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अध्याय 150

महाभारत संस्कृत - अनुशासनपर्व

1 कार्यते यच च करियते सच चासच च कृतं ततः
तत्राश्वसीत सत्कृत्वा असत्कृत्वा न विश्वसेत

2 काल एवात्र कालेन निग्रहानुग्रहौ ददत
बुद्धिम आविश्य भूतानां धर्मार्थेषु परवर्तते

3 यदा तव अस्य भवेद बुद्धिर धर्म्या चार्थप्रदर्शिनी
तदाश्वसीत धर्मात्मा दृढबुद्धिर न विश्वसेत

4 एतावन मात्रम एतद धि भूतानां पराज्ञलक्षणम
कालयुक्तॊ ऽपय उभय विच छेषम अर्थं समाचरेत

5 यथा हय उपस्थितैश्वर्याः पूजयन्ते नरा नरान
एवम एवात्मनात्मानं पूजयन्तीह धार्मिकाः

6 न हय अधर्मतया धर्मं दद्यात कालः कथं चन
तस्माद विशुद्धम आत्मानं जानीयाद धर्मचारिणम

7 सप्रष्टुम अप्य असमर्थॊ हि जवलन्तम इव पावकम
अधर्मः सततॊ धर्मं कालेन परिरक्षितम

8 कार्याव एतौ हि कालेन धर्मॊ हि विजयावहः
तरयाणाम अपि लॊकानाम आलॊक करणॊ भवेत

9 तत्र कश चिन नयेत पराज्ञॊ गृहीत्वैव करे नरम
उह्यमानः स धर्मेण धर्मे बहु भयच छले

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