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Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता03. कर्मयोगयज्ञादि कर्म अनिवार्य (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 9 से 24)

यज्ञादि कर्म अनिवार्य (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 9 से 24)

यज्ञादि कर्म अनिवार्य (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 9 से 24)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 9

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥3- 9॥

H केवल यज्ञा समझ कर तुम कर्म करो हे कौन्तेय वरना इस लोक में कर्म बन्धन का कारण बनता है। उसी के लिये कर्म करते हुऐ तुम संग से मुक्त रह कर समता से रहो॥ E Since the conduct of yagya is the only action and all other business in which people are engaged are only forms of worldly bondage, O son of Kunti, be unattached and do your duty to God well.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 10
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥3- 10॥ H यज्ञ के साथ ही बहुत पहले प्रजापति ने प्रजा की सृष्टि की और कहा की इसी प्रकार कर्म यज्ञ करने से तुम बढोगे और इसी से तुम्हारे मन की कामनाऐं पूरी होंगी॥ E At the beginning of kalp-the course of self-realization Prajapati Brahma shaped yagya along with mankind and enjoined on them to ascend by yagya which could give them what their hearts aspired to.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 11
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥3- 11॥ H तुम देवताओ को प्रसन्न करो और देवता तुम्हें प्रसन्न करेंगे, इस प्रकार परस्पर एक दूसरे का खयाल रखते तुम परम श्रेय को प्राप्त करोगे॥ E And may you cherish gods by yagya and may gods foster you, for this is the means by which you will finally achieve the ultimate state.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 12
इष्टान्भोगान्हि वह देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥3- 12॥ H यज्ञों से संतुष्ट हुऐ देवता तुम्हें मन पसंद भोग प्रदान करेंगे। जो उनके दिये हुऐ भोगों को उन्हें दिये बिना खुद ही भोगता है वह चोर है॥ E The gods you foster by yagya will shower upon you without asking all the joys you wish for, but the man who avails himself of these joys without having paid for them is truly a thief.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 13
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा यह पचन्त्यात्मकारणात्॥3- 13॥ H जो यज्ञ से निकले फल का आनंद लेते हैं वह सब पापों से मुक्त हो जाते हैं लेकिन जो पापी खुद पचाने को लिये ही पकाते हैं वे पाप के भागीदार बनते हैं॥ E The wise who partake of what is left over from yagya are rid of all evil, but the sinners who cook only for the sustenance of their bodies partake of nothing but sin.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 14
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥3- 14॥ H जीव अनाज से होते हैं। अनाज बिरिश से होता है। और बिरिश यज्ञ से होती है। यज्ञ कर्म से होता है॥ (यहाँ प्राकृति के चलने को यज्ञ कहा गया है) E All beings get their life from food, food grows from rain, rain emerges from yagya, and yagya is an outcome of action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 15
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥3- 15॥ H कर्म ब्रह्म से सम्भव होता है और ब्रह्म अक्षर से होता है। इसलिये हर ओर स्थित ब्रह्म सदा ही यज्ञ में स्थापित है। E Be it known to you that action arose from the Ved and the Ved from the indestructible Supreme Spirit, so that the allpervasive, imperishable God is ever present in yagya.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 16
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥3- 16॥ H इस तरह चल रहे इस चक्र में जो हिस्सा नहीं लेता, सहायक नहीं होता, अपनी ईन्द्रीयों में डूबा हुआ वह पाप जीवन जीने वाला, व्यर्थ ही, हे पार्थ, जीता है॥ E The man in this world, O Parth, who loves sensual pleasure and lead an impious life, and does not conduct himself in accordance with the thus prescribed cycle (of Selfrealization), leads but a futile life.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 17
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥3- 17॥ H लेकिन जो मानव खुद ही में स्थित है, अपने आप में ही तृप्त है, अपने आप में ही सन्तुष्ट है, उस के लिये कोई भी कार्य नहीं बचता॥ E But there remains nothing more to do for the man who rejoices in his Self, finds contentment in his Self, and feels adequate in his Self.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 18
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥3- 18॥ H न उसे कभी किसी काम के होने से कोई मतलब है और न ही न होने से। और न ही वह किसी भी जीव पर किसी भी मतलब के लिये आश्रय लेता है॥ E Such a man has neither anything to gain from action nor anything to lose from inaction, and he has no interest in any being or any object.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 19
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥3- 19॥ H इसलिये कर्म से जुड़े बिना सदा अपना कर्म करते हुऐ समता का अचरण करो॥ बिना जुड़े कर्म का आचरण करने से पुरुष परम को प्राप्त कर लेता है॥ E So always do what is right for you to do in the spirit of selflessness, for in doing his duty the selfless man attains to God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 20
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥3- 20॥ H कर्म के द्वारा ही जनक आदि सिद्धी में स्थापित हुऐ थे। इस लोक समूह, इस संसार के भले के लिये तुम्हें भी कर्म करना चाहिऐ॥ E Since sages such as Janak had also attained to the ultimate realization by action, and keeping in mind, the preservation of the (God made) order, it is incumbent upon you to act.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 21
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥3- 21॥

क्योंकि जो ऐक श्रेष्ठ पुरुष करता है, दूसरे लोग भी वही करते हैं। वह जो करता है उसी को प्रमाण मान कर अन्य लोग भी पीछे वही करते हैं॥

Others emulate the actions of a great man and closely follow the example set by him.

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 22
न में पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥3- 22॥ H हे पार्थ, तीनो लोकों में मेरे लिये कुछ भी करना वाला नहीं है। और न ही कुछ पाने वाला है लेकिन फिर भी मैं कर्म में लगता हूँ॥ E Although, O Parth, there is no task in all the three worlds which I have to do, and neither is there any worthwhile object which I have not achieved, I am yet engaged in action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 23
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥3- 23॥ H हे पार्थ, अगर मैं कर्म में नहीं लगूँ तो सभी मनुष्य भी मेरे पीछे वही करने लगेंगे॥ E For should I not be diligent in the performance of my task, O Parth, other men will follow my example in every way.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 24
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥3- 24॥ H अगर मै कर्म न करूँ तो इन लोकों में तबाही मच जायेगी और मैं इस प्रजा का नाशकर्ता हो जाऊँगा॥ E If I do not perform my action well, the whole world will perish and I Shall be the cause of varnsankar and so a destroyer of mankind.

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