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श्रृंगभुज और रूपशिखा

श्रृंगभुज और रूपशिखा

यह कथा उस समय की है, जब वर्धमान नगर में राजा वीरभुज का शासन था| राजा वीरभुज को संसार के सभी भौतिक सुख उपलब्ध थे, किंतु संतान न होने का दुख उसे विदग्ध किए रहता था| संतान की लालसा में उसने एक-एक करके सौ विवाह किए थे, किंतु उसकी कोई भी रानी अपनी कोख से राज्य के उत्तराधिकारी को जन्म न दे सकी|

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तब एक दिन उसके किसी हितैषी ने उसे परामर्श दिया – “राजन! आपके राज्य में श्रुतवर्मन नाम के एक विख्यात वैद्य रहते हैं| आप उन्हें यहां बुलाकर उनसे कोई उपयुक्त दवा लें तो आपके यहां संतान अवश्य पैदा होगी| वैद्य श्रुतवर्मन अब से पूर्व कई नि:संतान दंपतियों की संतान की मनोकामना पूरी कर चुके हैं|”

अपने हितैषी का परामर्श मानकर राजा वीरभुज ने वैद्य श्रुतवर्मन को बुलवाया और उनसे सादर निवेदन किया – “वैद्यराज! आप तो जानते ही हैं कि हम नि:संतान हैं| कृपाकर कोई ऐसी दवा तैयार कीजिए, जिससे कि हम संतान का सुख देख सकें|”

यह सुनकर वयोवृद्ध वैद्य ने कहा – “राजन! संसार में कोई भी कार्य असंभव नहीं होता| मैं आपके यहां सन्तानोत्पत्ति के लिए ऐसी दवा तैयार कर सकता हूं, बशर्ते कि कुछ जड़ी-बूटियों का इंतजाम कर दिया जाए|”

“जड़ी-बूटियों का इंतजाम हम कर देंगे| आप कृपया उन जड़ी-बूटियों के नाम हमें बता दीजिए| इसके अतिरिक्त भी किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता हो तो उसका भी प्रबंध किया जा सकता है|” राजा ने कहा|

वैद्य ने कुछ जड़ी-बूटियों के नाम राजा को गिना दिए, फिर उसने कहा – “राजन! दवा तैयार करने के लिए आपको एक विशेष प्रजाति के जंगली बकरे का भी इंतजाम कराना होगा, क्योंकि दवा उसी बकरे से तैयार की जाएगी|”

राजा वीरभुज ने उसे आश्वासन दिया कि सभी चीजों का इंतजाम हो जाएगा, फिर वह उन चीजों को लाने के लिए अपने मंत्री को हिदायत देने के लिए चला गया|

दो दिन के बाद ही वैद्य द्वारा मंगाई गईं सभी चीजों का इंतजाम हो गया| वैद्य ने अपना काम आरंभ कर दिया| उसने बकरे के शरीर से निकले मांस-मज्जा एवं रक्त में वे जड़ी-बूटियां पीसकर निर्धारित मात्रा में मिलाईं और एक प्रकार का मिश्रण तैयार कर लिया| तब वह राजमहल में गया| राजा उस समय अपनी बड़ी और सबसे प्रिय रानी गुणवरा के साथ पूजा में व्यस्त था, अत: वैद्य ने उसकी अनुपस्थिति में वह मिश्रण समान रूप से बांटकर शेष रानियों को पिलवा दिया| राजा जब पूजा गृह से रानी गुणवरा के साथ बाहर आया तो उसे मालूम हुआ कि वैद्यराज अपना काम कर चुके हैं| उन्होंने उपस्थित रानियों को दवा से तैयार मिश्रण पिलवा दिया है| यह जानकर उन्हें किंचित क्रोध-सा आ गया| वह वैद्यराज से बोले – “वैद्यराज! यह आपने क्या किया| मेरी अनुपस्थिति में आपने सभी मिश्रण रानियों में बांट दिया| आपको मेरी प्रिय रानी गुणवरा के लिए भी तो कुछ मिश्रण छोड़ना चाहिए था|”

वैद्य बोला – “अपराध क्षमा हो राजन! मैं रानियों की संख्या न गिन सका| इसी कारण यह भूल हो गई| मेरे सम्मुख तो जो भी रानी आई, मैंने उसी को दवा का मिश्रण दे दिया|”

राजा कहने लगा – “अब छोड़िए इस बात को, जो हो गया सो हो गया| अब मुझे यह बताइए कि क्या रानी गुणवरा के लिए कुछ किया जा सकता है?”

“हो तो सकता है, महाराज!” वैद्य बोला – “उस बकरे के सींग अभी तक सुरक्षित रखे हैं| यदि थोड़ी सावधानी से उन सींगों में चिपटे मांस-मज्जा से दवा का मिश्रण तैयार किया जाए तो रानी गुणवरा का भी काम हो सकता है|”

“तब फिर ऐसा ही कीजिए| मुझे अपनी प्रिय रानी की कोख से संतान अवश्य चाहिए|”

वैद्य फिर से दवा का मिश्रण तैयार करने में जुट गया| सींगों से जितना भी मांस-मज्जा निकला, वैद्य ने उसी से मिश्रण तैयार कर दिया| अन्य रानियों की तरह रानी गुणवरा ने भी संतान की चाहत में वह मिश्रण पी लिया|

वैद्य श्रुतवर्मन की औषधि ने चमत्कारिक प्रभाव दिखाया| निश्चित समय पर राजा की निन्यानवे रानियां गर्भवती हुईं और लगभग सभी को एक साथ ही संतानें प्राप्त हुईं|

पर चूंकि रानी गुणवरा ने सबसे बाद में औषधि का सेवन किया था, अत: उसे सबसे बाद में पुत्र पैदा हुआ| राजा-रानी दोनों उस विलक्षण लक्षणों वाले पुत्र को पाकर बहुत प्रसन्न हुए| राजा ने कहा – “हमारा ये पुत्र शुभलक्षणों वाला है और चूंकि इसका जन्म श्रृंग (सींग) से बनी दवा को पीने के कारण हुआ है, अत: हम इसका नाम श्रृंगभुज रखेंगे|”

अपने अन्य भाइयों की अपेक्षा उम्र में सबसे छोटा होते हुए भी श्रृंगभुज बहुत होनहार निकला| पठन-पाठन, शस्त्र विद्या और मल विद्या में उसने अपने अन्य भाइयों को बहुत पीछे छोड़ दिया| यह देखकर अन्य रानियां उससे ईर्ष्या करने लगीं| एक दिन जब वे सब इकट्ठी हुईं तो एक रानी ने कहा – “बहन! महाराज रानी गुणवरा से जितना प्रेम करते हैं, उतना हम से नहीं| हमारी तो कोई भी मांग मांनने को वे तैयार ही नहीं होते, सदैव आनाकानी करते रहते हैं|”

दूसरी कहने लगी – “ठीक कहती हो बहन! महाराज तो उसके पुत्र श्रृंगभुज को ही चाहते हैं, उसी पर अपना लाड़-प्यार लुटाते हैं| हमारे बच्चों को वे उतना प्यार नहीं करते, जितना श्रृंगभुज को करते हैं|”

तीसरी कहने लगी – “बहन! यदि हमारी इसी प्रकार उपेक्षा होती रही तो देख लेना महल में हमें कोई पूछेगा भी नहीं| आज तो फिर भी कुछ मान-सम्मान मिल रहा है| यदि गुणवरा ने महाराज को अपनी मुट्ठी में कर लिया तो हमारी स्थिति बहुत ही दयनीय हो जाएगी|”

“क्यों न हम गुणवरा पर कोई आक्षेप लगाकर उसे महाराज की नजरों से गिरा दें?” चौथी रानी ने अपनी सीधी और सपाट राय जाहिर कर दी|

“यदि ऐसा हो जाए तो बहुत ही उत्तम रहेगा| जब फिर महाराज हमारे पुत्रों से प्रेम करने लगेंगे| गुणवरा के पुत्र श्रृंगभुज की उपेक्षा होने लगेगी|”

तब रानियों ने मिलकर एक षड्यंत्र रचा| उनकी अगुवा बनी रानी आयेशालेखा| एक दिन उसने राजा वीरभुज से कहा – “आर्यपुत्र! आप दूसरे लोगों के कलंक तो धोते रहते हैं, पर पता नहीं क्यों अपने घर के कलंक की ओर आपका ध्यान ही नहीं जाता?”

“क्या हुआ रानी, तुम किस कलंक की बात कर रही हो?” राजा ने मुस्कराते हुए पूछा|

“इतने अनजान मत बनो आर्यपुत्र! मैं आपकी चहेती रानी गुणवरा के बारे में बात कर रही हूं|” रानी बोली|

राजा की भृकुटी चढ़ गईं, उसने पूछा – “क्या किया है रानी गुणवरा ने?”

“क्या नहीं किया है उसने?” तीखे स्वर में रानी से कहा – “आपकी इज्जत नीलाम कर रही है वह| महल के प्रहरी ‘सुरक्षित’ के साथ प्यार की पींगें बढा रही है वह आजकल| महल में आजकल उन दोनों के प्रेम की चर्चाएं ही बातचीत का प्रमुख केंद्र बिंदु है| उसे ऐसा करने से रोकिए राजन, अन्यथा आपकी कीर्ति पर बहुत बड़ा धब्बा लग जाएगा|”

यह सुनकर राजा को एक धक्का-सा लगा, लेकिन फिर उसने सोचा कि रानी आयेशालेखा गुणवरा से ईर्ष्या करती है, इसीलिए उसके विरुद्ध झूठा आक्षेप लगा रही है| यदि इस विषय में दूसरी रानियों से पूछूं तो सच्चाई सामने आ जाएगी|

यह विचार कर उसने एक-एक करके अन्य रानियों से भी इस विषय में उनके विचार पूछे, पर यह षड्यंत्र तो सारी रानियों की राय से ही रचा गया था, अत: सबने एक स्वर से यही कहा कि रानी आयेशालेखा ने गुणवरा पर जो चरित्र हनन का आरोप लगाया है, वह बिल्कुल सही है|

सब रानियों से एक ही उत्तर सुनकर राजा गंभीर हो गया| उसने सोचा – ‘एक या दो रानियों को गुणवरा से ईर्ष्या हो सकती है, लेकिन सबसे नहीं| जरूर दाल में कुछ काला है| मुझे इसका कोई-न-कोई समाधान खोजना ही पड़ेगा|’

ऐसा विचार कर राजा ने सबसे पहले महल के रक्षक ‘सुरक्षित’ को, जिसके विषय में बताया गया था कि उसके रानी गुणवरा के साथ अवैध संबंध हैं, अपने पास बुलवाया और कृत्रिम क्रोध प्रकट करते हुए उससे कहा – “सुरक्षित! हमें विश्वस्त रूप से पता चला है कि तुमने एक ब्राह्मण की हत्या की है| तुम पर ब्रह्महत्या का आरोप है|”

यह सुनकर ‘सुरक्षित’ कांप उठा| उसने कांपते स्वर में कहा – “यह मुझ पर झूठा आरोप है अन्नदाता! मैंने किसी ब्राह्मण की हत्या नहीं की| ब्राह्मण तो सदैव से मेरे लिए पूज्य रहे हैं|”

“तो क्या हम झूठ कह रहे हैं?” राजा ने कहा – “हम चाहें तो इस अपराध में तुम्हें सूली पर चढ़ा सकते हैं, किंतु तुम्हारी सेवाओं को देखकर मन विचलित हो जाता है, अत: हमने फैसला किया है कि तुम तत्काल यह नगर छोड़कर ‘वराह क्षेत्र’ में चले जाओ और पवित्र जाह्नवी में स्नान कर स्वयं को पापमुक्त कर लो|”

‘जान बची और लाखों पाए|’ सुरक्षित ने इसी में अपनी भलाई समझी कि शीघ्रता से वह नगर छोड़कर चला जाए| क्या पता किस घड़ी राजा की नीयत बदल जाए और वह उसे सूली पर चढ़वा दे| तब वह अपनी आवश्यकता का सामान लेकर जल्दी से नगर छोड़कर चला गया|

तत्पश्चात राजा वीरभुज अपनी बड़ी रानी गुणवरा के पास पहुंचा और उससे कहा – “महारानी गुणवरा! मुझे एक विश्वस्त ज्योतिषी ने बताया है कि कुछ दिन के लिए मैं तुम्हें जमीन के नीचे बने किसी गर्भागार (तहखाना) में सुरक्षित पहुंचा दूं और स्वयं ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए राजकार्य करता रहूं| यदि मैंने ऐसा न किया तो इस राज्य पर दैवीय प्रकोप टूट पड़ेगा|”

“तब तो आप वही कीजिए स्वामी, जो कुछ आपसे ज्योतिषी ने कहा है| आपकी और राज्य की भलाई के लिए तो मैं कैसा भी बलिदान करने को प्रस्तुत हूं|” रानी गुणवरा ने कहा|

इस प्रकार रानी गुणवरा को एक भूगर्भ में पहुंचवाकर राजा निश्चिंत हो गया| भूतल में बने उस कक्ष में राजा ने गुणवरा के लिए प्रचुर मात्रा में खाद्य-सामग्री उपलब्ध करा दी| दो सेवक भी रानी की सेवा में नियुक्त कर दिए गए, लेकिन रानियों को इतने से ही संतोष न हुआ| एक दिन रानी आयेशालेखा ने अपने पुत्र निर्वासभुज को अपने पास बुलवाकर उससे कहा – “पुत्र निर्वासभुज! हमने रानी गुणवरा का कंटक तो दूर कर दिया है| अब तुम शेष भाइयों के साथ मिलकर कोई ऐसा उपाय सोचो कि श्रृंगभुज नाम का यह कांटा भी दूर हो जाए| यदि ऐसा हो गया तो बड़े पुत्र होने के नाते तुम राज्य के युवराज घोषित कर दिए जाओगे|”

दुष्ट प्रवृति के निर्वासभुज ने तब अपने शेष भाइयों के साथ मंत्रणा की| उसने एक योजना बनाई, जिसे सभी राजकुमारों ने स्वीकार कर लिया| फिर उस योजना को क्रियांवित करने का उन्हें अवसर भी मिल गया| एक दिन सभी राजकुमार शस्त्र परीक्षा के लिए नगर के बाहर एक स्थान पर एकत्रित हुए| वहां उन्हें दूर बैठा एक विशालकाय बगुला दिखाई दिया| यह देखकर एक राजकुमार ने कहा – “भैया निर्वासभुज! उधर तो देखो, कितना विशालकाय बगुला है| ऐसा विशालकाय बगुला तो मैंने अभी तक कहीं भी नहीं देखा है|”

निर्वासभुज बोला – “ऐसे ही किसी आखेट की तो हमें तलाश थी| चलो, उस बगुले पर अपने-अपने निशाने का परीक्षण करते हैं| जिसके बाण ने बगुले का शरीर वेध दिया, उसे ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाएगा|”

सबने निर्वासभुज का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उस बगुले पर शर-संधान (निशाना लगाने) को तैयार हो गए|

उसी समय एक संन्यासी, जो वहां से गुजर रहा था, उनके करीब पहुंचा और राजकुमारों से कहा – “राजकुमारों! क्षत्रिय-पुत्रों के लिए अपने शस्त्रों से अभ्यास करना एक उत्तम परंपरा है| सदियों से क्षत्रिय लोग वन में जाकर आखेट करते रहे हैं, किंतु यहां स्थिति दूसरी है| जिस बगुले पर तुम निशाना लगाने जा रहे हो, वह कोई सामान्य बगुला नहीं है|”

“तो फिर कौन है वह?” एक राजकुमार ने शंका व्यक्त की|

संन्यासी बोला – “वह है बगुले के वेश में एक भयंकर राक्षस! उसका नाम अग्निशिख है, इसलिए तुममें से जो भी बाण चलाने की विद्या में सबसे ज्यादा कुशल हो, वही इस राक्षस पर बाण चलाए| यदि उसका निशाना चूक गया और राक्षस बच निकला तो वह तुम सब पर कहर ढा देगा|”

यह सुनकर श्रृंगभुज को छोड़कर सभी राजकुमार सहम गए| फिर उन्हें श्रृंगभुज को समाप्त करने का उचित अवसर लगने लगा| निर्वासभुज ने तब श्रृंगभुज से कहा – “श्रृंगभुज! हम सब अपनी हार स्वीकार करते हैं| हम मानते हैं कि तुम ही हम सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर हो, अत: अब पिताजी द्वारा दिए अपने विशेष सुनहरे तीर से तुम इस कपटी बगुले का वध कर दो|”

यह सुनकर श्रृंगभुज बोला – “भैया निर्वासभुज! अपनी श्रेष्ठता के कारण तो नहीं, पर आपके आदेश के कारण मुझे यह चुनौती स्वीकार है| पिताजी द्वारा दिए गए सुनहरे तीर से, जिसका वार कभी निष्फल नहीं होता, मैं इस बगुले रूपी राक्षस का वध अवश्य करूंगा|”

श्रृंगभुज बगुले के समीप पहुंचा| उसने निशाना साधा और बगुले को इंगित करके बाण चला दिया| निशाना सही बैठा| बगुलारूपी राक्षस एकदम से हड़बड़ा गया| उसके शरीर से झर-झर करके रक्त बहने लगा, जान बचाने के लिए वह उड़ा और बहते रक्त की परवाह न करते हुए श्रृंगभुज के तीर को लिए हवा में ऊंचा उठ गया| फिर उसने दिशा बदली और एक निश्चित दिशा में उड़ता हुआ श्रृंगभुज की निगाहों से ओझल हो गया|

‘यह तो बहुत बुरा हुआ| बगुला मरा भी नहीं और पिताजी द्वारा दिए गए मेरे तीर को भी ले गया| खैर, कहीं तो जाकर यह बगुला दम लेगा|’ ऐसा विचारकर श्रृंगभुज उसी दिशा में दौड़ पड़ा|

बगुला लगातार अपनी निश्चित दिशा में उड़ रहा था और श्रृंगभुज उसके शरीर से टपकती रक्त की बूंदों के सहारे उसका लगातार पीछा कर रहा था| अचानक जंगल समाप्त हो गया और बगुला भी गायब हो गया| तब राजकुमार को एक और ही दृश्य दिखाई दिया| कुछ ही दूरी पर उसने एक अत्यंत सुंदर नगर को देखा, जिससे निकलकर एक सुंदर युवती उसे अपनी ओर आती दिखाई दी| युवती निकट पहुंची तो श्रृंगभुज ने उससे पूछा – “हे सुंदरी! तुम कौन हो और इस नगर का क्या नाम है? ऐसा सुंदर नगर मैंने पहले कभी नहीं देखा|”

यह सुनकर युवती ने मुस्कराते हुए कहा – “इस सुंदर नगर का नाम धूमपुर है, युवक! यहां मेरे पिता राक्षसराज अग्निशिख का राज्य है| मैं उन्हीं को बेटी रूपशिखा हूं|”

फिर उसने श्रृंगभुज से पूछा – “अब तुम बताओ, तुम कौन हो?”

“मैं आर्यश्रेष्ठ वर्धमान नगर के स्वामी महाराज वीरभुज का पुत्र हूं| मेरा नाम श्रृंगभुज है| अभी कुछ समय पूर्व मैंने एक विशाल बगुले को मारने के लिए उस पर बाण चलाया था, किंतु वह बगुला मेरे बाण को शरीर में लिए उड़कर इधर आ गया| वह इधर ही कहीं है, लेकिन मुझे उसके ठिकाने का पता नहीं मालूम| मैं अपने उसी तीर को वापस लेने के लिए आया हूं, क्योंकि वह तीर मेरे पिता द्वारा मुझे भेंट-स्वरूप प्रदान किया गया था|” श्रृंगभुज ने अपना वस्तृत परिचय दिया|

यह सुनकर वह सुंदर युवती बोली – “तुम्हारा साहस वास्तव में ही प्रशंसा के योग्य है, युवक! वह बगुला कोई और नहीं, मेरे पिता राक्षसराज अग्निशिख ही थे| उन्हीं पर तुमने बाण चलाया था|”

“मुझे क्षमा करना सुंदरी!” श्रृंगभुज बोला – “मुझे नहीं मालूम था कि बगुले के रूप में तुम्हारे पिता हैं| अब कैसे हैं वे?”

“वे भली प्रकार से हैं| हमारे राजवैद्य की कृपा से वे बिल्कुल ठीक हो गए हैं, उनका घाव भर गया है| यही था न वह तीर, जिससे तुमने उन पर निशाना साधा था! यह तीर उन्होंने मुझे खेलने के लिए दे दिया है|” कहते हुए उस सुंदरी ने वह तीर श्रृंगभुज को दिखाया|

“यह तीर मुझे दे दो सुंदरी!” श्रृंगभुज ने अनुनय करते हुए कहा – “यह तीर मेरे पिता की अमानत है|”

“यह तीर तुम्हें इस प्रकार नहीं मिलेगा राजकुमार!” रूपशिखा नामक वह सुंदरी इठलाकर बोली – “तीर लेने के लिए तुम्हें मेरे साथ मेरे महल में चलना होगा| मेरा आतिथ्य-सत्कार स्वीकार करना पड़ेगा|”

श्रृंगभुज तो पहली ही नजर में रूपशिखा की सुंदरता पर मोहित हो चुका था, अत: वह प्रसन्नता के साथ उसके साथ चल पड़ा|

रूपशिखा उसे अपने महल में ले आई| श्रृंगभुज की तरह ही वह भी श्रृंगभुज की सुंदरता और उसके सौष्ठव शरीर पर मुग्ध हो चुकी थी| उसने विविध प्रकार से श्रृंगभुज का स्वागत-सत्कार किया| संकेत-ही-संकेत में उसने यह भी जता दिया कि वह श्रृंगभुज को चाहने लगी है| स्वागत-सत्कार के बाद रूपशिखा उसे अपने पिता से परिचय करवाने के लिए ले गई| उसने श्रृंगभुज का परिचय अपने पिता राक्षसराज अग्निशिख से कराया, लेकिन उसने अपने पिता को यह नहीं बताया कि श्रृंगभुज के तीर से ही अग्निशिख घायल हुआ था| रूपशिखा ने अपने मन की इच्छा अपने पिता को बताई – “पिताश्री! यह वर्धमान नरेश के पुत्र युवराज श्रृंगभुज हैं| मैंने इन्हें पति के रूप में चयन कर लिया है| अब आप कृपा कर हम दोनों को विवाह की अनुमति दे दीजिए|”

सुनकर राक्षसराज अग्निशिख ने कहा – “रूपशिखा! तुम्हारा चयन उपयुक्त प्रतीत होता है, लेकिन मैं पहले इस राजकुमार की कुछ परीक्षाएं लूंगा| यदि यह उन परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो गया तो मैं तुम्हें इसके साथ विवाह करने की अनुमति दे दूंगा|” इतना कहकर अग्निशिख वहां से उठकर चला गया| अग्निशिख के जाने के बाद श्रृंगभुज ने रूपशिखा से पूछा – “तुम्हारे पिता कहां चले गए रूपशिखा? वे मेरी किस प्रकार की परीक्षा लेना चाहते हैं?”

रूपशिखा ने बताया – “युवराज! हम एक सौ एक बहनें हैं| सारी-की-सारी बहनें समान कद, समान चेहरे-मोहरे वाली हैं| पिताजी उन बहनों के मध्य मुझे खड़ा करके तुमसे यह पहचान कराएंगे कि उनमें से रूपशिखा कौन है| यदि तुमने मुझे पहचान लिया तो मेरा विवाह तुम्हारे साथ हो जाएगा, अन्यथा तुम्हें यहां से जाने का मार्ग दिखा दिया जाएगा| ऐसी स्थिति में हम दोनों विवाह नहीं कर पाएंगे|”

यह सुनकर श्रृंगभुज सोच में पड़ गया| उसने रूपशिखा से पूछा – “रूपशिखा! तुम कहती हो कि तुम्हारी सारी बहनें कद-काठी और चेहरे-मोहरे से एक समान हैं| वे सब एक जैसी पोशाकें पहनती हैं| ऐसी हालत में मैं तुम्हें कैसे पहचान पाऊंगा?”

सुनकर रूपशिखा मुस्कराई| फिर बोली – “उसकी तरकीब मैं तुम्हें बता देती हूं| जब मैं अपनी बहनों के बीच खड़ी होऊंगी तो अपना कंठहार अपने सिर पर रख लूंगी| इस प्रकार तुम मेरी पहचान आसानी से कर लोगे| तब तुम मेरे निकट पहुंचकर मेरा हाथ थाम लेना|”

फिर वैसा ही किया गया| अग्निशिख ने अपनी सौ समान शक्ल-सूरत वाली कन्याओं के बीच रूपशिखा को खड़ा करके श्रृंगभुज से उसे पहचानने के लिए कहा| कंठहार सिर पर रखा होने के कारण श्रृंगभुज ने तत्काल रूपशिखा को पहचानकर उसका हाथ थाम लिया, तब वह अग्निशिख से बोला – “मेरी पसंद की आपकी पुत्री ये है, राक्षसराज!”

यह सुनकर अग्निशिख ने कहा – “राजकुमार! तुम अपनी पहली परीक्षा में तो सफल हो गए, किंतु अभी और भी एक परीक्षा शेष है| उसमें सफल हो जाओगे, तभी तुम्हारा विवाह रूपशिखा से हो पाएगा|”

“वह दूसरी परीक्षा कौन-सी है, राक्षसराज?” श्रृंगभुज ने पूछा|

अग्निशिख ने दूसरी परीक्षा के विषय में बताया – “यहां से दस कोस के अंतर पर दक्षिण दिशा में एक शिव मंदिर में मेरा भाई धूमशिख रहता है| तुम्हें अपने और रूपशिखा के विवाह की सूचना मेरे उस भाई तक पहुंचानी है| सूचना देकर तुम्हें तुरंत ही लौट आना है|”

“यह कौन-सा मुश्किल काम है?” श्रृंगभुज ने कहा – “यद्यपि समय थोड़ा है, तथापि मुझे विश्वास है कि प्रात:काल होने से पूर्व ही मैं यह काम करके यहां अवश्य लौट आऊंगा|”

“ठीक है, तो फिर तुरंत रवाना हो जाओ|”अग्निशिख ऐसा कहकर वहां से चला गया|

अग्निशिख के जाने के बाद रूपशिखा ने श्रृंगभुज से कहा – “युवराज! यह काम इतना आसान नहीं है, जितना तुम समझ रहे हो| सच बात तो यह है कि मेरे पिता अपने भाई द्वारा तुम्हारा वध करवा देना चाहते हैं, लेकिन तुम चिंता मत करो| मैं तुम्हें कुछ ऐसी चीजें दे देती हूं, जो तुम्हारी सहायता एवं तुम्हारी रक्षा करेंगी|”

ऐसा कहकर रूपशिखा ने श्रृंगभुज को विशेष प्रकार की कुछ मिट्टी, मंत्रपूरित जल, अग्नि, कांटे एवं एक सुंदर घोड़ा दिया| फिर वह श्रृंगभुज से बोली – “युवराज! इस घोड़े पर सवार होकर तुम धूमशिख के पास पहुंचना| उसे संदेश देना और तुरंत लौट आना| लौटते समय गर्दन घुमाकर पीछे देखना| यदि धूमशिख तुम्हें अपना पीछा करता दिखाई दे तो तुरंत इस विशेष मिट्टी को पीछे फेंक देना| यदि इस पर भी वह न रुके तो ये जल पीछे फेंक देना| इतने पर भी यदि वह तुम्हारा पीछा करना जारी रखे तो कांटे पीछे की ओर फेंकना| कांटे पार करके भी यदि वह तुम्हारा पीछा जारी रखे तो अंत में ये अग्नि पीछे फेंक देना|”

“क्या ये चीजें सचमुच ऐसी चमत्कारी हैं?” श्रृंगभुज ने संदेहयुक्त स्वर में पूछा|

“यकीनन! आज तुम स्वयं अपनी आंखों से इनका चमत्कार देख लेना|”

रूपशिखा की दी हुई चीजों को लेकर श्रृंगभुज घोड़े पर सवार होकर तेज गति से धूमशिख के पास जाने के लिए रवाना हो गया| उसने शिव मंदिर में पहुंचकर धूमशिख को उसके भाई का संदेश दिया और तत्काल घोड़े को मोड़कर द्रुत गति से लौट पड़ा|

जब वह कुछ दूरी तय कर चुका तो उसने गर्दन घुमाकर पीछे की ओर देखा| पहाड़ जैसे शरीर वाला धूमशिख बड़ी तेजी से उसे अपने पीछे आता दिखाई दिया| सुरक्षा के लिए श्रृंगभुज ने रूपशिखा की दी हुई मंत्रपूरित विशेष मिट्टी निकाली और पीछे की दिशा में फेंक दी| मिट्टी ने जैसे ही धरती का स्पर्श किया, उसका आकर बढ़ना आरंभ हो गया| देखते-ही-देखते वह एक विशाल पर्वत का रूप धारण कर गई| इससे धूमशिखा का मार्ग अवरुद्ध हो गया|

‘अब इस पहाड़ को पार करके आना उसके लिए मुश्किल होगा| तब तक मैं सुरक्षित जा पहुंचूंगा|’ ऐसा विचार कर मन-ही-मन प्रसन्न होता हुआ श्रृंगभुज आगे बढ़ चला|

कुछ आगे जाने के बाद श्रृंगभुज ने पीछे मुड़कर देखा| यह देखकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि धूमशिख ने बड़ी सहजता से उस पर्वत को पार कर लिया था| अब वह और भी तेजगति से श्रृंगभुज का पीछा कर रहा था|

श्रृंगभुज ने तत्काल मंत्रपूरित जल पीछे की ओर फेंका, जो देखते-ही-देखते एक विशाल जलधारा में परिवर्तित हो गया|

‘अब देखता हूं इस तीव्र प्रवाह वाली जलधारा को यह राक्षस कैसे पार कर पाता है?’ ऐसा सोचकर वह फिर आगे बढ़ चला|

लेकिन उसका यह सोचना व्यर्थ ही साबित हुआ| कुछ आगे जाने के बाद जब उसने गर्दन मोड़कर पीछे देखा तो राक्षस को और भी तेजगति से अपना पीछा करते हुए पाया| श्रृंगभुज ने घोड़े को ऐड़ लगाकर उस पर चाबुक फटकार दिया| घोड़ा पवन की मानिंद उड़ चला, तभी उसने पीछे से धूमशिखा की हुंकार भरी गर्जना सुनी| वह कह रहा था – “भागना बेकार है युवक! धूमशिख से आज तक उसका शिकार बच नहीं सका है| बचने का प्रयास छोड़ दो और घोड़े को रोककर खड़े हो जाओ|”

इस बार श्रृंगभुज की पीछे देखने की हिम्मत न हुई| उसने मंत्रपूरित कांटे निकाले और उन्हें पीछे की ओर फेंक दिया| जमीन पर गिरते ही कांटों का आकार बढ़ने लगा| धूमशिख जब तक वहां पहुंचा कांटों का एक विशाल जंगल पैदा हो गया|

श्रृंगभुज ने घोड़े को और भी तेज भगाना शुरू कर दिया| जब रूपशिखा का नगर मात्र एक कोस के अंतर पर रह गया तो उसने मुड़कर पीछे की ओर देखा, न जाने कैसे उस विशालकाय राक्षस ने उस कांटे के जंगल को भी पार कर लिया था और वह तेजी के साथ श्रृंगभुज की दिशा में लपक रहा था|

श्रृंगभुज ने तब प्रभु का नाम लेकर अपने आखिरी अस्त्र का सहारा लिया और उसने अग्नि पीछे की ओर फेंक दी| जमीन पर गिरते ही अग्नि का एक विशाल गोला उठा और आकार में फैलता चला गया| देखते-ही-देखते उसने दावानल का रूप धारण कर लिया| यह देख पीछे आता हुआ धूमशिख रुक गया| अग्नि की तेज लपटें उसकी ओर बढ़ने लगीं तो वह घबरा गया और तुरंत घूमकर पीछे की ओर दौड़ पड़ा| अग्नि को पार कर पाना उसके लिए नामुमकिन था|

अब कोई बाधा शेष न रही| श्रृंगभुज सुरक्षित रूप से अग्निशिख के महल में पहुंच गया| तत्पश्चात वह घोड़े से उतरा और अग्निशिख के पास पहुंचकर बोला – “राक्षसराज! मैंने दूसरी परीक्षा भी पास कर ली है| अब आप अपने वचन का पालन कीजिए|”

श्रृंगभुज को सही सलामत वहां पहुंचा हुआ देखकर अग्निशिख को बहुत आश्चर्य हुआ – ‘मेरा भाई धूमशिख एक विकट राक्षस है, उसके हाथों से यह युवक बच कैसे गया?’ ऐसा विचार कर उसने सशंक स्वर में पूछा – “नौजवान! मुझे विश्वास नहीं आता कि तुम मेरा संदेश मेरे भाई धूमशिख को दे आए हो| जरूर तुम बीच से ही लौट आए हो और मुझसे झूठ-मूठ ही मेरा संदेश उसे पहुंचाने की बात कह रहे हो|”

“झूठ बोलने की मेरी आदत नहीं है, राक्षसराज! मैं सौगंध खाकर कहता हूं कि मैंने आपका संदेश आपके भाई धूमशिख के पास पहुंचा दिया है|” श्रृंगभुज ने कहा|

“तब फिर मेरे भाई की कोई निशानी बताओ| उस मंदिर के विषय में कुछ बताओ, जिसमें मेरा भाई रहता है| मेरे भाई के आकार-प्रकार, उसके चेहरे-मोहरे के विषय में मुझे बताओ|” अग्निशिख ने कहा|

“आपके भाई का आकार बिल्कुल आपके जैसा ही है|” श्रृंगभुज बोला – “उसकी शक्ल आपसे बिल्कुल मिलती है| वह जिस मंदिर में रहता है, उस मंदिर में शिव मूर्ति के दाईं ओर गणेशजी की और बाईं ओर पार्वतीजी की प्रतिमाएं हैं| क्या इतनी निशानी पर्याप्त नहीं हैं, राक्षसराज?”

“पर्याप्त हैं| अब मुझे संशय नहीं रहा कि तुम सचमुच मेरे भाई के पास मेरा संदेश पहुंचा आए हो| अपने वचन के अनुसार कल प्रात:काल मैं तुम दोनों का विवाह कर दूंगा|” राक्षस अग्निशिख ने कहा|

इस प्रकार अगले दिन श्रृंगभुज और रूपशिखा का विवाह संपन्न हो गया| कुछ समय तक दोनों आनंदपूर्वक वहां रहते रहे, फिर एक दिन श्रृंगभुज ने रूपशिखा से कहा – “प्रिये! मुझे यहां रहते हुए बहुत समय हो चुका है| अब मैं चाहता हूं कि अपनी नव विवाहिता वधू को अपने माता-पिता, स्वजन एवं अन्य बंधु-बांधवों से मिलवाऊं| मैंने निर्णय किया है कि कल हम यहां से अपने नगर वर्धमान के लिए प्रस्थान कर देंगे| बताओ, क्या राय है तुम्हारी इस विषय में?”

“मेरी राय स्पष्ट है स्वामी! मैं भी अपनी सास, श्वसुर एवं आपके परिजनों का आशीर्वाद लेने के लिए बहुत उत्सुक हैं, किंतु…|”

“किंतु क्या प्रिये!” आशंकित श्रृंगभुज ने पूछा|

“कुछ अड़चनें हैं, जो हमारे यहां से जाने में बाधक हो सकती हैं|” रूपशिखा बोली|

“कैसी अड़चनें हैं?”

“अड़चन है मेरे पिता की स्वीकृति| मेरे पिता हम दोनों को यहां से जाने की आज्ञा कभी नहीं देंगे और यदि हम उनकी इच्छा के विपरीत यहां से चल दिए तो क्रोधित होकर वे हमारे मार्ग में अनेक बाधाएं पैदा कर सकते हैं|”

“किंतु हम हमेशा के लिए तो यहां नहीं रह सकते रूपशिखा! मेरा अपना भी घर है| माता-पिता हैं, स्वजन हैं, संबंधी हैं, अंतत: उनसे तो मिलना ही होगा न!”

“ठीक कहते हो स्वामी! विवाह के उपरांत पति का घर ही स्त्री का घर होता है, अत: मैं जाने का प्रबंध करती हूं| पिताजी नाराज होते हैं तो होते रहें|” अगले दिन भोर होने से पूर्व ही अश्वशाला के सबसे तेज दौड़ने वाले ‘शरवेग’ नामक घोड़े पर सवार होकर दोनों पति-पत्नी नगर से बाहर निकले| चलते समय रूपशिखा ने एक बहुत बड़ी पोटली घोड़े की पीठ पर रख ली, फिर उन्होंने द्रुत गति से घोड़ा वर्धमान नगर की ओर दौड़ा दिया|

एक नगर रक्षक ने उन्हें वायु वेग से नगर की सीमा से बाहर निकलते देखा| उसने तुरंत यह सूचना अपने स्वामी अग्निशिख के पास पहुंचा दी| यह सूचना सुनकर अग्निशिख बहुत क्रोधित हुआ| उसने नगर रक्षक को आदेश दिया – “मेरी बेटी मेरी आज्ञा के बिना यहां से गई है| ऐसा लगता है, उसके पति ने उसे बहका दिया है| मैं उनके पीछे जाता हूं| मेरे हत्थे चढ़ गए तो राजकुमार को इस कार्य के लिए दंडित करूंगा| राक्षसी परंपरा के अनुसार राक्षस कन्याएं अपने पति के घर कभी नहीं जातीं, इसके विपरीत उसके पति को ही आजीवन कन्या के घर रहना पड़ता है|”

ऐसा कहकर अग्निशिख वास्तविक आकार धारण कर उन दोनों की खोज में निकल पड़ा| श्रृंगभुज और रूपशिखा ने अभी आधा रास्ता ही पार किया था कि राक्षसराज अग्निशिख उनके नजदीक जा पहुंचा| श्रृंगभुज ने पीछे मुड़कर देखा तो वह रूपशिखा से बोला – “रूपशिखा! तुम्हारे पिता को हमारे भागने का पता चला गया है| पीछे मुड़कर देखो, बड़ी तीव्र गति से वह हमारी ओर झपटे आ रहे हैं|”

रूपशिखा ने पीछे मुड़कर देखा, सचमुच हवा का गोला बना उसका पिता अग्निशिख बवंडर के रूप में तेजी से उनकी तरफ झपटा आ रहा था| यह देखकर उसने अपने पति से कहा – “आर्यपुत्र! तत्काल वन के किसी घने कुंज में घोड़े को रोक लो| मैं कुछ ऐसा उपाय करती हूं, जिससे अपने पिता को चकमा दे सकूं|”

श्रृंगभुज ने ऐसा ही किया| घनी झाड़ियों व ऊंचे-ऊंचे घने वृक्षों के नीचे उसने घोड़ा रोक दिया| तब राक्षस पुत्री रूपशिखा ने अपनी माया फैलाई| माया के प्रभाव से उसने घोड़े और अपने पति को तत्काल गायब कर दिया और स्वयं एक लकड़हारे का रूप धारण कर एक वृक्ष की जड़ पर कुल्हाड़ी चलाने लगी|

कुछ ही देर में अग्निशिख वहां आ पहुंचा| इस वेश में वह रूपशिखा को पहचान नहीं पाया| उसने लकड़हारा बनी रूपशिखा से पूछा – “लकड़हारे! क्या तुमने अभी कुछ देर पहले यहां से घोड़े पर सवार होकर जाते एक स्त्री और पुरुष को देखा है?”

“नहीं राक्षसराज! मैं तो प्रात: से ही अपने कार्य में लगा हुआ हूं| आज शाम तक मुझे ढेरों लकड़ियां काटकर राक्षसराज अग्निशिख की पाकशाला में पहुंचानी हैं| वे दोनों यदि यहां से गुजरे भी होंगे तो मेरा ध्यान उनकी ओर नहीं आकर्षित हुआ, क्योंकि मैं अपने काम में तन्मयता से लगा हुआ था|”

“ओह! इसका मतलब है, वे दोनों मुझे चकमा देने में कामयाब हो गए|” राक्षस बड़बड़ाया – “खैर, जाएंगे कहां? अभी महल वापस पहुंचकर उनकी खोज में अपने राक्षस दूतों को दौड़ाता हूं|”

यह कहकर राक्षसराज अग्निशिख वापस अपने नगर को लौट गया| राक्षस के वहां से जाते ही रूपशिखा ने अपनी माया समेट ली| श्रृंगभुज और घोड़ा पुन: प्रकट हो गए| रूपशिखा भी अपना लकड़हारे का वेश त्यागकर पुन: रूपसी बन गई| घोड़े पर बैठकर दोनों फिर से वर्धमान नगर की ओर चल पड़े|

दोनों वर्धमान नगर में पहुंचे तो राजा वीरभुज ने खुले दिल से अपने पुत्र और पुत्रवधू का स्वागत किया| फिर उसने श्रृंगभुज से कहा – “पुत्र श्रृंगभुज! सिर्फ एक सोने का तीर वापस लाने के लिए तुमने इतना बड़ा दुस्साहस कर डाला! पुत्र, तुम नहीं जानते कि तुम्हारे जाने के पश्चात मेरी हालत कैसी हो गई थी! मैं दिन-रात तुम्हारे लिए व्याकुल रहता था| मुझे हरदम यही चिंता सताती रहती थी कि कहीं तुम किसी विपत्ति में न फंस जाओ| इतने दिन मैंने तुम्हारी याद में तड़प-तड़पकर गुजारे हैं| पुत्र! तुम्हें ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए था|”

“पिताश्री!” श्रृंगभुज ने कहा – “मैं अपने भाइयों का आदेश टाल नहीं सका| उन्होंने कहा था कि यदि मैं वह तीर वापस न लाया तो पिताश्री हम सबको इस राज्य से निर्वासित कर देंगे|”

“मैं भला ऐसा क्यों करता पुत्र! क्या वह तीर तुम्हारे जीवन से भी ज्यादा मूल्यवान था? एक मामूली तीर के लिए क्या कोई पिता अपनी संतान को तिलांजली दे सकता है?”

राजा वीरभुज ने स्नेह-भरे स्वर में कहा|

“अब जो हो गया, सो हो गया| मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूं पिताश्री! मैं आपसे भी क्षमा मांगता हूं और अपने बड़े भाइयों से भी|” श्रृंगभुज के ऐसा करने पर राजा वीरभुज ने उसे हृदय से लगा लिया|

श्रृंगभुज जब अपने कक्ष में चला गया तो राजा ने अपने मन में विचार किया – ‘मेरे बड़े पुत्रों ने ऐसा क्यों किया? क्या वे चाहते थे कि मेरा प्रिय पुत्र श्रृंगभुज उस राक्षस के द्वारा मार दिया जाए और फिर रानियां…मेरी रानियों ने भी तो क्या कोई षड्यंत्र रचकर मेरी प्रिय रानी गुणवरा को बदनाम करने की कोशिश नहीं की थी? जिससे कि वे अपने मार्ग का कांटा निकालकर मेरा प्रेम प्राप्त कर सकें? निश्चय ही ऐसा ही हुआ है| मेरी शेष रानियां महारानी गुणवरा से द्वेष रखती हैं, इसीलिए उन्होंने महारानी गुणवरा को गर्भागार में रखने के लिए मुझे विवश किया है| महारानी गुणवरा गर्भागार में है, उसका पुत्र श्रृंगभुज राक्षस के द्वारा मारा जाता तो निश्चय ही आयेशालेखा का पुत्र निर्वासभुज युवराज घोषित किया जाता| मुझे इस षड्यंत्र का पर्दाफाश करना ही पड़ेगा, लेकिन कैसे? कैसे लगाऊं इस षड्यंत्र का पता?’

राजा वीरभुज बहुत देर तक इस विषय पर सोच-विचार करते रहे| अंत में उन्होंने यही निश्चय किया – ‘रानी आयेशालेखा से इस रहस्य की जानकारी मिल सकती है| वह मद्यपान की शौकीन है| जब वह मद्य की तरंग में होती है तो बहुत-सी गुप्त बातें भी बता डालती है| किसी दिन उसे मदिरा पिलाकर उससे इस रहस्य को पूछूंगा|’

राजा को अब महारानी गुणवरा के प्रति किए गए अपने अपराध का बोध होने लगा| उसे अफसोस होने लगा – ‘मैंने बेकार ही शेष रानियों के कहने में आकर गुणवरा को कष्ट पहुंचाया| अब पहले उसके पास चलकर उसे गर्भागार से बाहर निकालना चाहिए, तब उससे किए गए अपराध की क्षमा याचना करनी चाहिए|’

ऐसा विचार कर राजा ने गुणवरा को गर्भागार से बाहर निकलवाया और उसे अपने कक्ष में पहुंचाया| प्रहरी ‘सुरक्षित’ भी तब तक तीर्थ यात्रा करके वापस लौट आया था| राजा ने उससे भी क्षमा मांगी और उसकी पदोन्नति करके उसे अपना निजी सहायक बना लिया|

शीघ्र ही एक दिन रानी आयेशालेखा मद्य की तरंग में उसके समक्ष यह बक गई कि यह सब एक षड्यंत्र के तहत हुआ था| अब तो राजा का क्रोध रानियों पर टूट पड़ा| उन्होंने सेनानायक को बुलाकर यह आदेश दे डाला – “सेनानायक! हमारा आदेश है कि रानी गुणवरा को छोड़कर हमारी शेष सभी रानियों को कारागार में डाल दिया जाए| उनके पुत्रों को भी तत्काल हमारे राज्य से निर्वासित कर दिया जाए|”

महारानी गुणवरा को जब राजा के इस आदेश के बारे में पता चला तो वह राजा के चरणों में गिर पड़ी और कहने लगी – “स्वामी! मेरी बहनों को इतनी कठोर सजा मत दीजिए| उन्होंने जो कुछ किया, ईर्ष्यावश किया है| कृपया उन्हें क्षमा कर दें| उनकी ओर से मैं आपसे क्षमा मांगती हूं|”

अपनी प्रिय रानी का आग्रह सुनकर राजा का हृदय द्रवित हो उठा| वह बोला – “ठीक है महारानी! तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है तो हम उन्हें क्षमा करते हैं, लेकिन आज के पश्चात वे महल में उपेक्षित रहेंगी| हम उनके पास कभी नहीं जाएंगे, लेकिन उनके पुत्रों को देश निर्वासन अवश्य होगा|”

तभी श्रृंगभुज हाथ जोड़कर राजा के समक्ष प्रस्तुत हुआ – “पिताश्री! अपने बड़े भाइयों की ओर से मैं उनके अपराध के लिए क्षमा याचना करता हूं| सिर्फ एक बार उनकी नादानी के लिए उन्हें क्षमा करके अपने यह आदेश वापस ले लीजिए|”
श्रृंगभुज के आग्रह पर राजा ने अपने शेष पुत्रों का देश-निर्वासन रद्द कर दिया, फिर उन्होंने राजकुमारों को बुलाकर कहा – “मैंने निर्णय किया है कि मेरे पश्चात इस राज्य का उत्तराधिकारी श्रृंगभुज होगा, तुम सारे भाई उसके आदेश का पालन करते हुए राज-कार्य के संचालन में उसकी सहायता करोगे|”

“लेकिन पिताजी! यह तो अन्याय है|” राजा का बड़ा पुत्र बोला – “सबसे बड़ा होने के कारण राज्य का उत्तराधिकारी तो मैं हूं, फिर आप श्रृंगभुज को क्यों युवराज घोषित करना चाहते हैं? वह तो हम सब भाइयों से छोटा है|”

“बेशक छोटा है, लेकिन वह तुम सबसे हर विद्या में श्रेष्ठ है| वह धीर, वीर, गंभीर एवं बुद्धिमान है| इसके अतिरिक्त वह क्षमावान भी है| तुम सब तो उसके पैरों की धूल के बराबर भी नहीं हो| सुनो, सिर्फ आयु में बड़ा होने से ही कोई बुद्धिमान नहीं हो जाता| गधा देखा है न तुमने! आयु में बड़ा होने पर भी वह जीवन-भर बोझ ढोता रहता है| आयु में छोटा होते हुए भी कुम्हार का एक छोटा-सा बच्चा उस पर सवारी गांठता है| किसलिए? इसलिए कि वह बच्चा छोटा होते हुए भी गधे से ज्यादा बुद्धिमान है| हाथी जैसे विशालकाय प्राणी को भी मनुष्य अपनी बुद्धि से ही वश में कर लेता है| उस पर सवारी करता है, उससे बोझा ढोने का काम लेता है| यह सब उसकी बुद्धि का ही तो चमत्कार होता है, इसलिए मेरा आदेश मानो और वैसा ही करो, जैसा मैंने कहा है|”

यह सुनकर निर्वासभुज ने अपना दावा छोड़ दिया| श्रृंगभुज को युवराज घोषित कर दिया गया| कुछ समय बाद जब वीरभुज और रानी गुणवरा का देहावासान हो गया तो श्रृंगभुज राजा बना| उसने अपनी वीरता और विद्वता से अपने राज्य का विस्तार किया|  सीमा के निकटवर्ती अन्य राज्यों के समृद्ध राजाओं के साथ मैत्री स्थापित की ओर राज्य को एक सुदृढ़ स्थिति में पहुंचा दिया| रूपशिखा ने भी अन्य रानियों की प्राणपण से सेवा की और उन्हें सगी सास का दर्जा दिया| उसके व्यवहार से प्रेरित होकर श्रृंगभुज के अन्य भाइयों की पत्नियां भी उसी के जैसा आचरण करने लगीं| रूपशिखा के प्रयास से दिवंगत राजा वीरभुज का महल एक आदर्श घर बन गया| कहावत है – ‘यथा राजा तथा प्रजा|’ राज-परिवार की देखा-देखी प्रजाजन भी उसी के अनुसार अपना आचरण करने लगे| ऐसा करने से तामसी वृत्तियों का हास हुआ और श्रृंगभुज एक आदर्श राजा के रूप में स्थापित हो गया|

पाठको! यदि हम सब भी सात्विक विचारों को अपनाकर अपनी तामसी वृत्तियों का त्याग कर दें तो हमारा घर भी स्वर्ग के समान सुंदर बन सकता है| एक बार अपने जीवन में सात्विक परंपरा को अपनाकर तो देखिए| परिणाम बहुत ही सुखकर निकलेगा|

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