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श्री गीता महात्म्य (अध्याय 18 शलोक 67 से 78)

श्री गीता महात्म्य (अध्याय 18 शलोक 67 से 78)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 67

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥18- 67॥

Hइसे कभी भी उसे मत बताना जो तपस्या न करता हो, जो मेरा भक्त ना हो, और न उसे जिसमें सेवा भाव न हो, और न ही उसे जो मुझ में दोष निकालता हो।

EThis (the Geeta) which has been articulated for you must never be made known to one who is bereft of penance, devotion, and of willingness to listen, as also to one who speaks ill of me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 68
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥18- 68॥

Hजो इस परम रहस्य को मेरे भक्तों को बताता है, वह मेरी परम भक्ति करने के कारण मुझे ही प्राप्त करता है, इस में कोई संशय नहीं।

EThe one who, with firm devotion to me, imparts this most secret teaching of my worshippers will doubtlessly attain to me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 69
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥18- 69॥

Hन ही मनुष्यों में उस से बढकर कोई मुझे प्रिय कर्म करने वाला है, और न ही इस पृथ्वि पर उस से बढकर कोई और मुझे प्रिय होगा।

ENeither is there among mankind any doer who is dearer to me than this man, nor will there by any in the world who is dearer to me than him.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 70
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥18- 70॥

Hजो हम दोनों के इस धर्म संवाद का अध्ययन करेगा, वह ज्ञान यज्ञ द्वारा मेरा पूजन करेगा, यह मेरा मत है।

EAnd it is my belief that I shall have been worshipped through the yagya of knowledge by one who makes a thorough study of this sacred dialogue between us.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 71
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥18- 71॥

Hजो मनुष्य इसको श्रद्धा और दोष-दृष्टि रहित मन से सुनेगा, वह भी (अशुभ से) मुक्त हो पुण्य कर्म करने वालों के शुभ लोकों में स्थान ग्रहण करेगा।

EEven he will be freed from sins who just hears it (the Geeta) with devoutness and without any ill will, and he will secure the worlds of the righteous.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 72
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय॥18- 72॥

Hहे पार्थ, क्या यह तुमने एकाग्र मन से सुना है। हे धनंजय, क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न सम्मोह नष्ट हुआ है।

EHave you, O Parth, listened intently to my words and, O Dhananjay, is your delusion born our of ignorance dispelled?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 73
अर्जुन बोले (Arjun Said):
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥18- 73॥

Hहे अच्युत, आप की कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ, और मुझे वापिस स्मृति प्राप्त हुई है। मेरे सन्देह दूर हो गये हैं, और मैं आप के वचनों पर स्थित हुआ आप की आज्ञा का पालन करूंगा।

ESince my ignorance has been dispelled by your grace, O Achyut, and I have recovered discernment, I am free from doubt and shall follow your precept.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 74

संजय बोले (Sanjay Said):
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥18- 74॥

Hइस प्रकार मैंने भगवान वासुदेव और महात्मा पार्थ के इस अद्भुत रोम हर्षित करने वाले संवाद को सुना।

EThus have I heard the mysterious and sublime dialogue of Vasudeo and the sage-like Arjun.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 75
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥18- 75॥

Hभगवान व्यास जी के कृपा से मैंने इस परम गूह्य (रहस्य) योग को साक्षात योगेश्वर श्री कृष्ण के वचनों द्वारा सुना।

EIt is by the blessing of the most revered Vyas that I have heard this transcendental, most mysterious yog enunciated directly by the Lord of yog Krishn himself.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 76
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥18- 76॥

Hहे राजन, भगवान केशव और अर्जुन के इस अद्भुत पुण्य संवाद को बार बार याद कर मेरा हृदय पुनः पुनः हर्षित हो रहा है।

EThe recollection of the felicitous and marvellous colloquy between Keshav and Arjun transports me , O King (Dhritrashtr), to sublime joy time after time.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 77
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥18- 77॥

Hऔर पुनः पुनः भगवान हरि के उस अति अद्भुत रूप को याद कर, मुझे महान विस्मय हो रहा है हे राजन, और मेरा मन पुनः पुनः हर्ष से भरे जा रहा है।

ERecalling the amazing visage of the Lord again and again, O King, I am lost in wonder and ecstasy over and over.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 78
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥18- 78॥

Hजहां योगेश्वर कृष्ण हैं, जहां धनुर्धर पार्थ हैं, वहीं पर श्री (लक्ष्मी, ऐश्वर्य, पवित्रता), विजय, विभूति और स्थिर नीति हैं – यही मेरा मत है।

EGood fortune, conquest, splendour, and steadfast wisdom abide wherever are Lord Krishn and the noble archer Arjun : such is my conviction.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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