शिष्टाचार

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सवाल उठते है कि आदमी किस प्रकार शिष्ट अथवा सज्जन बन सकता है? एक सीख तो यही है कि शिष्टों या सज्जनों का अनुसरण किया जाए तो व्यक्ति सज्जन बन सकता है|

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दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि यदि व्यक्ति अकलमंदी से कार्य तो मूर्खों से भी शिष्टाचार सीख सकता है|  

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एक बार किसी जिज्ञासु ने अपने समय के सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक एवं साधु पुरुष हकीम लुकमान से पूछा- “आपने शिष्टाचार कहाँ से सीखा?” हकीम लुकमान का जवाब था- “यह तहजीब मैंने मूर्खों से सीखी|” इस पर सवाल करने वाला पूछ बैठा- “मूर्खों से हम कैसे सीख सकते हैं?” हकीम लुकमान का उत्तर था- "उनकी जो बात समझ में नहीं आई, वह छोड़ दी|”

हम भी शिष्टाचार या कोई भी गुण उसी स्थिति में सीख सकते हैं जब दूसरों की बुराइयों या दुर्गुणों को देखने की बजाय, केवल दूसरों के सद्गुणों को देखें| संभवतः यही कारण था कि गांधी जी अपने एक जापानी सज्जन द्वारा दिए तीन बंदरों की मूर्ति अपने सामने रखते थे| वे तीन बंदर अपने हाथों का इशारा करते हुए मानो कहते थे-

“कभी बुरा न सुनो, कभी बुरा न देखो और कभी बुरा न कहो|”

इस कहानी से हमें यह सीख लेनी चाहिए कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी कमियों व दूसरों की खूबियों को नजर में रखना चाहिए| 

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