Homeधार्मिक ग्रंथसम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता07. ज्ञानविज्ञानयोगभक्तों की महिमा (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 7 शलोक 13 से 19)

भक्तों की महिमा (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 7 शलोक 13 से 19)

भक्तों की महिमा (सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता – अध्याय 7 शलोक 13 से 19)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 13

श्रीभगवानुवाच (THE LORD SAID):

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥7- 13॥

H इन तीन गुणों के भाव से यह सारा जगत मोहित हुआ,  मुझ अव्यय और परम को नहीं जानता।

E Since the whole world is deluded by feelings resulting from the operation of the three properties, it is unaware of my imperishable essence that is beyond them.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 14
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥7- 14॥

H गुणों का रूप धारण की मेरी इस दिव्य माया को पार करना अत्यन्त कठिन है। लेकिन जो मेरी ही शरण में आते हैं वे इस माया को पार कर जाते हैं।

E This divine three-propertied yog-maya of mine is most difficult to overcome, but they who seek refuge in me get over the illusion and achieve salvation.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 15
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥7- 15॥

H बुरे कर्म करने वाले, मूर्ख, नीच लोग मेरी शरण में नहीं आते। ऍसे दुष्कृत लोग, माया द्वारा जिनका ज्ञान छिन चुका है वे असुर भाव का आश्रय लेते हैं।

E The ignorant and unwise are the most despicable of men and doers of wickedness, because deluded by maya and having demoniacal qualities they do not worship me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 16
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥7- 16॥

H हे अर्जुन, चार प्रकार के सुकृत लोग मुझे भजते हैं। मुसीबत में जो हैं, जिज्ञासी, धन आदि के इच्छुक, और जो ज्ञानी हैं, हे भरतर्षभ।

E Four kinds of devotees, O the best of Bharat, worship me : the ones who desire material rewards, the distressed and those men of knowledge who aspire to know me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥7- 17॥

H उनमें से ज्ञानी ही सदा अनन्य भक्तिभाव से युक्त होकर मुझे भजता हुआ सबसे उत्तम है। ज्ञानी को मैं बहुत प्रिय हूँ और वह भी मुझे वैसे ही प्रिय है।

E To the wise man of knowledge who worships me, the one God, with steady love and devotion, I am the dearest and so is he to me.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 18
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥7- 18॥

H यह सब ही उदार हैं, लेकिन मेरे मत में ज्ञानी तो मेरा अपना आत्म ही है। क्योंकि मेरी भक्ति भाव से युक्त और मुझ में ही स्थित रह कर वह सबसे उत्तम गति – मुझे, प्राप्त करता है।

E Although they are all generous because they worship me with devotion, the wise man of realization is- I believeidentical with me, his supreme goal.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 7 शलोक 19
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥7- 19॥

H बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानमंद मेरी शरण में आता है। वासुदेव ही सब कुछ हैं, इसी भाव में स्थिर महात्मा मिल पाना अत्यन्त कठिन है।

E The great Soul is indeed most rare who worhips me with the knowledge, acquired at the end of many births, that I (Vasudev) am the only reality.

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