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निष्काम कर्मयोग (अध्याय 18 शलोक 56 से 66)

निष्काम कर्मयोग (अध्याय 18 शलोक 56 से 66)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 56

श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥18- 56॥

Hसभी कर्मों के सदा मेरा ही आश्रय लेकर करो। मेरी कृपा से तुम उस अव्यय शाश्वत पद को प्राप्त कर लोगे।

EAlthough engaged in action whole heartedly, one who finds refuge in me achieves the everlasting, indestructible, final bliss.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 57
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥18- 57॥

Hसभी कर्मों को अपने चित्त से मुझ पर त्याग दो (उन के फलों को मुझ पर छोड दो, और कर्मों को मेरे हवाले करते केवल मेरे लिये करो)। सदी इसी बुद्धि योग का आश्रय लेते हुये, सदा मेरे ही चित्त वाले बनो।

EEarnestly resigning all your deeds to me, finding shelter in me, and embracing the yog of knowledge, you should ever fix your mind on me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥18- 58॥

Hमुझ में ही चित्त रख कर, तुम मेरी कृसा से सभी कठिनाईयों को पार कर जाओगे। परन्तु यदि तुम अहंकार वश मेरी आज्ञा नहीं सुनोगे तो विनाश को प्राप्त होगे।

EEver resting on me, you will be saved from all afflictions and gain deliverance, but you shall be destroyed if out of arrogance you do not pay heed to my words.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 59
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥18- 59॥

Hयदि तुम अहंकार वश (अहंकार का आश्रय लिये) यह मानते हो कि तुम युद्ध नहीं करोगे, तो तुम्हारा यह व्यवसाय (धारणा) मिथ्या है, क्योंकि तुम्हारी प्रकृति तुम्हें (युद्ध में) नियोजित कर देगी।

EYour egotistic resolve not to fight is surely mistaken, for your nature will compel you to rake up arms in the war.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 60
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥18- 60॥

Hहे कौन्तेय, सभी अपने स्वभाव के कारण अपने कर्मों से बंधे हुये हैं। जिसे तुम मोह के कारण नहीं करना चाहते, उसे तुम विवश होकर फिर भी करोगे।

EBound by your natural calling even against your resolve, O son of Kunti, you will have to undertake the deed you are reluctant to do because of your self-deception.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 61
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥18- 61॥

Hहे अर्जुन, ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान हैं और अपनी माया द्वारा सभी जीवों को भ्रमित कर रहे हैं, मानो वे (प्राणी) किसी यन्त्र पर बैठे हों।

EPropelling all living things that bestride a body-which is but a contrivance-by his maya, O Arjun, God abides in the hearts of all beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 62
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥18- 62॥

Hउन्हीं की शरण में तुम संपूर्ण भावना से जाओ, हे भारत। उन्हीं की कृपा से तुम्हें परम शान्ति और शाश्वत स्थान प्राप्त होगा।

ESeek refuge with all your heart, O Bharat, in that God by whose grace you will attain to repose and the everlasting, ultimate bliss.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 63
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‌गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥18- 63॥

Hइस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्य से भी गूह्य इस ज्ञान का वर्णन किया। इस पर पूर्णत्या विचार करके जैसी तु्म्हारी इच्छा हो करो।

EThus have I imparted to you the knowledge which is the most mysterious of all abstruse learning; so reflect well on the whole of it (and then) you may do as you wish.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 64
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥18- 64॥

Hतुम एक बार फिर से सबसे ज्यादा रहस्यमयी मेरे परम वचन सुनो। तुम मुझे बहुत प्रिय हो, इसलिये मैं तुम्हारे हित के लिये तुम्हें बताता हूँ।

EListen yet again to my most secret words, indeed felicitous, that I am going to speak to you because you are the dearest to me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 65
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥18- 65॥

Hमेरे मन वाले बनो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करने वाले बनो, मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार तुम मुझे ही प्राप्त करोगे, मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो।

EI give you my sincere pledge, because you are so dear to me, that you must attain to me if you keep me in mind, adore me, worship me, and bow in obeisance to me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥18- 66॥

Hसभी धर्मों को त्याग कर (हर आश्रय त्याग कर), केवल मेरी शरण में बैठ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दुँगा, इसलिये शोक मत करो।

EGrieve not, for l shall free you from all sins if you abandon all other obligations (dharm) and seek refuge in me alone.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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