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कर्तव्य व कर्म का महत्व (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 1 से 8)

कर्तव्य व कर्म का महत्व (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 3 शलोक 1 से 8)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 1

अर्जुन बोले (Arjun Said):

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥3- 1॥

H हे केशव, अगर आप बुद्धि को कर्म से अधिक मानते हैं तो मुझे इस घोर कर्म में क्यों न्योजित कर रहे हैं॥ E 0 Janardan, if you think knowledge superior to action, why do you, O Keshav, ask me to engage in fearsome action?
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 2
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव में।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥3- 2॥ H मिले हुऐ से वाक्यों से मेरी बुद्धि शंकित हो रही है। इसलिये मुझे वह एक रस्ता बताईये जो निष्चित प्रकार से मेरे लिये अच्छा हो॥ E Since your complex words are so confusing to my mind, kindly tell me the one way by which I may attain to the state of blessedness.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 3

श्रीभगवान बोले (THE LORD SAID):

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥3- 3॥

H हे नि़ष्पाप, इस लोक में मेरे द्वारा दो प्रकार की निष्ठाऐं पहले बताई गयीं थीं। ज्ञान योग सन्यास से जुड़े लोगों के लिये और कर्म योग उनके लिये जो कर्म योग से जुड़े हैं॥ E I told you before, O the sinless (Arjun), two ways of spiritual discipline, the Way of Discrimination or Knowledge for sages and the Way of Selfless Action for men of action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 4
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥3- 4॥ H कर्म का आरम्भ न करने से मनुष्य नैष्कर्म सिद्धी नहीं प्राप्त कर सकता अतः कर्म योग के अभ्यास में कर्मों का करना जरूरी है। और न ही केवल त्याग कर देने से सिद्धी प्राप्त होती है॥ E Man neither attains to the final state of actionlessness by desisting from work, nor does he achieve Godlike perfection by just renunciation of work.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 5
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥3- 5॥ H कोई भी एक क्षण के लिये भी कर्म किये बिना नहीं बैठ सकता। सब प्रकृति से पैदा हुऐ गुणों से विवश होकर कर्म करते हैं॥ E Since all men have doubtlessly sprung from nature, no one can at any time live even for a moment without action.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 6
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥3- 6॥ H कर्म कि इन्द्रीयों को तो रोककर, जो मन ही मन विषयों के बारे में सोचता है उसे मिथ्या अतः ढोंग आचारी कहा जाता है॥ E That deluded man is a dissembler who apparently restrains his senses by violence2 but whose mind continues to be preoccupied with objects of their gratification.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 7
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥3- 7॥ H हे अर्जुन, जो अपनी इन्द्रीयों और मन को नियमित कर कर्म का आरम्भ करते हैं, कर्म योग का आसरा लेते हुऐ वह कहीं बेहतर हैं॥ E And, O Arjun, that man is meritorious who restrains his senses with his mind and employs his organs of action to do selfless work in a spirit of complete detachment.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 3 शलोक 8
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥3- 8॥ H जो तुम्हारा काम है उसे तुम करो क्योंकि कर्म से ही अकर्म पैदा होता है, मतलब कर्म योग द्वारा कर्म करने से ही कर्मों से छुटकारा मिलता है। कर्म किये बिना तो यह शरीर की यात्रा भी संभव नहीं हो सकती। शरीर है तो कर्म तो करना ही पड़ेगा॥ E You ought to do your prescribed action as enjoined by scripture, for doing work is better than not doing any, and in the absence of it even the journey of your body may not be completed.

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