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यथार्थ की पहचान

यथार्थ की पहचान

काशी में पावन सलिला गंगा के तट पर एक मुनि का बहुत बड़ा आश्रम था| उसमें रहकर अनेक शिष्य वेद-वेदांग की शिक्षा ग्रहण करते थे| शिष्य में एक का नाम दुष्कर्मा था| वह सब शिष्यों में सबसे ज्यादा आज्ञाकारी, समझदार और दयालु प्रवृति का था|

एक दिन उसके सहपाठी ने कहा, दुष्कर्मा, ज़रा यह श्लोक समझा दो, मेरी समझ में नही आ रहा| बड़ा ही कठिन है|’

‘अरे, यह तो बहुत ही सरल है, अभी समझा देता हूँ|’ दुष्कर्मा ने सहपाठी को श्लोक समझा दिया|

उसके सभी मित्र उसे दुष्कर्मा के नाम से पुकारते थे| उसे बहुत बुरा लगता था| एक दिन उसने मुनि से कहा, ‘गुरूजी, मेरा कोई और नाम रख दीजिए| मुझे यह नाम अच्छा नही लगता|’

यह सुनकर मुनि मुस्कुराएँ| फिर उन्होंने कहा, ‘ठीक है, बेटा| पहले तुम देशाटन कर आओ, जब वापस आओगे तो तुम्हारा नाम बदल देंगे|’

दुष्कर्मा गुरूजी के चरण स्पर्श करके देशाटन के लिए निकल पड़ा|

वह एक गाँव में पहुँचा| वहाँ उसने देखा की कुछ लोग कंधे पर एक शव को ले जा रहे है| उसके पीछे काफ़ी लोग ‘राम नाम सत्य है’ कहते हुए चल रहे थे|

दुष्कर्मा ने एक आदमी से पूछा, ‘भाई! मरने वाले का नाम क्या था?’

उस आदमी ने कहा, ‘जीवक|’

‘अरे! जीवक भी कभी मरता है?’ दुष्कर्मा ने हैरानी से पूछा|

‘बड़े मूर्ख हो| नाम से तो मात्र व्यक्ति को पहचाना जाता है|’

दुष्कर्मा उसकी बात पर विचार करता हुआ दूसरे गाँव में पहुँचा| वहाँ उसने देखा की एक स्त्री एक लड़की को बुरी तरह पीट रही थी|

यह देखकर दुष्कर्मा को दया आ गई| उसने पूछा, ‘देवी! आप इसको क्यों पीट रही हैं?’

‘यह मेरी नौकरानी है| इसे पैसे लेकर सामान लाने भेजा था और खाली हाथ वापस आ गई|’ स्त्री ने क्रोधित मुद्रा में कहा|

दुष्कर्मा ने एक मुद्रा निकालकर उस को दी और कहा, ‘कृपया इसे न मारें|’

एक आदमी से उसने पूछा, ‘उस लड़की का नाम क्या है?’

वह आदमी बोला, ‘उसका नाम लक्ष्मी है|’

‘नाम तो अच्छा है लेकिन नौकरी दूसरे के यहाँ करती है?’

‘अजीब आदमी हो| नाम तो केवल पहचान के लिए होता है|’ अर्थ से क्या होता है|’ यह कहकर वह आदमी आगे चल दिया|

‘शायद यह ठीक ही कहता है पर…|’ अपने नाम से कुछ-कुछ संतुष्ट होकर दुष्कर्मा गाँव छोड़कर वापस काशी की ओर लौट पड़ा|

रास्ते में उसे एक आदमी मिला| उसने कहा, ‘भाई मैं रास्ता भूल गया हूँ, मुझे काशी का रास्ता बता दोगे?’

दुष्कर्मा ने कहा, ‘मैं भी वहीं जा रहा हूँ, मेरे साथ चलो|’

दुष्कर्मा ने उससे पूछा, ‘मित्र! तुम्हारा नाम क्या है|’

वह आदमी बोला, ‘पंथक कहते है मुझे|’

‘पंथक होकर भी तुम रास्ता भूल गए?’ दुष्कर्मा ने व्यंगपूर्ण स्वर में कहा|

‘क्यों मज़ाक करते हो? नाम से क्या लेना-देना| रास्ता तो कोई भी भटक सकता है|’ वह बोला, ‘यह तो सबको पता है कि नाम से केवल आदमी की पहचान ही होती है|’

‘तुम ठीक कहते हो| आखिर मुझे यथार्थ समझ में आ गया|’

काशी पहुँचते ही दुष्कर्मा अपने गुरूजी के पास पहुँचा|

‘क्या, अब भी तुम अपना नाम बदलना चाहोगे?’ मुनि ने दुष्कर्मा से पूछा|

‘गुरुजी, अब मैं समझ गया कि नाम से केवल व्यक्ति की पहचान होती है, मैं अपने वर्तमान नाम से ही संतुष्ट हूँ|

शिक्षा: किसी भी व्यक्ति का नाम उसकी भौतिक पहचान मात्र कराता है जबकि उसकी वास्तविक पहचान उसके नाम से नही बल्कि उसके गुण-धर्म से होती है| नाम कैसा भी हो, कुछ भी हो…कर्म अच्छे होने चाहिए| वरना दमड़ीलाल करोड़पति हो सकता है और धनीराम रोटी का मोहताज!

फकीर ने
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