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राघवदास की इच्छा – श्री साईं कथा व लीला

कोपीनेश्वर महादेव के नाम से बम्बई (मुम्बई) के नजदीक थाणे के पास ही भगवन् शिव का एक प्राचीन मंदिर है|

“राघवदास की इच्छा” सुनने के लिए Play Button क्लिक करें | Listen Audio

इसी मंदिर में साईं बाबा का एक भक्त उनका पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ गुणगान किया करता था| मंदिर में आने वाला राघवदास साईं बाबा का नाम और चमत्कार सुनकर ही, बिना उनके दर्शन किए ही इतना अधिक प्रभावित हुआ कि वह उनका अंधभक्त बन चुका था और अंतर्मन से प्रेरणा पाकर निरंतर उनका गुणवान किया करता था|

कई वर्ष पहले उसने साईं बाबा का नाम और उनकी लीलाओं के बारे में सुना था, परंतु परिस्थितिवश वह अब तक बाबा के दर्शन करने जाने का सौभाग्य नहीं प्राप्त कर सका था| इस बात का उसे दुःख हर समय सताता रहता था|

साईं बाबा की लीलाओं के विषय में सुनाते-सुनाते श्रद्धा से उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगती थी| वह मन-ही-मन प्रार्थना करने लगा – “हे साईं बाबा ! क्या मैं इतना ही दुर्भाग्यशाली हूं, जो मुझे आपके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा? क्या मैं सदैव ऐसे ही लाचार रहूंगा, जो आपके दर्शन करने के लिए शिरडी आने तक का साधन भी न जुटा सकूंगा ? मामूली-सी नौकरी और उस पर इतने बड़े परिवार की जिम्मेदारी, क्या मुझे कभी इस जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं मिलेगी?”

उसकी आँखों से झर-झर करके आँसू बहे जा रहे थे और वह अपने मन की व्यथा अपने से कई मील दूर अपने आराध्य साईं बाबा को सुनाये जा रहा था| वह तो हर क्षण बस साईं बाबा के दर्शन करने के बारे में ही सोचता रहता था, परंतु धन के अभाव के कारण मजबूर था|

इसी वर्ष उसकी विभागीय परीक्षा भी होनी थी| यदि वह परीक्षा में पास हो गया तो उसकी नौकरी पक्की हो जानी थी| फिर उसके वेतन में वृद्धि हो जाएगी, जिससे उसकी जिम्मेवारियों का बोझ कुछ हल्का हो जाता| वह परीक्षा में सफलता दिलाने के लिए साईं बाबा से प्रार्थना किया करता था|

समय पर परीक्षा हुई और राघवदास की मेहनत और प्रार्थना रंग लाई| नौकरी पक्की हो गयी और वेतन में भी वृद्धि हो गयी| राघवदास अत्यंत प्रसन्न था| अब उसे इस बात का पूरा विश्वास हो गया था कि वह साईं बाबा के दर्शन करने जरूर जा सकेगा|

अब वह अपने रोजमर्रा के खर्चों में कटौती करने लगा| वह एक-एक पैसा देखभालकर खर्च करता था, ताकि वह जल्द-से-जल्द शिरडी आने-जाने लायक रकम इकट्ठी कर सके| राघवदास की लगन ने अपना रंग दिखाया और शीघ्र ही उसके पास शिरडी जाने लायक रकम इकट्टा हो गयी| उसने बाजार जाकर पूरी श्रद्धा के साथ नारियल और मिश्री प्रसाद के लिए खरीदी| फिर अपनी पत्नी से बोला – ” अब हम शिरडी जायेंगे|”

पत्नी हैरानी से उका मुंह तांकने लगी|

“शिरडी…|” उसे बड़ी हैरानी हुई|

“हां, शिरडी|” राघवदास ने कहा – “शिरडी जाकर हम वहां साईं बाबा के दर्शन करेंगे|”

“साईं बाबा के दर्शन !” पत्नी ने उदास स्वर में कहा – “मैं तो यह सोच रही थी कि आप मुझे कुछ गहना आदि बनवाकर देंगे|”

“सुन भाग्यवान् ! साईं बाबा से बढ़कर और कोई दूसरा गहना इस दुनिया में नहीं है| तू चल तो सही, फिर तुझे असली और नकली गहनों के अंतर के बारे में पता चल जायेगा|”

फिर वह अपनी पत्नी को साथ लेकर शिरडी के लिए चल दिया| वह पूरी यात्रा में साईं बाबा का गुणगान करता रहा| शिरडी की धरती पर कदम रखते ही वह चिंता से मुक्त हो गया| उसे ऐसा लगा जैसे उसने इस धरती का सबसे बड़ा खजाना पा लिया हो| वह अपने को बहुत भाग्यशाली मान रहा था|

वह रात में शिरडी पहुंचा था| सुबह होने के इंतजार में उसने सारी रात साईं बाबा का गुणवान करते-करते काट दी| साईं बाबा के प्रति उसकी श्रद्धा-भक्ति देखकर सभी हैरान थे| सुबह होते ही पति-पत्नी जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो गए और फिर नारियल और मिश्री लेकर साईं बाबा के दर्शन के लिए चल दिए|

द्वारिकामाई मस्जिद में पहुंचते ही साईं बाबा ने अपनी सहज और स्वाभाविक वात्सल्यभरी मुस्कान के साथ राघवदास और उसकी पत्नी का स्वागत करते हुए बोले – “आओ राघव, तुम्हें देखने के लिए मेरा मन कब से बेचैन था| बहुत अच्छा हुआ कि तुम आ गए|”

राघवदास और उसकी पत्नी दोनों ने श्रद्धा के साथ साईं बाबा के चरण स्पर्श किए और फिर नारियल और मिश्री उनके चरणों में अर्पित की|

राघवदास और उसकी पत्नी बड़े आश्चर्यचकित थे कि साईं बाबा को उनका नाम कैसे मालूम हुआ ? वे तो अपने जीवन में पहली बार शिरडी आए थे|

“बैठो राघवदास बैठो|” साईं बाबा ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरकर आशीर्वाद देते हुए कहा – “तुम दोनों बेवजह इतने परेशान क्यों हो ? आज तुमने मुझे प्रत्यक्ष रूप से पहली बार देखा है, लेकिन फिर भी तुम मुझे पहचानते थे| ठीक इसी तरह मैं भी तुम दोनों से न जाने कब से परिचित हूं| तुम दोनों को मैं कई वर्षों से जानता-पहचानता हूं|”

राघवदास और उसकी पत्नी राधा की खुशी का कोई ठिकाना न रहा| वे स्वयं को बहुत धन्य मान रहे थे| बाबा के शिष्य उनके पास ही बैठे थे| बाबा ने उनकी ओर देखकर कहा – “आज हम चाय पियेंगे| चाय बनवाइए|”

राघवदास भाव-विभोर होकर बाबा के चरणों से लिपट गया और उसकी आँखों से प्रसन्नता के मारे अश्रुधारा बह निकली और वह रुंधे गले से बोला – “बाबा ! आप तो अंतर्यामी हैं| आज आपके दर्शनों का शौभाग्य प्राप्त कर मुझे सब कुछ मिल गया| मैं धन्य हो गया| अब मेरे मन में और किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा बाकी नहीं है|”

“अरे राघवदास, तुम जैसे लोग इस संसार में बस गिनती भर के हैं| मेरे मन में सदा ऐसे लोगों के लिए जगह रहती है| अब तुम जब भी शिरडी आना चाहो, आ जाना|”

तभी शिष्य चाय लेकर आ गया| साईं बाबा ने राघवदास और उसकी पत्नी राधा को अपने हाथों से चाय डालकर दी| फिर राघवदास द्वारा लाई नारियल और मिश्री साईं बाबा ने वहां बैठे भक्तों में बांट दी|

राघवदास और राधा को प्रसाद देने के बाद साईं बाबा ने अपनी जेब में हाथ डाला और उसमें से दो सिक्के निकाले| एक सिक्का उन्होंने राघवदास को और एक सिक्का राधा को दिया और फिर हँसते हुए बोले – “इन रुपयों को तुम अपने पूजाघर में संभालकर अलग-अलग रख देना| इनको खो मत देना| मैंने पहले भी तुम्हें दो रुपये दिये थे, लेकिन तुमने वह खो दिए| यदि वे रुपए खोए होते तो तुम्हें कोई कष्ट न होता| अब इनको अच्छी तरह से संभालकर रखना|”

राघवदास और राधा दोनों ने रुपये अच्छी तरह से संभालकर रखे और फिर साईं बाबा को प्रणाम करके उनसे चलने के लिए आज्ञा प्राप्त की|

द्वारिकामाई मस्जिद से बाहर आते ही राघवदास और राधा को एकदम से याद आया, बाबा ने कहा था कि मैंने तुम्हें पहले भी दो रुपये दिये थे, लेकिन तुमने खो दिए| पर हमने तो साईं बाबा के दर्शन आज जीवन में पहली बार किए हैं| फिर बाबा ने हमें दो रुपये कब दिये थे ? उन्होंने एक-दूसरे से पूछा| इन रुपयों वाली बात उनकी समझ में नहीं आयी|

घर पर आने के बाद राघवदास ने अपने माता-पिता को शिरडी यात्रा की सारी बातें विस्तार से बताने के बाद बाबा द्वारा दो रुपये दिये जाने वाली बात भी बतायी|

तब रुपयों की बात सुनकर राघवदास के माता-पिता की आँखों में आँसू भर आये| उसके पिता ने कहा – “साईं बाबा ने सत्य कहा है, आज से कई वर्ष पूर्व मंदिर में एक महात्मा जी आए थे| वह मंदिर में कुछ दिनों के लिए रुके थे| यह उस समय की बात है जब तुम बहुत छोटे थे| लोग उन्हें भोले बाबा कहकर बुलाया करते थे| एक दिन उन्होंने मुझे और तुम्हारी माँ को चांदी का एक-एक सिक्का दिया था और कहा था कि इन रुपयों को अपने पूजाघर में रख देना| कई वर्ष तक हम उन रुपयों की पूजा करते रहे और हमारे घर में धन भी निरंतर आता रहा| हमें किसी चीज की कोई कमी नहीं रही, पर मेरी बुद्धि अचानक फिर गई| मैं ईश्वर को भूल गया और पूजा-पाठ भी करना छोड़ दिया था|”

“दीपावली के दिन मैंने पूजाघर में देखा तो वह दोनों रुपये अपनी जगह पर नहीं थे| मैंने सब जगह पर उन्हें ढूंढा, पर वह कहीं नहीं मिले| उन रुपयों के गायब होते ही जैसे हमारे घर पर शनि की क्रूर दृष्टि पड़ गई| व्यापार ठप्प होता चला गया| मकान, दुकान, जेवर आदि सब कुछ बिक गए| हमें बड़ी गरीबी में दिन बिताने पड़े|”

राघवदास ने वह दोनों रुपये निकालकर अपने पिता की हथेली पर रख दिए| उन्होंने बार-बार उन रुपयों को अपने माथे से लगाया, चूमा और बिलख-बिलखकर रोने लगे|

साईं बाबा के आशीर्वाद से अब फिर से राघवदास के परिवार के दिन बदलने लगे| उसे अपने ऑफिस में उच्च पदक की प्राप्ति हो गयी| वह हर माह साईं बाबा के दर्शन करने शिरडी जाता था| साईं बाबा के आशीर्वाद से उसके परिवार की मान-प्रतिष्ठा, सुख-समृद्धि फिर से लौट आयी थी|

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