सुनहरा हिरण

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द्रव्यपुर के एक धनी व्यापारी का पुत्र था धनकू| पिता के लाड़-प्यार में वह इतना बिगड़ा कि ढंग से पढ़-लिख भी नही पाया|

धनकू जब युवा हुआ तो उसका विवाह एक सुंदर कन्या से हो गया| कुछ दिनों के बाद उसके माता-पिता का निधन हो गया| वह अकेला रह गया| अक्सर वह सोचता कि अब कौन उसका ध्यान रखेगा| उधर उसके दोस्त उसका धन हथियाने की योजना बनाते रहते थे| 

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एक दिन की बात है| उसके दोस्त उसके पास आए और बोले, ‘चलो, चलकर जुआँ खेलते हैं, शराब पीते हैं- इससे तुम्हारे सारे दुख दूर हो जायेंगे|’

अब धनकू अपना धन जुएँ-शराब में उड़ाने लगा| इस तरह एक दिन उसके सारे रूपये-पैसे खत्म हो गए| वह सोचने लगा, अब उसके सारे दोस्त उसका साथ छोड़ देंगे| क्यों न किसी से कर्ज लेकर मौज-मस्ती की जाए|

उसने कई साहूकारों से कर्जा ले लिया| जब कई महीने बीतने पर भी धनकू ने साहूकारों का पैसा नही चुकाया तो वे उसे तंग करने लगे|

वह रोज़-रोज़ के तकादों से परेशान हो गया| उसने सोचा इस जिल्लत भरी जिंदगी से तो मर जाना ही बेहतर है|

एक दिन धनकू सभी कर्जदारों को नदी के किनारे ले गया और बोला, ‘मैंने नदी की तली में काफ़ी धन छिपा रखा है| तुम सभी का कर्जा चुका दूँगा|’

और वह नदी में कूद पड़ा| सारे कर्जदार यह नज़ारा देखकर अचरज में पड़ गए|

नदी के दूसरे किनारे पर एक सुनहरा हिरण रहता था| जब उसने देखा कि एक युवक पानी में डूब रहा है तो उसने पानी में छलाँग लगाकर उसे बचा लिया| थोड़ी ही देर में धनकू को होश आ गया|

हिरण ने धनकू से पानी में डूबने का कारण पूछा|

धनकू ने हिरण के पहले वचन ले लिया कि वह किसी को कुछ भी नही बताएगा|

फिर धनकू ने उस हिरण को सारी कहानी कह सुनाई|

उसी रात राज्य की रानी हेमा ने स्वप्न में देखा कि एक स्वर्ण हिरण उसे उपदेश दे रहा है| अगले ही दिन रानी ने राजा से जिद्द की कि उसे स्वर्ण हिरण से उपदेश सुनना है|

राजा ने मंत्रियो को बुलाया और पूछा, ‘स्वर्ण हिरण होते है क्या?’

‘हाँ, महाराज|’ मंत्रियों ने कहा|

राजा ने पूरे नगर में घोषणा कर दी की जो भी स्वर्ग हिरण का पता बताएगा या उसे पकड़कर लाएगा उसे एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ और एक हाथी ईनाम स्वरूप दिया जाएगा|

धनकू ने जब यह घोषणा सुनी तो वह राजा के पास गया और बताया कि वह स्वर्ण हिरण का पता बता सकता है|

दूसरे दिन ही राजा अपना लाव-लश्कर लेकर धनकू के साथ जंगल में पहुँच गया|

धनकू ने बताया की स्वर्ण हिरण आम के पेड़ के पास रहता है|

राजा ने आम के पेड़ को घिरवा दिया और धनुष-बाण उसकी तरफ़ तान दिए|

स्वर्ण हिरण आश्चर्य में पड़ गया, ‘राजा को यहाँ का पता कैसे चला?’ फिर उसने महाराज से विनती की, ‘मुझे मत मारो, मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ| किंतु आपको पहले यह बताना होगा कि यहाँ का पता कैसे चला?’

राजा हिरण को बोलते देखकर आश्चर्य में पड़ गया| राजा ने बताया कि उसे धनकू ने यहाँ का पता बताया था|

‘महाराज! मैंने इस स्वार्थी इंसान को पानी में डूबने से बचाया था| इसके बदले में इसने मुझे यह पुरस्कार दिया है|’ स्वर्ण हिरण दुखी स्वर में बोला|

राजा ने यह सुनकर तुरंत ही धनकू को फाँसी लगाने का हुक्म दे दिया|

यह सुनकर धनकू के होश उड़ गए| उसने तो सोचा था कि स्वर्ण हिरण का पता बताकर वह ईनाम का हकदार बन जाएगा| किंतु यहाँ तो पांसे उलटे पड़ चके थे|

‘नही महाराज! ऐसा मत कीजिए| इसको माफ़ कर दीजिए| आप जैसा चाहेंगे मैं वैसा ही करूँगा|’ स्वर्ण हिरण ने राजा से फरियाद की|

‘मुर्ख इंसान| देख इस हिरण को| तूने इसे ईनाम के लालच में पकड़वाने की सोची थी और यही हिरण तुझे बचा रहा है| जा, इस नगर को छोड़कर चला जा|’ फिरे राजा उस स्वर्ण हिरण को लेकर महल में आ गया|

स्वर्ण हिरण ने रानी को उपदेश दिया| फिर राजा ने स्वर्ण हिरण को यह आश्वासन देते हुए छोड़ दिया कि अब वह जीव-जन्तुओं पर कभी अत्याचार नही करेगा|

शिक्षा: भलाई के बदले भलाई नही कर सकते तो न सही लेकिन बुराई तो न करो| जैसा धनकू ने अपने प्राणों के रक्षक स्वर्ण हिरण के साथ किया| कृतज्ञता का बदला कृतघ्नता से देना गिरी हुई मानसिकता का प्रतीक है| 

शिकारी को चकमा सुनहरे हिरण हिरण का विवेक सच्ची मित्रता-2

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