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तूने रात गँवायी

भजन - विविध भजन

तूने रात गँवायी सोय के दिवस गँवाया खाय के .
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ..

सुमिरन लगन लगाय के मुख से कछु ना बोल रे .
बाहर का पट बंद कर ले अंतर का पट खोल रे .
माला फेरत जुग हुआ गया ना मन का फेर रे .
गया ना मन का फेर रे .
हाथ का मनका छँड़ि दे मन का मनका फेर ..

दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय रे .
जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय रे .
सुख में सुमिरन ना किया दुख में करता याद रे .
दुख में करता याद रे .
कहे कबीर उस दास की कौन सुने फ़रियाद ..

 

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