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न्याय मार्ग से लाभ

न्याय मार्ग से लाभ

नाभानेदिष्ठ मनु के पुत्र थे| वे ब्रहमचर्य-आश्रम के अंतर्गत विधीयमान संस्कारो से युक्त होकर अपने गुरु के समीप वेदाध्ययन में रत रहते| जब पिता की संपत्ति के बँटवारे का समय आया तो नाभानेदिष्ठ के अन्य भाइयों ने आपस में सारी संपत्ति का भाग बाँट लिया और उन्हें कुछ भी नही दिया|

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जब इन्हें इस बात का पता लगा तो इन्होंने अपने पिता मनु के पास जाकर पूछा कि क्या आपने मेरे लिए अपनी संपत्ति का कोई भी भाग स्वीकृत नही किया है? उसके उत्तर में मनु ने उनसे कहा कि यदि पैतृक संपत्ति में से तुम्हें भाग नही मिला तो कोई बात नही, तुम उससे बड़ी एवं उत्कृष्ट संपत्ति को पाने के अधिकारी हो| इस उत्तम संपत्ति को प्राप्त करने का उपाय बतलाते हुए उन्होंने उनसे कहा कि अंगीरस ऋषिगण स्वर्गफल की कामना से सत्र-याग (बारह दिन से अधिक चलने वाला सोमयाग)- का संकल्प लेकर आरंभ के छः दिन का अनुष्ठान पूरा कर चुके है| इसके आगे विशिष्ट दिनों के विधि समस्त अनुष्ठान को संपन्न कराने में वे दिग्भ्रमित एवं मोहित हो रहे है| तुम उन ऋषिगणों के पास जाओ और उनके साथ सत्र-याग को पूर्ण करने में सहायक बनो| अड़तीस मंत्र युक्त दो सूक्तों का पाठ वहाँ शस्त्ररुप में करो| (श्रौत यागों में होता नामक ऋत्विकद्वारा यज्ञ से संबंधित देवताओं की दिव्य स्तुति रुप शंसना (प्रशांसा)- को ‘शस्त्र’ के नाम से अभिहित किया जाता है|) श्रीमनु ने आगे कहा कि इस शस्त्र-पाठ के बदले में वे ऋषिगण तुम्हें एक हज़ार गायों से युक्त उत्तम संपत्ति को प्रदान करेंगे|

अपने पिता की प्रेरणा से उत्साहित नाभानेदिष्ठ आंगिरसों के पास गए ओर उनकी यथाविधि सहायता की| वे आंगिरस इन ऋग्वेद के दो सूक्तों के दिव्य सामर्थय से यज्ञ की पूर्णता को प्राप्त किए और स्वर्ग जाने की सफलता से युक्त होकर उन्हें सहस्त्र गोरूप-संपत्ति प्रदान की|

इस संपत्ति को लेने के लिए नाभानेदिष्ठ जब तत्पर हुए तो उसी समय एक कृष्ण वर्ण का अत्यंत बलशाली पुरुष यज्ञस्थल के उत्तर तरफ़ से उत्पन्न हुआ और उनसे बोला कि ‘यज्ञ के समस्त अविष्ट भाग का अधिकारी मैं हूँ| अतः इन गायों को तुम स्वीकार न करो|’ इस पर नाभानेदिष्ठ ने कहा कि ‘आंगिरसों ने ये गायें मुझे प्रदान की है|’ यह सुनकर उस कृष्ण पुरुष ने नाभानेदिष्ठ से कहा है कि ‘हे ब्रहमावेता! तुम अपने पिता श्रीमनु से ही इसका समाधान पूछो कि यह भाग किसे मिलना चाहिए?’

इस समस्या के समाधान हेतु नाभानेदिष्ठ अपने पिता के पास आए और उनसे न्याय सम्मत निर्णय देने का निवेदन किया| इसके उत्तर में श्रीमनु ने कहा कि न्यायतः यज्ञ के शेष-भाग पर उस कृष्ण-पुरुष (रुद्र)- का ही अधिकार बनता है| इस न्याययुक्त समाधान को नाभानेदिष्ठ ने सहज रुप से स्वीकार किया और पुनः यज्ञ स्थल पर जाकर उस कृष्ण पुरुष से निवेदन किया कि इस यज्ञ-भाग पर आपका ही अधिकार बनता है| उनके इस सहज भाव एवं सत्यनिष्ठा को देखकर कृष्ण-फलस्वरुप रुद्रदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने वह समस्त गो-संपत्ति उन्हें आशीर्वाद के साथ प्रदान कर दी|

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