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अध्याय 343

महाभारत संस्कृत - शांतिपर्व

1 [अतिथि] उपदेशं तु ते विप्र करिष्ये ऽहं यथागमम
पुरुणा मे यथाख्यातम अर्थतस तच च मे शृणु

2 यत्र पूर्वाभिसर्गेण धर्मचक्रं परवर्तितम
नैमिषे गॊमतीतीरे तत्र नागाह्वयं पुरम

3 समग्रैस तरिदशैस तत्र इष्टम आसीद दविजर्षभ
यत्रेन्द्रातिक्रमं चक्रे मान्धाता राजसत्तमः

4 कृताधिवासॊ धर्मात्मा तत्र चक्षुः शरवा महा
पद्मनाभॊ महाभागः पद्म इत्य एव विश्रुतः

5 स वाचा कर्मणा चैव मनसा च दविजर्षभ
परसादयति भूतानि तरिविधे वर्त्मनि सथितः

6 साम्ना दानेन भेदेन दन्देनेति चतुर्विधम
विषमस्थं जनं सवं च चक्षुर धयानेन रक्षति

7 तम अभिक्रम्य विधिना परस्तुम अर्हसि कान्स्कितम
स ते परमकं धर्मन मिथ्या दर्शयिष्यति

8 स हि सर्वातिथिर नागॊ बुद्धिशास्त्रविशारदः
गुणैर अनवमैर युक्तः समस्तैर आभिकामिकैः

9 परकृत्या नित्यसलिलॊ नित्यम अध्ययने रतः
तपॊ दमाभ्यां संयुक्तॊ वृत्तेनानवरेण च

10 यज्वा दानरुचिः कषान्तॊ वृत्ते च परमे सथितः
सत्यवाग अनसूयुश च शीलवान अभिसंश्रितः

11 शेषान्न भॊक्ता वचनानुकूलॊ; हितार्जवॊत्कृष्ट कृताकृतज्ञः
अवैरकृद भूतहिते नियुक्तॊ; गङ्गाह्रदाम्भॊ ऽभिजनॊपपन्नः

Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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