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सम्राट अकबर ने श्रीपति को ढेरों पुरस्कार दिए

अकबर के दरबार में श्रीपति नाम का कवि था। दूसरे दरबारी अकबर की प्रशंसा करते थे, जबकि वह श्रीराम का ही गुणगान करता था। फिर भी अकबर उसे पुरस्कार देते थे। इससे दरबारी उससे जलने लगे थे।

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सम्राट अकबर के दरबार में कई कवि, संगीतज्ञ और विद्वान थे लेकिन ब्रज के कवि श्रीपति का उनमें विशेष स्थान था। अन्य सभी कवि सदा अकबर का ही गुणगान करते थे किंतु श्रीपति राम और कृष्ण के अतिरिक्त और किसी का गुणगान नहीं करते थे।

फिर भी अकबर उन्हें सदैव पुरस्कार व भेंट देते थे। दूसरे दरबारी श्रीपति से बहुत ईष्र्या रखते थे क्योंकि वे अकबर का गुणगान करके भी उतना धन और सम्मान नहीं पाते थे, जितना श्रीपति राम का गुणगान कर पा रहे थे। एक दिन इन्हीं ईष्र्यालु कवियों व दरबारियों ने कवि सम्मेलन के लिए जानबूझकर यह शर्त रख डाली कि सब अकबर की ही प्रशंसा करें। इन लोगों ने सोचा कि अब तो श्रीपति को राम व कृष्ण के स्थान पर अकबर का गुणगान करना पड़ेगा अन्यथा अकबर उसे दंडित करेंगे।

निश्चित दिन कवि सम्मेलन हुआ। सभी कवियों ने अकबर की प्रशंसा में एक से बढ़कर एक कविताएं सुनाईं। अंत में श्रीपति की बारी आई। उन्होंने यह समस्या पूर्ति पढ़ी- एकहि छाड़ि के दूजो भजै, सो जरै रसना अस लबनर की, अब की दुनिया गुनिया जो बनी, यह बांधती फैंट आडंबर की।

कवि श्रीपति आसरों रामहिं को, हम फैंट गही बड़ जब्बर की, जिनको हरि में है प्रीति नहीं, सो करो सब आस अकबर की। यह सुनते ही दरबारी स्तब्ध रह गए। साथ ही ईष्र्यालु खुश हुए कि अकबर इसे अब अवश्य ही दंडित करेंगे, किंतु अकबर श्रीपति की निर्भीकता और सत्यनिष्ठा से इतने प्रसन्न हुए कि सर्वाधिक पुरस्कार उन्हें ही दिए।

सार यह है कि जो उचित है, उसे कहने का हममें साहस होना चाहिए, क्योंकि अंतत: विजय सत्य की ही होती है और वही सम्मान भी पाता है।

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