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अध्याय 10

महाभारत संस्कृत - आदिपर्व

1 [र] मम पराणसमा भार्या दष्टासीद भुजगेन ह
तत्र मे समयॊ घॊर आत्मनॊरग वै कृतः

2 हन्यां सदैव भुजगं यं यं पश्येयम इत्य उत
ततॊ ऽहं तवां जिघांसामि जीवितेन विमॊक्ष्यसे

3 [दु] अन्ये ते भुजगा विप्र ये दशन्तीह मानवान
डुण्डुभान अहि गन्धेन न तवं हिंसितुम अर्हसि

4 एकान अर्थान पृथग अर्थान एकदुःखान पृथक सुखान
डुण्डुभान धर्मविद भूत्वा न तवं हिंसितुम अर्हसि

5 [सूत] इति शरुत्वा वचस तस्य भुजगस्य रुरुस तदा
नावदीद भयसंविग्न ऋषिं मत्वाथ डुण्डुभम

6 उवाच चैनं भगवान रुरुः संशमयन्न इव
कामया भुजग बरूहि कॊ ऽसीमां विक्रियां गतः

7 [दु] अहं पुरा रुरॊ नाम्ना ऋषिर आसं सहस्रपात
सॊ ऽहं शापेन विप्रस्य भुजगत्वम उपागतः

8 [रु] किमर्थं शप्तवान करुद्धॊ दविजस तवां भुजगॊत्तम
कियन्तं चैव कालं ते वपुर एतद भविष्यति

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