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खजूर की गुठली (अलिफ लैला) – शिक्षाप्रद कथा

खजूर की गुठली (अलिफ लैला) - शिक्षाप्रद कथा

एक व्यापारी था| वह बहुत ही ईमानदार था| व्यापार के सिलसिले में वह अकसर दूसरे शहरों में जाता रहता था| एक बार व्यापार के सिलसिले में वह कहीं जा रहा था| सफर काफी लम्बा था अत: रास्ते में एक पेड़ के नीचे वह कुछ देर आराम करने के लिए रुक गया| कुछ देर आराम करने के बाद उसने खाने की पोटली खोली| उसमें उम्दा किस्म के मीठे-मीठे खजूर थे| वह खजूर खा-खाकर उसकी गुठलियां इधर-उधर फेंकने लगा|

अचानक एक भयानक राक्षस व्यापारी के सामने आकार खड़ा हो गया| इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता भयानक घनगर्ज के साथ राक्षस बोला, “अरे मुर्ख! तेरी यह हिम्मत? अब तू बच नहीं सकता| चल, मरने के लिए तैयार हो जा|”

राक्षस का डरावना रूप और उसके द्वारा मारे जाने की बात सुनकर व्यापारी बुरी तरह घबरा गया| उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे| आखिर क्यों यह राक्षस उस पर कुपित हुआ है और क्यों उसे मारना चाहता है और इससे पहले कि राक्षस उसका कोई अहित कर पाता कि हिम्मत जुटाकर उसने कहा, “महाशय, मुझसे क्या लगती हुई है? क्यों मारना चाहते हैं आप मुझे?”

“गलती नहीं, तुमसे अपराध हुआ है?” राक्षस ने और ऊंचे स्वर में कहा, “मेरा एक ही बेटा था, जिसे तूने मार डाला है|”

“मैंने?” व्यापारी ने आश्चर्य से कहा, “यह आप क्या कह रहे हैं? आपके बेटे को मैंने कब मारा?”

“तुमने खजूर खाकर उसकी जो गुठलियां फेंकी हैं, उन्हीं में से एक गुठली मेरे बेटे के सिर पर लगी, जिससे उसकी मौत हो गई|”

“महाशय! पहली बात तो यह है कि खजूर की गुठली लगने से कोई मर नहीं सकता, मगर फिर भी यदि ऐसा कुछ हुआ है, तो मैंने जानबूझकर तो आपके बेटे को खजूर की गुठली नहीं मारी|” व्यापारी ने अपना बचाव करते हुए कहा, “अनजाने में आपके के बेटे के सिर में गुठली लग गई और उसकी मौत हो गई| इसमें मेरा क्या दोष है? इसलिए आपको चाहिए कि मुझे माफ कर दें|”

“माफ कर दूं तुझे? अपने बेटे के हत्यारे को माफ कर दूं? यह हरगिज नहीं हो सकता|” राक्षस ने दांत पीसते हुए कहा|

उसने उससे बहुत विनती की किंतु राक्षस पर उसकी विनती का कोई असर नहीं पड़ा|

व्यापारी समझ गया कि अब उसकी मौत करीब आ गई है| अंत में उसने राक्षस से कहा, “मुझे आखिरी बार अल्लाह से दुआ कर लेने दीजिए|”

“ठीक है, कर लो|” राक्षस बोला|

व्यापारी ने अल्लाह से दुआ मांगी| फिर उसने राक्षस से कहा, “मेरी आखिरी इच्छा अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने की है| आप एक बार मुझे अपने घर जाने की इजाजत दीजिए| मैं आपसे वादा करता हूं कि कल सूर्योदय के पहले मैं यहां फिर से हाजिर हो जाऊंगा|”

राक्षस ने कुछ देर तक कुछ सोचा, फिर इस नतीजे पर पहुंचा कि व्यापारी की बातों पर विश्वास कर लेना चाहिए| अत: उसने उसे घर जाने की इजाजत दे दी| घर जाकर व्यापारी ने अपनी पत्नी और बच्चों से भेंट की| उसने उन्हें कुछ जरूरी हिदायत दी| पर राक्षस के बारे में उनसे चर्चा तक नहीं की और राक्षस के पास जाने के लिए रवाना हो गया|

अपने वादे के अनुसार दूसरे दिन व्यापारी ठीक समय पर उस पेड़ के पास पहुंच गया| राक्षस वहां मौजूद नहीं था| बेचारा व्यापारी मुंह लटकाए पेड़ के नीचे बैठ गया| तभी एक यात्री वहां एक हिरणी के साथ पहुंचा| उसने पेड़ के नीचे उदास बैठे व्यापारी को देखा तो सोचा कि जरूर कोई दुखिया किसी गम में डूबा बैठा है| आखिर जानना तो चाहिए कि इसे क्या कष्ट है| यही सोचकर वह यात्री उसके पास गया और बोला, “क्यों भाई, तुम यहां इस तरह उदास क्यों बैठे हो? और क्या तुम्हें पता नहीं कि यहां राक्षस रहते हैं| चलो, उठो यहां से| वरना राक्षस आकर खा जाएंगे|”

व्यापारी रुआंसा हो गया| बोला, “भाई! मुझे एक राक्षस का ही इंतजार है|”

“क्या? राक्षस का इंतजार? अरे भाई, तुम कहीं पागल तो नहीं हो|”

“नहीं भाई! दरअसल मैं अनजाने में हुए एक पाप की सजा भुगतने के लिए यहां बैठा हूं|” कहकर व्यापारी ने उसे अपनी दुखभरी कहानी कह सुनाई| फिर बोला, “महाशय, आज मेरी जिन्दगी का आखिरी दिन है| राक्षस आता ही होगा| इसलिए आप यहां से चले जाएं, वरना आप भी संकट में पड़ सकते हैं|”

व्यापारी यात्री को सचेत कर ही रहा था कि तब तक एक दूसरा यात्री, जिसके साथ दो काले कुत्ते थे, वहां आ गया| वह भी व्यापारी की बात सुनकर वहां रुक गया| कुछ समय बाद एक और वृद्ध वहां आ पहुंचा जिसके साथ गधी थी| उसने भी उन तीनों से पूछा कि भई, तुम लोग मरने के लिए यहां क्यों बैठे हो| यह तो राक्षसों का इलाका है| इस पर पहले यात्री ने उसे व्यापारी की बात बताई, फिर तीनों उस व्यापारी की सत्यनिष्ठा और ईमानदारी का गुणगान करने लगे कि मौका मिलने पर भी यह भला आदमी कहीं भाग नहीं गया और अपना वचन निभाने के लिए राक्षस का इंतजार कर रहा है| उनकी बात खत्म हुई ही थी कि गुस्से से तमतमाया हुआ राक्षस वहां आ पहुंचा| व्यापारी के साथ दूसरे लोगों को देखकर राक्षस आग-बबूला हो उठा और दहाड़ते हुए बोला, “अच्छा हुआ तू समय पर आ गया| पर अपने साथ अपने हिमायतियों को क्यों लाया है? तू क्या समझता है कि ये तुझे बचा लेंगे? याद रख, ये तीनों तेरी कोई मदद नहीं कर सकते| उल्टे इन्हें भी अपनी जान गंवानी पड़ेगी| तुझे मौत के मुंह में जाने से अब कोई बचा नहीं सकता| आज तेरी मौत होनी तय है|”

यह सुनकर उनमें से एक यात्री ने कहा, “महाशय, हम तो यात्री हैं| हम अपने रास्ते जा रहे थे| इसे यहां बैठे अपनी किस्मत पर आंसू बहाते देखा तो रुक गए|”

दूसरे यात्री ने भी राक्षस से यही बात कही|

“पर अब तुम तीनों मिलकर क्या करना चाहते हो?” राक्षस ने उन तीनों से पूछा, “क्या तुम्हारी मंशा मुझसे लड़ने की है?”

“नहीं, हम लोग आपसे भला क्यों लड़ेंगे| हम लोग आपको एक-एक कहानी सुनाना चाहते हैं| यदि आपके पास समय हो, तो पहले हमारी कहानियां सुन लीजिए|” पहले यात्री ने कहा, “किंतु शर्त यह है कि अगर आपको मेरी कहानी विचित्र और पसंददीदा लगे तो इस व्यापारी की एक चौथाई सजा माफ कर दें|”

कहानी का नाम सुनकर राक्षस खुश हो गया और उसका गुस्सा तथा चेहरे का तनाव कम हो गया| उसे कहानियां सुनने का बेहद शौक था| वह जमीन पर पालथी मारकर बैठ गया और बोला, “ठीक है, बारी-बारी से तुम लोग मुझे एक-एक कहानी सुनाओ|” तब पहले यात्री ने अपनी कहानी सुनानी आरंभ की –

 

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