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मैं मनुष्य बनूँगा – शिक्षाप्रद कथा

मैं मनुष्य बनूँगा - शिक्षाप्रद कथा

एक बार एक देवता पर ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये| उस देवता को महर्षि दुर्वासा ने शाप दे दिया था कि ‘तू अब देवता नहीं रहेगा|’ देवता ने कहा – ‘न सही देवता| मैं बहुत दिन देवता रह चुका| स्वर्ग के भोग से ऊब गया|’ उसने बूढ़े बाबा ब्रह्मा की प्रार्थना की| ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर कहा – ‘तुम जो कहोगे, तुमको वही बना दिया जायगा|’
देवता ने पहले कुछ देर सोचा और फिर कहा – ‘एक बार मुझे सब लोक देख आने दीजिये|’

ब्रह्माजी ने स्वीकार कर लिया| देवता भला देवलोक में क्या देखता| नाचने-गाने वाले गन्धर्व, यक्ष, किन्नर – ये सब तो उसके सामने सेवक ही थे| देवताओं के राजा इन्द्र का नन्दननामक बगीचा तथा पारिजात नामक पेड़ भी उसका कई बार देखा हुआ ही था| वह गया ऊपर के लोकों में| उसने जनलोक, तपोलोक देखे| इनसे आगे महर्लोक और सत्यलोक भी देख लिया| वैकुण्ठ, साकेत, गोलोक और शिवलोक जाने की उसे आज्ञा नहीं थी| उसने सोचा – ‘इन लोकों में ऋषि बनकर रहने से तो तपस्या करनी होगी, भोग यहाँ है नहीं| हमने जीवन भर स्वर्ग के भोग भोगे हैं| अब इस बखेड़े में कौन पड़े|’

वह सीधे नीचे चला पाताल की ओर| उसने दैत्यों के बलकी बड़ी प्रशंसा सुनी थी| वह नागलोक को तो देखकर ही डर गया| बड़े भारी-भारी सर्प थे वहाँ| उसने दैत्यों को देखा, वे काले, कुरूप और उजड्ड थे| इतना कुरूप होना वह नहीं चाहता था| वह पृथ्वीपर आ गया|

‘मैं पक्षी बनूँ तो उड़ता फिरूँगा| चाहे जहाँ के फल खा सकूँगा|’ वह सोच रहा था| इतने में उसने देखा हवाई जहाज| ‘ओह मनुष्य – यह भी उड़ता है|’ उसे डर लगा कि पक्षी बनने पर कोई मनुष्य गोली मार देगा|

‘मैं जल में रहूँगा|’ उसने सोचा| परंतु जल में ऊपर जहाज और भीतर पनडुब्बी चल रही थी| मनुष्य का भय यहाँ भी था| जल में एक जीव दूसरे पर आक्रमण ही करते रहते हैं|

‘हाथी, सिंह – सब बलवान् पशु उसने देखे| मनुष्य सबको पकड़कर बंद कर लेता है| सबको सेवक बना लेता है| मनुष्य पृथ्वी पर रेल और मोटर से दौड़ता है| पानी और हवा में भी चलता है| पानी, हवा और बिजली से भी काम लेता है| हजारों कोसों की बात उसी समय सुनता है, गाना सुनता है, वहाँ की तस्वीर भी देख लेता है| मनुष्य बड़ा बुद्धिमान् है और सुन्दर भी है| वह सोचते-सोचते लौटा|

‘वैकुण्ठ, साकेत, गोलोक और शिवलोक कैसे हैं और उनमें क्या है?’ उसने ब्रह्मा जी से पूछा|

‘वे बड़े विचित्र लोक हैं, वहाँ यहाँ के सूरज-चाँद का प्रकाश नहीं है| वे अपने ही तेज से प्रकाशित हैं, वहाँ भगवान् तथा उनके भक्त रहते हैं| वहाँ सदा रहनेवाला परम सुख है तथा नित्य सौन्दर्य है, वहाँ दुःख का पतातक नहीं|’ ब्रह्मा जी ने बताया| देवता शीघ्रता से बोला – ‘तब मैं…….|’

ब्रह्मा जी ने उसे बोलने ही नहीं दिया| वे बीच में ही कहने लगे – ‘वहाँ तो केवल मनुष्य अपनी साधना एवं भक्ति से ही जा सकता है|’

‘तब मैं मनुष्य बनूँगा| देवता ने झटपट बता दिया| उसने देखा था कि ब्रह्मा जी प्रसन्न न होते तो वह कुछ भी नहीं बन सकता था और मनुष्य तो देवता भी बन जाता है|

ब्रह्मा जी ने उसे मनुष्य बनाकर बताया –

‘नर तन सम नहिं कवनिउ देही|’

 

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