वृन्दावनके संनिकट कुछ याज्ञिक ब्राह्मण यज्ञ कर रहे थे| भगवान् श्रीकृष्णने अपने सखाओंको उनके पाससे भोजनके लिये कुछ अन्न माँगनेके लिये भेजा| याज्ञिकोंने उन्हें अन्न देना अस्वीकार कर दिया|
परम भागवत वसुदेवजी यदुवंशके परम प्रतापी वीर शूरसेनके पुत्र थे| इनका विवाह देवककी सात कन्याओंसे हुआ था| रोहिणी भी इन्हींकी पत्नी थीं| देवकीजी देवककी सबसे छोटी कन्या थीं|
उद्धवजी वृष्णवंशियोंमें एक प्रधान पुरुष थे| ये साक्षात् बृहस्पतिजीके शिष्य और परम बुद्धिमान् थे| मथुरा आनेपर भगवान् श्रीकृष्णने इन्हें अपनी मन्त्री और अन्तरङ्ग सखा बना लिया|
पूर्वकालमें वसुश्रेष्ठ द्रोण और उनकी पत्नी धरादेवीने भगवान् की प्रसन्नताके लिये कठोर आराधना की| ब्रह्माजीसे उन्हें भगवान् को पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वर मिला था| ब्रह्माजीके उसी वरदानसे द्रोण और धराका नन्द और यशोदाके रूपमें जन्म हुआ| दोनों पति-पत्नी हुए और भगवान् श्रीकृष्ण-बलरामने पुत्र बनकर उन्हें वात्सल्यसुखका सौभाग्य दिया|
जब कंसने देवकी-वसुदेवके छ: पुत्रोंको मार डाला, तब देवकीके गर्भमें भगवान् बलराम पधारे| योगमायाने उन्हें आकर्षित करके नन्दबाबाके यहाँ निवास कर रही श्रीरोहिणीजीके गर्भमें पहुँचा दिया| इसीलिये उनका एक नाम संकर्षण पड़ा| बलवानोंमें श्रेष्ठ होनेके कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है|
अक्रूरजीका जन्म यदुवंशमें हुआ था| ये भगवान् श्रीकृष्णके परम भक्त थे| कुटुम्बके नाते ये वसुदेवजीके भाई लगते थे| इसलिये भगवान् श्रीकृष्ण इन्हें चाचा कहते थे| कंसके अत्याचारोंसे पीड़ित होकर बहुत-से यदुवंशी इधर-उधर भाग गये थे, किंतु कंस इनपर विशेष विश्वास करता था| इसलिये ये किसी प्रकार उसके दरबारमें पड़े हुए थे|