🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏

गुण भेद वर्णन (अध्याय 18 शलोक 19 से 40)

गुण भेद वर्णन (अध्याय 18 शलोक 19 से 40)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 19

 श्री भगवान बोले (THE LORD SAID):

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥18- 19॥

Hज्ञान (कोई जानकारी), कर्म और कर्ता भी साँख्य सिद्धांत में गुणों के अनुसार तीन प्रकार के बताये गये हैं। उन का भी तुम मुझसे यथावत श्रवण करो।

EListen to me well on how even knowledge and action and the doer have been graded into three kinds each, in the Sankhya philosophy of properties (gun).
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 20
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥18- 20॥

Hजिस ज्ञान द्वारा मनुष्य सभी जीवों में एक ही अव्यय भाव (परमेश्वर) को देखता है, एक ही अविभक्त (जो बाँटा हुआ नहीं है) को विभिन्न विभिन्न रूपों में देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्विक जानो।

EKnow that knowledge as immaculate (sattwik) by which one perceives the reality of the indestructible God as an undivided entity in all divided beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥18- 21॥

Hजिस ज्ञान द्वारा मनुष्य सभी जीवों को अलग अलग विभिन्न प्रकार का देखता है, उस ज्ञान दृष्टि को तुम राजसिक जानो।

EKnow that knowledge as tainted by passion by which one perceives divided entities in all separate beings.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥18- 22॥

Hऔर जिस ज्ञान से मनुष्य एक ही व्यर्थ कार्य से जुड जाता है मानो वही सब कुछ हो, वह तत्वहीन, अल्प (छोटे) ज्ञान को तुम तामसिक जानो।

EAnd know that knowledge as besmirched by ignorance (tamas) which adheres to the body alone as if it were the whole truth, and which is irrational, unfounded on truth, and petty.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 23
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥18- 23॥

Hजो कर्म नियत है (कर्तव्य है), उसे संग रहित और बिना राग द्वेष के किया गया है, जिसे फल की इच्छा नहीं रख कर किया गया है, उस कर्म को सात्विक कहा जाता है।

EThat action is said to be immaculate which is ordained and embarked on with detachment, by one who is free from infatuation as well as loathing, and who does not aspire to any reward.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 24
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥18- 24॥

Hजो कर्म बहुत परिश्रम से फल की कामना करते हुये किया गया है, अहंकार युक्त पुरुष द्वारा किया गया है, वह कर्म राजसिक है।

EAnd that action is said to be of the nature of passion which is strenuous and entered upon by one who covets rewards and is egotisti.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 25
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥18- 25॥

Hजो कर्म सामर्थय का, परिणाम का, हानि और हिंसा का ध्यान न करते हुये मोह द्वारा आरम्भ किया गया है, जो कर्म तामसिक कहलाता है।

EThat action is said to be unenlightened which is taken up out of sheer ignorance and with disregard for outcome, loss to oneself, and injury to others, as well as for one’s own competence.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥18- 26॥

Hजो कर्ता संग मुक्त है, ‘अहम’ वादी नहीं है, धृति (स्थिरता) और उत्साह पूर्ण है, तथा कार्य के सिद्ध और न सिद्ध होने में एक सा है (अर्थात फल से जिसे कोई मतलब नहीं), ऐसे कर्ता को सात्विक कहा जाता है।

EThat doer is said to be of immaculate nature who is free from attachment, who does not indulge in arrogant speech, and who is endowed with patience and vigour as well as unswayed by success and failure.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 27
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥18- 27॥

Hजो कर्ता रागी होता है, अपने किये काम के फल के प्रति इच्छा और लोभ रखता है, हिंसात्मक और अपवित्र वृत्ति वाला होता है, तथा (कर्म के सिद्ध होने या न होने पर) प्रसन्नता और शोक ग्रस्त होता है, उसे राजसिक कहा जाता है।

EThat doer is said to be of the attribute of passion who Is impulsive, covetous of the fruits of action, acquisitive, pernicious, vitiated, and subject to joy and sorrow.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 28
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥18- 28॥

Hजो कर्ता अयुक्त (कर्म भावना का न होना, सही चेतना न होना) हो, स्तब्ध हो, आलसी हो, विषादी तथा दीर्घ सूत्री हो (लम्बा खीचने वाला हो) (जिसकी कर्म न करने में ही रुची हो तथा आलस से भरा हो) – ऐसे कर्ता को तामसिक कहते हैं।

EThat doer is said to be of the attribute of ignorance who is fickle, uncouth, vain, devious, spiteful, dispirited, lazy, and procrastinatin.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥18- 29॥

Hहे धनंजय, अब तुम अशेष रूप से अलग अलग बुद्धि तथा धृति (स्थिरता) के भी तीनों गुणों के अनुसार जो भेद हैं, वे सुनो।

EListen to me, too, O Dhananjay, on the threefold classification according to the properties of nature as I make them exhaustively and respectively, of intellect, steadfastness, and happiness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 30
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥18- 30॥

Hप्रवृत्ति (किसी भी चीज़ या कर्म में लगना) और निवृत्ति (किसी भी चीज़ या कर्म से मानसिक छुटकारा पाना) क्या है (तथा किस चीज में प्रवृत्त होना चाहिये और किस से निवृत्त होना चाहिये), कार्य क्या है, और अकार्य (कार्य न करना) क्या है, भय क्या है और अभय क्या है, किस से बन्धन उत्पन्न होता है, और किस से मोक्ष उत्पन्न होता है – जो बुद्धि इन सब को जानती है (इनका भेद देखती है), हे पार्थ वह बुद्धि सात्त्विकहै।

EThat intellect is immaculate, O Parth, which is aware of the essence, of the way of inclination as also of renunciation, of worthy and unworthy action, of fear and fearlessness, and of bondage and liberation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥18- 31॥

Hहे पार्थ, जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य अपने धर्म (कर्तव्य) और अधर्म को, तथा कार्य (जो करना चाहिये) और अकार्य को सार से नहीं जानता, वह बुद्धि राजसिक है।

EThat intellect is of the nature of passion and moral blindness, O Parth, by which one cannot even know the righteous and the unrighteous as well as what is worthy or unworthy of being done.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥18- 32॥

Hहे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य अधर्म को ही धर्म मानता है, अंधकार से ठकी जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य सभी हितकारी गुणों अथवा कर्तव्यों को विपरीत ही देखता है, वह बुद्धि तामसिक है।

EThat intellect is of the nature of ignorance, O Parth, which is enveloped in darkness and which apprehends the sinful as virtuous and views everything in a distorted way.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 33
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥18- 33॥

Hहे पार्थ, जिस धृति (मानसिक स्थिरता) द्वारा मनुष्य अपने प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को नियमित करता है, तथा उन्हें नित्य योग साधना में प्रविष्ट करता है, ऐसी धृति सातविक है।

EThat resolute steadfastness, by which, O Parth, one governs through the practice of yog operations of the mind, the life-breaths, and the senses, is immaculate.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 34
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥18- 34॥

Hहे अर्जुन, जब मनुष्य फलों की इच्छा रखते हुये, अपने (स्वार्थ हेतु) धर्म, इच्छा और धन की प्राप्ति के लिये कर्मों तथा चेष्टाओं में प्रवृत्त रहता है, वह धर्ति राजसिक है हे पार्थ।

EThat steadfastness, O Parth, by which the avaricious man holds fast and acquisitively to obligations, wealth, and pleasure, is of the nature of passion and moral blindness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 35
शलोक 35
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥18- 35॥

Hहे पार्थ, जिस दुर्बुद्धि भरी धृति के कारण मनुष्य स्वप्न (निद्रा), भय, शोक, विषाद, मद (मूर्खता) को नहीं त्यागता, वह तामसिक है।

E(And) that steadfastness, O Parth, by which the evilminded man declines to forsake sloth, fear, worry, grief, and also arrogance, is of the nature of ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 36, 37
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥18- 36॥

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥18- 37॥

Hउसी प्रकार, हे भरतर्षभ, तुम मुझ से तीन प्रकार के सुख के विषय में भी सुनो। वह सुख जो (योग) अभ्यास द्वारा प्राप्त होता है, तथा जिस से मनुष्य को दुखों का अन्त प्राप्त होता है, जो शुरु में तो विष के समान प्रतीत होता है (प्रिय नहीं लगता), परन्तु उस का परिणाम अमृत समान होता है (प्रिय लगता है), उस स्वयं की बुद्धि की प्रसन्नता (सुख) से प्राप्त होने वाले सुख को सात्विक कहा जाता है।

ENow listen to me, O the best of Bharat, on the three kinds of happiness, including the felicity, which one comes to dwell in, by practice and thus achieves cessation of griefs. That happiness which is at first like poison but finally tastes like nectar, for it issues forth from the lucidity of an intellect that has realized the Self, is of an impeccable nature.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 38
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥18- 38॥

Hजो सुख भावना विषयों की इन्द्रियों के संयोग से प्राप्त होती है (जैसी स्वादिष्ट भोजन आदि), जो शुरु में तो अमृत समान प्रतीत होता है, परन्तु उसका परिणाम विष जैसा होता है, उस सुख को तुम राजसिक जानो।

EThat happiness which springs from the association of the senses with their objects, and which is like nectar at the beginning but like gall at the end, is said to be tainted with passion and moral blindness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥18- 39॥

Hजो सुख शुरु में तथा अन्त में भी आत्मा को मोहित करता है, निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होने वाले ऐसी सुख भावना को तामसिक कहा जाता है।

EThat happiness which both initially and finally beguile the Self, and which arises from slumber, lethargy, and negligence, is said to be of the nature of ignorance.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 18 शलोक 40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥18- 40॥

Hऐसा कोई भी जीव नहीं है, न इस पृथवि पर और न ही दिव्य लोक के देवताओं में, जो प्रकृति से उत्पन्न हुये इन तीन गुणों से मुक्त हो।

EThere is no being, either on earth or among the dwellers of heaven, who is entirely free from the three properties born of nature.
Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

नम्र निवेदन: वेबसाइट को और बेहतर बनाने हेतु अपने कीमती सुझाव कॉमेंट बॉक्स में लिखें, यह आपको अच्छा लगा हो तो अपनें मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें। धन्यवाद।
NO COMMENTS

LEAVE A COMMENT

🙏 सतनाम वाहे गुरु, गुरु पर्व की असीमित शुभकामनाएं... आप सभी पर वाहे गुरु की मेहर हो! 23 Nov 2018 🙏