसी में शिवार्चन एवं तपःकर्म की महिमा कितनी अविस्मरणीय एवं फलप्रदायी है| 

भक्ति से सर्वातिशायी सामर्थ्य शर्त न मानने पर श्रुतायुध को भुगतना पड़ा नतीजा तपस्या का फल गणगौर कथा

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