🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏
Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता09. राजविद्याराजगुह्ययोगभगवान की महिमा (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 16 से 19)

भगवान की महिमा (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 16 से 19)

भगवान की महिमा (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 16 से 19)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 16

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥9- 16॥

Hमैं क्रतु हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, स्वधा मैं हूँ, मैं ही औषधी हूँ। मन्त्र मैं हूँ, मैं ही घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और यज्ञ में अर्पित करने का कर्म भी मैं ही हूँ।

EI am the action that is undertaken, the yagya, the fulfillment of earlier resolutions, the healer, the sacred prayer, the oblation as well as the sacred fire, and I am also the sacrificial act of oblation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 17
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च॥9- 17॥

Hमैं इस जगत का पिता हूँ, माता भी, धाता भी और पितामहः (दादा) भी। मैं ही वेद्यं (जिसे जानना चाहिये) हूँ, पवित्र ॐ हूँ, और ऋग, साम, और यजुर भी मैं ही हूँ।

EAnd I too am the bearer and preserver of the whole world as also the giver of rewards for action; father, mother and also the grandsire; the sacred, imperishable OM who is worthy of being known; and all Ved-Rig, Sam and Yajur.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 18
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥9- 18॥

Hमैं ही गति (परिणाम) हूँ, भर्ता (भरण पोषण करने वाला) हूँ, प्रभु (स्वामी) हूँ, साक्षी हूँ, निवास स्थान हूँ, शरण देने वाला हूँ और सुहृद (मित्र अथवा भला चाहने वाला) हूँ। मैं ही उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, आधार (स्थान) हूँ, कोष हूँ। मैं ही विकारहीन अव्यय बीज हूँ।

EI am the supreme goal, the sustainer and Lord of all, the maker of good and evil, the abode and shelter of all, the benefactor who wants nothing in return, the beginning and the end, the fountainhead as well as that in whom all beings are dissolved, and also the indestructible primal energy.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥9- 19॥

Hमैं ही भूमि को (सूर्य रूप से) तपाता हूँ और मैं ही जल को सोक कर वर्षा करता हूँ। मैं अमृत भी हूँ, मृत्यु भी, हे अर्जुन, और मैं ही सत् भी और असत् भी।

EI am the sun that burns, I draw the clouds and also make them rain, and, O Arjun, I am the drought of immortality as well as death, and I am also both substance and shadow.

Spiritual & Religious Store – Buy Online

View 100,000+ Products
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

नम्र निवेदन: वेबसाइट को और बेहतर बनाने हेतु अपने कीमती सुझाव कॉमेंट बॉक्स में लिखें, यह आपको अच्छा लगा हो तो अपनें मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें। धन्यवाद।
NO COMMENTS

LEAVE A COMMENT

🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏