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गुफा की आवाज – शिक्षाप्रद कथा

गुफा की आवाज - शिक्षाप्रद कथा

एक बूढ़ा शेर जंगल में मारा-मारा फिर रहा था| कई दिनों से उसे खाना नसीब नहीं हुआ था| दरअसल बुढ़ापे के कारण अब वह शिकार नहीं कर पाता था| छोटे-छोटे जानवर भी उसे चकमा देकर भाग जाते थे| जब भटकते-भटकते वह काफी थक गया तो एक स्थान पर रुककर सोचने लगा कि मैं क्या करूं? किधर जाऊं? कैसे बुझाऊं इस पेट की आग? काश! मैं भी दूसरे शाकाहारी जानवरों की भांति घास-पात, फल-फूल खा लेने वाला होता तो आज मुझे इस प्रकार भूखा न मारना पड़ता| अचानक उसकी नजर एक गुफा पर पड़ी| उसने सोचा कि इस गुफा में अवश्य ही कोई जंगली जानवर रहता होगा| मैं गुफा में जाकर बैठ जाता हूं, जैसे ही वह जानवर आएगा, मैं उसे खाकर अपना पेट भर लूंगा| शेर उस गुफा के अंदर जाकर बैठ गया और अपने शिकार की प्रतीक्षा करने लगा| वह गुफा एक लोमड़ी की थी| लोमड़ी ने गुफा में जाते शेर के पंजों के निशान देखे तो वह फौरन खतरा भांप गई| परन्तु संकट सामने देखकर उसने संयम नहीं खोया बल्कि उसकी बुद्धि तेजी से काम करने लगी कि इस शत्रु से कैसे बचा जाए? और फिर उसे एक तरकीब सूझ ही गई, वह गुफा के द्वार पर खड़ी होकर बोली – “गुफा! ओ गुफा!”

जब अंदर से गुफा ने कोई उत्तर न दिया तो लोमड़ी बोली – “सुन री गुफा! तेरी-मेरी यह संधि है कि जब भी मैं बाहर से आऊंगी तो तेरा नाम लेकर तुझे बुलाऊंगी, जिस दिनी तुम मेरी बात का उत्तर नहीं दोगी तो मैं तुम्हें छोड़कर किसी दूसरी गुफा में रहने चली जाऊंगी|” जवाब न मिलता देख लोमड़ी बार-बार अपनी बात दोहराने लगी|

अंदर बैठे शेर ने बार-बार लोमड़ी के मुंह से यह बात सुनी, तो वह यह समझ बैठा कि यह गुफा लोमड़ी के आने पर जरूर बोलती होगी| अत: अपनी आवाज को मधुर बनाकर वह बोला – “अरे आओ-आओ लोमड़ी मौसी| तुम्हारा स्वागत है|”

“अरे शेर मामा! तुम हो! बुढ़ापे में तुम्हारी बुद्धि इतनी भी नहीं सोच पा रही| कि गुफाएं कभी नहीं बोलती|” कहकर लोमड़ी तेजी से पलटकर भागी| शेर उसे पकड़ने के लिए गुफा से बाहर अवश्य आया, किन्तु तब तक वह चालाक लोमड़ी नौ दो ग्यारह हो चुकी थी|

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