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प्रेम की मस्ती

एक बार जब कृष्ण जी विदुर के घर गये, उस समय वह घर पर नहीं थे| उनकी पत्नी नहा रही थी| द्वार पर कृष्ण जी ने आवाज़ दी| आवाज़ सुनते ही वह प्रेम में इतनी मस्त हो गयी कि उसे इतना भी होश न रहा कि कपड़े पहन लूँ| नंगी उठ भागी| ऐसी हालत में न पाप है, न पुण्य| कृष्ण जी ने कहा कि कपड़े तो पहन| तब उसने कपड़े पहने|

अब घर में खाने-पीने का कोई समान नहीं था| सिर्फ़ केले रखे थे| वह प्रेम में इतनी मग्न हो गयी कि केले छील-छील कर छिलका कृष्ण जी को देने लगी और फली (गूदा) फेंकने लगी| इतने में विदुर आ गये| जब उन्होंने देखा तो कहा, “अरी पगली! यह क्या कर रही है? यह सुनकर वह बोली, “ओहो! मुझे पता नहीं चला|” फिर उसने कृष्ण जी को केले की फली दी तो कृष्ण जी ने कहा, “विदुर! इसमें वह स्वाद नहीं है जो छिलके में था|”

यह है प्रेम की अवस्था|

सच्चे प्रेमी, सतगुरु के प्रेम और मुहब्बत में फ़ना होकर (अपने
आपको पूर्णतया खोकर) अमर जीवन का रस पीते हैं और उसका
आनन्द प्राप्त करते हैं|
(महाराज सावन सिंह)

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