🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏
Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता09. राजविद्याराजगुह्ययोगज्ञान वर्णन (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 1 से 6)

ज्ञान वर्णन (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 1 से 6)

ज्ञान वर्णन (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 9 शलोक 1 से 6)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 1

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥9- 1॥

Hमैं तुम्हे इस परम रहस्य के बारे में बताता हूँ क्योंकि तुममें इसके प्रति कोई वैर वहीं है। इसे ज्ञान और अनुभव सहित जान लेने पर तुम अशुभ से मुक्ति पा लोगे।

EI shall instruct you well with analogy in this mysterious knowledge, O the sinless, after knowing which you will be liberated from this sorrowful world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 2
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥9- 2॥

Hयह विद्या सबसे श्रेष्ठ है, सबसे श्रेष्ठ रहस्य है, उत्तम से भी उत्तम और पवित्र है, सामने ही दिखने वाली है (टेढी नहीं है), न्याय और अच्छाई से भरी है, अव्यय है और आसानी से इसका पालन किया जा सकता है।

EThis (knowledge) is the monarch of all learning as well as of all mysteries, most sacred, doubtlessly propitious, easy to practise, and indestructible.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 3
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥9- 3॥

Hहे परन्तप, इस धर्म में जिन पुरुषों की श्रद्धा नहीं होती, वे मुझे प्राप्त न कर, बार बार इस मृत्यु संसार में जन्म लेते हैं।

EMen who have no faith in this knowledge, O Parantap, do not attain to me and are doomed to roaming about the mortal world.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 4
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥9- 4॥

Hमैं इस संपूर्ण जगत में अव्यक्त (जो दिखाई न दे) मूर्ति रुप से विराजित हूँ। सभी जीव मुझ में ही स्थित हैं, मैं उन में नहीं।

EThe whole world is pervaded by me, the unmanifest Supreme Being, and all beings dwell within my will but I am not in them.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 5
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥9- 5॥

Hलेकिन फिर भी ये जीव मुझ में स्थित नहीं हैं। देखो मेरे योग ऍश्वर्य को, इन जीवों में स्थित न होते हुये भी मैं इन जीवों का पालन हार, और उत्पत्ति कर्ता हूँ।

EAnd even all beings are not within me, and such is the power of my yog-maya that my Spirit, the creator and preserver of all beings, is not within them.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 9 शलोक 6
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥9- 6॥

Hजैसे सदा हर ओर फैले हुये आकाश में वायु चलती रहती है, उसी प्रकार सभी जीव मुझ में स्थित हैं।

HBe it known to you that all beings dwell in me just as the great wind that roams everywhere always dwells in the sky.

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Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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