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Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता10. विभूतियोगविभूतियां तथा योगशक्ति (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 10 शलोक 19 से 42)

विभूतियां तथा योगशक्ति (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 10 शलोक 19 से 42)

विभूतियां तथा योगशक्ति (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 10 शलोक 19 से 42)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 19

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥10- 19॥

Hमैं तुम्हें अपनी प्रधान प्रधान दिव्य आत्म विभूतियों के बारे में बताता हूँ क्योंकि हे कुरु श्रेष्ठ मेरे विसतार का कोई अन्त नहीं है।

EThe Lord (then) said, I shall now tell you of the power of my glories, for there is no end to my diverse manifestations.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥10- 20॥

Hमैं आत्मा हूँ, हे गुडाकेश, सभी जीवों के अन्तकरण में स्थित। मैं ही सभी जीवों का आदि (जन्म), मध्य और अन्त भी हूँ।

EI am, O Gudakesh, the Self that dwells within all beings, as also their primeval beginning, middle, and end.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 21
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥10- 21॥

Hआदित्यों (अदिति के पुत्रों) में मैं विष्णु हूँ। और ज्योतियों में किरणों युक्त सूर्य हूँ। मरुतों (49 मरुत नाम के देवताओं) में से मैं मरीचि हूँ। और नक्षत्रों में शशि (चन्द्र)।

EI am Vishnu among the twelve sons of Aditi4, the sun among lights, the god Mareechi among winds, and the sovereign moon among planets.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 22
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥10- 22॥

Hवेदों में मैं साम वेद हूँ। देवताओं में इन्द्र। इन्द्रियों में मैं मन हूँ। और जीवों में चेतना।

EI am also the Sam among the Ved, Indr among gods, the mind among senses, and the consciousness in beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 23
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥10- 23॥

Hरुद्रों में मैं शंकर (शिव जी) हूँ, और यक्ष एवं राक्षसों में कुबेर हूँ। वसुयों में मैं अग्नि (पावक) हूँ। और शिखर वाले पर्वतों में मैं मेरु हूँ।

EI am Shankar among Rudr,5 Kuber6 among demons and yaksh,7 fire among Vasu,8 and the Sumeru among lofty mountains.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 24
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥10- 24॥

Hहे पार्थ तुम मुझे पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति जानो। सेना पतियों में मुझे स्कन्ध जानो और जलाशयों में सागर।

EBe it known to you, Parth, that I am among priests the Chief Priest Brihaspati, Skand9 among martial chiefs, and the ocean among seas.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 25
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥10- 25॥

Hमहर्षीयों में मैं भृगु हूँ, शब्दों में मैं एक ही अक्षर ॐ हूँ। यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ और न हिलने वालों में हिमालय।

EI am Bhrigu among the great saints (maharshi), OM among words, the yagya of intoned prayers (jap-yagya) among yagya, and the Himalaya among stationary objects.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 26
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥10- 26॥

Hसभी वृक्षों में मैं अश्वत्थ हूँ, और देव ऋर्षियों में नारद। गन्धर्वों में मैं चित्ररथ हूँ और सिद्धों में भगवान कपिल मुनि।

EI am Ashwath (the Peepal) among trees, Narad among divine sages, Chitrarath among Gandharv, and the sage Kapil among men of attainment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 27
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥10- 27॥

Hसभी घोड़ों में से मुझे तुम अमृत के लिये किये सागर मंथन से उत्पन्न उच्चैश्रव समझो। हाथीयों का राजा ऐरावत समझो। और मनुष्यों में मनुष्यों का राजा समझो।

EKnow (also) that I am the nectar-born Uchchaishrav among horses, Airawat among pachyderms, and king among men.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 28
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥10- 28॥

Hशस्त्रों में मैं वज्र हूँ। गायों में कामधुक। प्रजा की बढौति करने वालों में कन्दर्प (काम देव) और सर्पों में मैं वासुकि हूँ।

EI am Vajr among weapons, Kamdhenu among cows, Kamdev for procreation, and Vasuki, the king of snakes.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 29
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥10- 29॥

Hनागों में मैं अनन्त (शेष नाग) हूँ और जल के देवताओं में वरुण। पितरों में अर्यामा हूँ और नियंत्रित करने वालों में यम देव।

EI am Sheshnag among the nag (snakes), the god Varun among beings of water, Aryama among ancestors, and Yamraj among rulers.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 30
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥10- 30॥

Hदैत्यों में मैं भक्त प्रह्लाद हूँ। परिवर्तन शीलों में मैं समय हूँ। हिरणों में मैं उनका इन्द्र अर्थात शेर हूँ और पक्षियों में वैनतेय (गरुड)।

EI am Prahlad among daitya (demons), unit of time for reckoners, the lion (mrigendr) among beasts, and Garud among birds.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 31
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥10- 31॥

Hपवित्र करने वालों में मैं पवन (हवा) हूँ और शस्त्र धारण करने वालों में भगवान राम। मछलियों में मैं मकर हूँ और नदीयों में जाह्नवी (गँगा)।

EI am the wind among powers that refine, Ram among armed warriors, the crocodile among fishes, and the sacred Bhagirathi Ganga27 among rivers.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 32
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥10- 32॥

Hसृष्टि का आदि, अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ हे अर्जुन। सभी विद्याओं मे से अध्यात्म विद्या मैं हूँ। और वाद विवाद करने वालों के वाद में तर्क मैं हूँ।

EI am, O Arjun , the beginning and end and also the middle of created beings, the mystic knowledge of Self among sciences, and the final arbiter among disputants.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 33
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥10- 33॥

Hअक्षरों में अ मैं हूँ। मैं ही अन्तहीन (अक्षय) काल (समय) हूँ। मैं ही धाता हूँ (पालन करने वाला), मैं ही विश्व रूप (हर ओर स्थित हूँ)।

EI am the vowel akar among the letters of the alphabet, dwandwa among compounds, the eternal Mahakal amidst mutable time, and also the God who holds and sustains all.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 34
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥10- 34॥

Hसब कुछ हर लेने वीली मृत्यु भी मैं हूँ और भविष्य में उत्पन्न होने वाले जीवों की उत्पत्ति भी मैं ही हूँ। नारीयों में कीर्ति (यश), श्री (धन संपत्ति सत्त्व), वाक शक्ति (बोलने की शक्ति), स्मृति (यादाश्त), मेधा (बुद्धि), धृति (स्थिरता) और क्षमा मैं हूँ।

EI am the death that annihilates all, the root of the creations to be, and Keerti among women-the embodiment of the feminine qualities of accomplishing action (keerti) vitality, speech, memory, awareness (medha), patience and forgiveness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 35
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥10- 35॥

Hगाये जाने वाली श्रुतियों (सामों) में मैं बृहत्साम हूँ और वैदिक छन्दों में गायत्री। महानों में मैं मार्ग-शीर्ष हूँ और ऋतुयों में कुसुमाकर (फूलों को करने वाली अर्थात वसन्त)।

EAnd I am the Sam Ved among scriptural hymn, the Gayatri among metrical compositions, the ascendant Agrahayan among months, and the spring among seasons.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 36
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥10- 36॥

Hछल करने वालों का जुआ मैं हूँ और तेजस्वियों का तेज मैं हूँ। मैं ही विजय (जीत) हूँ, मैं ही सही निश्चय (सही मार्ग) हूँ। मैं ही सात्विकों का सत्त्व हूँ।

EI am the deceit of cheating gamblers, the glory of renowned men, the victory of conquerors, the determination of the resolved, and the virtue of the pious.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 37
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥10- 37॥

Hवृष्णियों में मैं वासुदेव हूँ और पाण्डवों में धनंजय (अर्जुन)। मुनियों में मैं भगवान व्यास मुनि हूँ और सिद्ध कवियों में मैं उशना कवि (शुक्राचार्य) हूँ।

EI am Vasudev among the descendants of Vrishni, Dhananjay among the Pandav, Vedvyas among sages, and Shukracharya among poets.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 38
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥10- 38॥

Hदमन (लागू) करने वालों में दण्ड नीति मैं हूँ और विजय की इच्छा रखने वालों में न्याय (नीति) मैं हूँ। गोपनीय बातों में मौनता मैं हूँ और ज्ञानियों का ज्ञान मैं हूँ।

EAnd I am the oppression of tyrants, the wise conduct of those who aspire to succeed, silence among secrets, and also the knowledge of enlightened men.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 39
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥10- 39॥

Hजितने भी जीव हैं हे अर्जुन, उन सबका बीज मैं हूँ। ऍसा कोई भी चर अचर (चलने या न चलने वाला) जीव नहीं है जो मेरे बिना हो।

EAnd, O Arjun, I am also the seed from which all beings have sprung up, because there is nothing animate or inanimate which is without my maya.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 40
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥10- 40॥

Hमेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है हे परन्तप। मैने अपनी इन विभूतियों की विस्तार तुम्हें केवल कुछ उदाहरण देकर ही बताया है।

EWhat I have told you, O Parantap, is only a brief abstract of my countless glories.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 41
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥10- 41॥

Hजो कुछ भी (प्राणी, वस्तु आदि) विभूति मयी है, सत्त्वशील है, श्री युक्त हैं अथवा शक्तिमान है, उसे तुम मेरे ही अंश के तेज से उत्पन्न हुआ जानो।

EKnow that whatever is possessed of glory, beauty, and strength has arisen from my own splendour.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 10 शलोक 42
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥10- 42॥

Hऔर इस के अतिरिक्त बहुत कुछ जानने की तुम्हें क्या आवश्यकता है हे अर्जुन। मैंने इस संपूर्ण जगत को अपने एक अंश मात्र से प्रवेश करके स्थित कर रखा है।

EOr, instead of knowing anything more, O Arjun, just remember that I am here and I bear the whole world with just a fraction of my power.

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