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कौन अच्छा कौन बुरा

प्राचीन काल में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) नगर में राजा विक्रमसेन का शासन था| इस प्रतापी राजा के पास ‘विदग्ध चूणामणि’ नाम का एक ऐसा तोता था, जिसे अपने दिव्य ज्ञान से समस्त शास्त्रों का ज्ञान था| वह विलक्षण लक्षणों से युक्त तोता बड़े ही सहज रूप में मनुष्यों की भाषा बोल और समझ लेता था| राजा उस तोते से बहुत प्यार करता था और उसे चूणामणि कहकर संबोधित करता था|

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वह तोता पूर्वजन्म में देवराज इन्द्र के दरबार का एक गंधर्व था, जिसे किसी अपराध के कारण देवराज द्वारा तोता बन जाने का शाप दिया गया था| तोता बन जाने के बाद उसकी दैवीय शक्तियां क्षीण नहीं हुई थीं, इसी कारण राजा विक्रमसेन उस तोते से परामर्श लेकर ही अपना मुख्य कार्य संपन्न किया करता था|

एक दिन राजा ने उस तोते से पूछा – “चूणामणि! तुम दिव्य ज्ञान के ज्ञाता हो| आज हमें यह परामर्श दो कि अपनी होने वाली पत्नी के रूप में हम राज्य की किस कन्या का चयन करें?”

तोते ने अपना दैवीय ज्ञान केंद्रित करके बताया – “राजन! मगध नरेश की कन्या चंद्रप्रभा आपकी पत्नी बनने के लिए हर प्रकार से योग्य है| मेरा परामर्श तो यही है कि आप पत्नी के रूप में उसी का चयन करें|”

तोते का परामर्श मानकर राजा विक्रमसेन ने मगध की राजकुमारी चंद्रप्रभा के साथ विवाह कर लिया, जो अपने साथ मायके से एक विलक्षण मैना लाई| उस मैना का नाम ‘सोमिका’ था| चूणामणि तोते की तरह वह मैना भी अनेक भाषाएं सहज ही बोल एवं समझ लेती थी|

राजा ने उन तोता और मैना को एक ही पिंजरे में रख दिया, ताकि वे आपस में बातचीत करके अपना एकाकीपन दूर कर सकें| इस प्रकार अपने-अपने स्वामियों की अपने बुद्धिबल से सेवा करते हुए तोता और मैना एक ही पिंजरे में टंगे रहते थे| एक दिन चूणामणि तोते ने मैना से कहा – “सुनो मैना! हम दोनों इकट्ठे रहते हैं, एक साथ दाना-पानी लेते हैं| कितना अच्छा हो, जो हम एकाकार भी हो जाएं! हम दोनों आपस में विवाह करके पति-पत्नी के रूप में शाप की अवधि का शेष जीवन व्यतीत करें|”

“नहीं तोते! मैं ऐसा नहीं कर सकती|” मैना बोली – “मुझे पुरुष वर्ग से नफरत है|”

“ऐसा समझने का कारण?”

“सभी पुरुष प्रकृति से दुष्ट एवं स्वभाव से कृतघ्न (अहसान फरामोश) होते हैं|” मैना ने कहा|

“तुम्हारा यह विचार बिल्कुल गलत है, मैना! मेरा विचार तो तुम्हारे विचार के बिल्कुल विपरीत है|” तोता बोला – “पुरुष दुष्ट नहीं होते| दुष्ट तो स्त्रियां होती हैं| दुष्ट होने के साथ-साथ वे क्रूर (निर्दयी) भी होती हैं|” इस बात पर दोनों में बहस छिड़ गई और नौबत बाजी लगाने तक पहुंच गई|

मैना कहने लगी – “व्यर्थ में बहस करने का कोई लाभ नहीं है, तोते! कल हम दोनों राजा के समक्ष अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत करेंगे| यदि तुम जीत गए तो मैं तुम्हारे साथ विवाह कर लूंगी और यदि तुम हार गए तो तुम्हें आजीवन मेरा दास बनकर रहना पड़ेगा|”

“मुझे स्वीकार है|” तोता बोला – “कल हम दोनों राजा के समक्ष अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत करेंगे| राजा जो भी निर्णय करे, उसे हम दोनों को स्वीकार करना पड़ेगा|”

इस बात पर मैना ने अपनी स्वीकृति दे दी|

अगले दिन दोनों ने राजा के समक्ष अपना-अपना दावा प्रस्तुत किया| दोनों पक्षों की बात सुनकर राजा ने सबसे पहले मैना से पूछा – “मैना! पहले तुम यह सिद्ध करो कि पुरुष किस प्रकार कृतघ्न होते हैं? तत्पश्चात मैं चूणामणि से इसके पक्ष के विषय में पूछूंगा|”

मैना बोली – “राजन! अपनी बात को सिद्ध करने के लिए मैं आपको एक कहानी सुनाती हूं| सुनकर आप स्वयं ही निर्णय कर लेना कि मेरा पक्ष गलत है अथवा सही|”

यह कहकर मैना ने राजा को यह कहानी सुनाई –

“बहुत पहले कामंदिका नाम की एक नगरी में अर्थदत्त नाम का एक धनी व्यक्ति रहता था| उस धनी व्यक्ति का धनदत्त नाम का एक पुत्र था, जो बुरी संगत में पकड़कर जुआरी बन गया और अपने पिता की मृत्यु के उपरांत अपनी सारी संपत्ति जुए में हार गया| जब उस नगर में उसकी ज्यादा दुर्गति होने लगी तो लाज के मारे वह नगर छोड़कर विदेश के लिए चल पड़ा| मार्ग में जाते हुए उसके मन में नाना प्रकार के विचार उठने लगे| उसे पश्चाताप होने लगा कि जुआ खेलने की अपनी बुरी आदत के कारण उसका सर्वस्व उससे छिन गया| ऐसा सोचते हुए वह पैदल ही सारी यात्रा करता रहा| जब वह भूख से बेहाल हो गया तो निकटवर्ती एक गांव में पहुंचा और गांव के एक व्यक्ति के पास पहुंचकर अपनी करुण कथा उसे सुनाकर रात को रुकने के लिए स्थान और भोजन की याचना की| ‘अतिथि देवो भव:’ अर्थात अतिथि भगवान का रूप होता है, ऐसा विचार कर उस ग्रामवासी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसे अपने घर में एक रात रुकने का स्थान दे दिया| रात को जब धनदत्त भोजन करके विश्राम करने के लिए अपने बिस्तर पर पहुंचा तो गृहस्वामी ने अपनी पत्नी से कहा – ‘इस युवक की करुण कथा सुनने से ऐसा लगता है कि यह दुर्भाग्य का शिकार हुआ है| यह पैदा तो संपन्न परिवार में हुआ, किंतु मां-बाप का लाडला पुत्र होने के कारण किशोरावस्था में गलत संगति में पड़कर बिगड़ गया| इसके व्यवहार को अभी भी सुधार जा सकता है|’

‘वह कैसे?’ उसकी पत्नी ने पूछा|

‘अगर हम अपनी बेटी रत्नावली का विवाह इसके साथ कर दें तो वह इसके व्यवहार में सुधार ला सकती है|’ गृहस्वामी ने कहा|

पत्नी बोली – ‘विचार तो उत्तम है स्वामी! यह युवक हमारी बेटी के योग्य भी है| हमें अपनी बेटी के लिए वर ढूंढ़ने का प्रयास भी नहीं करना पड़ेगा|’

गृहस्वामी ने इस विषय में अपनी पुत्री की भी सहमति मांगी तो उसने भी ‘हां’ कर दी| इस प्रकार धनदत्त का विवाह रत्नावली के साथ हो गया| वह ‘घर-जमाई’ बनकर अपनी ससुराल में रहने लगा|

कुछ वर्ष ठीक-ठाक गुजरे, किंतु फिर सुख और ऐश्वर्य मिलते ही धनदत्त की पुरानी आदतें पुन: उभर आईं| उसकी संगति फिर दुराचारी व्यक्तियों से हो गई और वह फिर से जुआ खेलने लगा|

एक दिन धनदत्त ने अपने ससुर से कहा – ‘अपना नगर छोड़े मुझे कई वर्ष बीत चुके हैं, पिताश्री! अगर आप आज्ञा दें तो मैं रत्नावली को साथ लेकर कुछ दिनों के लिए अपने नगर हो आऊं?’

‘धनदत्त! वहां अब तुम्हारा बचा ही क्या है? तुम्हारे माता-पिता तो कब के दिवंगत हो चुके हैं| बंधु-बांधव और तुम्हारे मित्रों ने तुम्हारे दुर्दिनों में तुमसे किनारा कर लिया था, अत: ऐसे स्वार्थी मित्रों से मिलने का कोई लाभ नहीं है| तुम यहीं रहो| मेरा इतना बड़ा व्यापार है, इस व्यापार को मन लगाकर करो| ऐश्वर्य के समस्त साधन तुम्हें यहीं उपलब्ध हो जाएंगे| अपने नगर में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है|’ धनदत्त के ससुर ने निर्णय दे दिया|

किंतु जब धनदत्त ने विविध प्रकार से उसकी मनुहार की तो उसके ससुर का हृदय द्रवित हो गया| उसने कहा – ‘ठीक है, तुम इतना आग्रह कर रहे हो तो जाओ कुछ दिनों के लिए अपने नगर हो आओ| मैं तुम्हारी यात्रा का प्रबंध कर दूंगा| एक बूढ़ी महिला को तुम्हारे साथ कर दूंगा, जो यात्रा में तुम दोनों का भली-भांति ध्यान रखेगी|’

फिर एक दिन धनदत्त अपनी पत्नी और उस बूढ़ी महिला के साथ अपने नगर को चल पड़ा| चलते-चलते जब वे एक जंगल में पहुंचे तो शाम हो गई| रात्रि-विश्राम के लिए वे एक ऐसे कुएं के पास ठहर गए जिसमें जल नहीं था| भोजनोपरांत जब वे सोने लगे तो धनदत्त के मन में पाप पैदा हो गया| रत्नावली अपने पिता के पास से बहुत-सा बहुमूल्य जेवर और धन लेकर आई थी, जिसे मार्ग में चोरों का भय दिखाकर धनदत्त ने अपनी पत्नी के शरीर से उतरवाकर एक बड़ी-सी पोटली बांधकर रख दिया था| रात को जब दोनों महिलाएं सो गईं तो एक-एक करके धनदत्त ने उन दोनों को उस जलविहीन कुएं में फेंक दिया और अपनी पत्नी का धन और जेवर लेकर वहां से भाग खड़ा हुआ|

कुएं में गिरते ही बुढ़िया तो तत्काल मर गई, किंतु कुएं में उत्पन्न झाड़-झंखाड़ों में उलझ जाने के कारण रत्नावली किसी प्रकार बच गई और सहायता के लिए चीख-पुकार मचाने लगी| जब उस निर्जन स्थान में कोई भी व्यक्ति उसकी सहायता के लिए न पहुंचा तो उसने स्वयं ही कुएं से बाहर निकलने के प्रयास शुरू कर दिए| उसके प्रयास सफल हुए| किसी प्रकार वह उस सूखे कुएं से बाहर निकल आई और फटे हाल चिथड़ों में अपने पिता के गांव का मार्ग लोगों से पूछती हुई अपने मायके पहुंच गई| घर पहुंचकर जब उसके माता-पिता ने उसकी दुर्दशा का कारण पूछा तो पति-परायण रत्नावली ने असली बात छिपाकर उनसे कहा – ‘पिताजी! मार्ग में हमें चोरों ने लूट लिया| आपने जिस वृद्धा को हमारे साथ भेजा था, उस वृद्धा की चोरों ने हत्या कर दी और मुझे कुएं में फेंक दिया|’

‘और तुम्हारा पति धनदत्त! उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया चोरों का?’ रत्नावली की माता ने पूछा|

‘बहुत प्रतिरोध किया था उन्होंने, किंतु चोरों की संख्या बहुत थी| उन्होंने उन्हें बहुत मारा और फिर उन्हें बांधकर अपने साथ ले गए| ईश्वर जाने अब वे कहां है और किस हाल में है!’

यह सब सुनकर रत्नावली के पिता ने उसे धीरज बंधाया और अपने कई विश्वस्त अनुचर धनदत्त की खोज में पाटलिपुत्र की ओर रवाना कर दिए|

उधर, पत्नी और उसके साथ की बूढ़ी स्त्री को कुएं में फेंककर धनदत्त निश्चिंत हो गया| उसने सोच लिया कि उन दोनों का बचना बिल्कुल असंभव है, अत: वह निर्भीक भाव से पाटलिपुत्र जा पहुंचा| वहां उसकी भेंट अपने पुराने जुआरी साथियों से हुई तो उन्होंने धनदत्त के पास धन देखकर उसे जुआ खेलने के लिए आमंत्रित कर दिया| धनदत्त जुआ खेलने बैठ गया, लेकिन दुर्भाग्य से इस बार भी वह अपना सब कुछ जुए में हार गया| तब वह मन में विचार करने लगा – ‘भाग्य ने जुए में इस बार भी मेरा साथ नहीं दिया| अब क्या करूं? क्या वापस अपनी ससुराल चलूं और अपने ससुर से धन लेकर पाटलिपुत्र लौटूं? उन्होंने यदि रत्नावली और उस बूढ़ी स्त्री के विषय में पूछा तो कोई ऐसी विश्वस्त-सी लगने वाली कहानी गढ़कर उन्हें सुना दूंगा, जिस पर उनको विश्वास आ जाए|’

ऐसा विचारकर वह अपनी ससुराल के लिए चल पड़ा| जब वह अपने ससुर के गांव में पहुंचा तो छत पर बैठी रत्नावली की नजर अकस्मात ही उसके ऊपर जा पड़ी| वह तत्काल नीचे उतरी और लगभग भागती हुई धनदत्त के निकट पहुंचकर कहने लगी – ‘मेरे स्वामी! तुम मुझे छोड़कर कहां चले गए थे| तुम नहीं जानते तुम्हारे जाने के पश्चात मुझ पर क्या-क्या गुजरी है|’

‘मेरे साथ भी कुछ अच्छा नहीं हुआ प्रिये|’ धनदत्त ने अभिनय करते हुए कहा – ‘तुम घर तो चलो| मैं वहीं बैठकर सारी बातें सिलसिलेवार बताऊंगा|’

मीठी-मीठी बातें बनाकर धनदत्त ने एक बार फिर अपनी पतिव्रता पत्नी का मन मोह लिया| सीधी-सादी रत्नावली एक बार फिर अपने दुराचारी पति की बातों में आ गई| उसने कहा – ‘अब जो हो गया, सो हो गया| बीती बातों पर खाक डालिए| अब आराम के साथ यहीं रहिए| मेरे माता-पिता के पास धन की कोई कमी नहीं है|’

कहावत है कि बुरी आदतें बहुत मुश्किल से व्यक्ति का पीछा छोड़ती हैं| धनदत्त को फिर से सुख के साधन मिलने लगे तो उसके कुसंस्कार फिर से उभर आए| जुए के अतिरिक्त अब वह मद्यपान भी करने लगा, साथ ही बुरे आचरण वाली स्त्रियों के साथ भी उसके संबंध बन गए| सास-ससुर को पता चला तो उन्होंने धनदत्त को समझाया – ‘पुत्र! पत्नी के होते हुए दुराचार की ओर आग्रसर होना ठीक नहीं होता| तुम हमारे जमाई हो| अपनी और हमारी इज्जत का विचार करके इस कुमार्ग को छोड़ दो|’

लेकिन सास-ससुर के समझाने का धनदत्त पर रंचमात्र भी असर न हुआ| उल्टे उनकी रोज-रोज की सीख से तंग आकर वह उनसे चिढ़ गया| एक रात उस पापी ने सोते समय में अपनी पत्नी, सास एवं ससुर की सामूहिक हत्या कर डाली और घर का सारा धन लेकर वहां से भाग गया|”

इतनी कहानी सुनाकर मैना ने कहा – “इसीलिए मेरा यह कहना है कि पुरुष स्वभावगत कपटी और कृतघ्न होते हैं, किंतु यह तोता मेरा बात को मानता ही नहीं है|” इतना कहकर मैना खामोश हो गई| तब राजा ने तोते द्वारा अपना पक्ष रखने के लिए कहा| वह तोते से बोला – “चूणामणि! मैना अपना पक्ष प्रस्तुत कर चुकी है| अपनी कहानी से उसने साबित कर दिया है कि पुरुष स्वभावत:दुष्ट होते हैं| अब तुम अपना पक्ष प्रस्तुत करो| तुम्हारा पक्ष सुनकर ही मैं निर्णय दूंगा कि मैना का पक्ष सही है या तुम्हारा?”

तोता बोला – “स्वामी! स्त्रियां भयानक दुस्साहस वाली और दुष्चरित्र होती हैं| इस विषय में यह कहानी सुनिए –

“हर्षवती नाम की एक नगर में अग्रदत्त नाम का एक करोड़पति वैश्य रहता था| उस वैश्य की वसुदत्ता नाम की एक पुत्री थी, जो उसकी एकमात्र संतान थी| वसुदत्ता बेहद सुंदर थी| उसके माता-पिता उसे अपने प्राणों से भी प्रिय समझते थे|
जब वसुदत्ता विवाह योग्य हो गई तो वणिक अग्रदत्त ने उसका विवाह ताम्रलिप्त नगर के एक युवक समुद्रदत्त के साथ कर दिया| समुद्रदत्त के पिता का भी बहुत बड़ा व्यापार था| व्यापार के सिलसिले में उसे प्राय: अपने पिता के साथ दूर-दूर की यात्राएं करनी पड़ती थीं, इसलिए उसे अपनी पत्नी से अक्सर दूर रहना पड़ता था| एक बार जब वसुदत्ता का पति समुद्रदत्त अपनी यात्रा के लिए जाने को तैयार हुआ तो उसकी पत्नी ने कहा – ‘आर्यपुत्र! आप अक्सर व्यापार के सिलसिले में बाहर रहते हैं| यहां अकेले मेरा मन नहीं लगता| अब से जब भी आप अपनी यात्रा पर जाएं तो मुझे मेरे पिता के यहां भिजवा दिया करें|’

‘प्रिये! तुम तो व्यर्थ ही चिंतित होती हो| यहां तुम्हारा ध्यान रखने के लिए मेरी माताजी तुम्हारे पास रहती है| अनेक सेवक, सेविकाएं हैं| वे सब तुम्हारा ध्यान रखेंगी| तुम्हें कोई कष्ट नहीं होने पाएगा|’

समुद्रदत्त पत्नी को आश्वासन देकर चला गया तो वसुदत्ता विचार करने लगी – ‘मेरा पति कितना नादान है, जो ये भी नहीं जानता कि पत्नी को सच्चा सुख तो उसके पति के सामीप्य में ही मिलता है| पति के बिना पत्नी के लिए धन-दौलत, ऐश्वर्य के साधन एवं नौकर-चाकरों के होने का भला अर्थ ही क्या है? मुझे इस समस्या का समाधान अपने प्रकार से ही करना होगा|’

तब फिर क्या था, समुद्रदत्त के जाते ही वसुदत्ता अपने पिता के घर पहुंच गई| पति के अभाव में उसने अपना प्रेमी खोज लिया| दोनों छिप-छिपकर मिलने लगे| ऐसी ही एक रात में जब वसुदत्ता छिपकर अपने प्रेमी से मिलने के लिए पहुंची तो उसने उसे मरा हुआ पाया|

हुआ यूं था कि जब उसका प्रेमी छुपकर राजसी बाग में प्रवेश कर रहा था तो महल के रक्षकों ने उसे देख लिया| उन्होंने उसे ललकारा तो वसुदत्ता के प्रेमी ने भागने की कोशिश की| इस पर एक प्रहरी ने उसकी ओर अपना भाला खींच मारा, जो वसुदत्ता के प्रेमी के दिल के आर-पार हो गया| वसुदत्ता का प्रेमी तत्काल नीचे जा गिरा और बुरी तरह तड़पने लगा| प्रहरी जब तक उसके पास पहुंचे, वह दम तोड़ चुका था|

अपने प्रेमी की लाश देखकर वसुदत्ता सन्न-सी रह गई| फिर वह यह तसल्ली करने के लिए कि क्या यह सचमुच ही मर गया है या फिर सिर्फ मुझे परेशान करने के लिए मृत होने का स्वांग रच रहा है, नीचे झुकी और उसकी नब्ज टटोलने लगी| युवक के मृत शरीर पर एक प्रेत ने अधिकार कर लिया था, जैसे ही वसुदत्ता नीचे झुकी, लाश पर कब्जा जमाए बैठे प्रेत ने ऊपर उठकर वसुदत्ता की नाक दांतों के बीच दबा ली| वसुदत्ता ने चौंककर सिर ऊंचा किया तो उसकी नाक कटकर मृत शरीर के मुंह में रह गई| नाक कटते ही वसुदत्ता बुरी तरह से चीख पड़ी – ‘हाय मैं मरी…हाय मेरी नाक… बिना नाक के अब मैं घर कैसे जाउंगी? कैसे अपने माता-पिता को अपना मुख दिखलाऊंगी? वे नाक कटने के विषय में पूछेंगे तो उन्हें क्या सफाई दूंगी?’ ऐसा कहकर रोते-चिल्लाते हुए वह अपने घर की ओर दौड़ पड़ी|

एक चोर, जो चोरी करने के उद्देश्य से एक पेड़ के पीछे छिपकर खड़ा था, उसने सारा दृश्य अपनी आंखों से घटित होते देखा| इस दृश्य को देखकर उसे भी बहुत आश्चर्य हुआ| वह सोचने लगा – ‘यह क्या माजरा है? एक अतीव सुंदरी आधी रात के समय अपने घर से निकलकर एक लाश के पास पहुंचती है, लाश उसकी नाक काटकर अपने मुंह में दबा लेती है| हे मेरे प्रभु! यह कैसा चमत्कार है?’

कटी नाक वाली वसुदत्ता जल्दी-जल्दी अपने पिता के घर पहुंची और बिना किसी को कुछ बताए चुपचाप जाकर बिस्तर पर गिर गई| उसी रात उसका पति समुद्रदत्त अकस्मात अपनी यात्रा से वापस लौट आया| वह अपने घर न जाकर सीधा अपनी ससुराल में पहुंचा, क्योंकि उसे पता लग चुका था कि उसकी पत्नी आजकल अपने मैके में ही है| घर के बाहर पहुंचकर समुद्रदत्त ने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा वसुदत्ता के पिता अग्रदत्त ने खोला| दामाद को पाकर पहले उन्होंने उसकी कुशल क्षेम पूछी, फिर बोले – ‘पुत्र! क्या बात है, आज बहुत देर गए यहां आगमन हुआ है?’

‘सीधा यात्रा से आ रहा हूं पिताजी!’ समुद्रदत्त बोला – ‘बहुत थक गया था, सोच चलकर आपके यहां विश्राम कर लूं|’

‘हां-हां, क्यों नहीं| वसुदत्ता आजकल यहीं है| तुम उसके कक्ष में जाकर विश्राम कर लो| बाकी बातें सुबह कर लेंगे|’

समुद्रदत्त अपनी पत्नी के कक्ष में चला गया| थका होने के कारण उस बेचारे ने अपनी पत्नी को जगाना उचित नहीं समझा, वह चुपचाप कक्ष में ही एक दूसरे बिस्तर पर पड़कर सो गया| कुछ देर बाद अचानक वसुदत्ता की नींद खुली| धीमे प्रकाश में दूसरे बिस्तर पर सोए अपने पति को देखा तो वह घबरा उठी – ‘अब इसे अपनी कटी हुई नाक के बारे में क्या उत्तर दूंगी? अगर इसे सच्ची बात पता चल गई तो क्रोध में आकर यह मेरी हत्या कर डालेगा|’ यह सोचकर वह बेहद आतंकित हो उठी|

कुछ देर बाद जब उसका चित्त स्थिर हुआ तो उसने मन में सोचा – ‘क्यों न नाक कटने का दोष अपने पति के ही सिर मढ़ दूं? किसी ने भी मुझे कटी नाक के साथ घर पर वापस लौटते नहीं देखा था, मेरा पति भी रात के न जाने किस प्रहर में चुपचाप यहां आकर सो गया है| मैं चीख-पुकार मचाकर यह कहूं कि मेरे पति ने मेरी नाक काट ली है तो सभी लोग मेरी बात पर विश्वास कर लेंगे|’

ऐसा विचार कर वसुदत्ता जोर-जोर से चीखने लगी – ‘बचाओ-बचाओ, मेरे पति ने मेरी नाक काट ली|’

शोर सुनकर वसुदत्ता के माता-पिता उसके कमरे में दौड़े चले आए| आवाज सुनकर सोया हुआ समुद्रदत्त भी चौंककर उठ बैठा| पिता ने जब अपनी पुत्री की कटी हुई नाक देखी तो घबराकर पूछा – ‘ये क्या हुआ वसुदत्ता? किसने तुम्हारी नाक काट ली? तुम्हारा तो सारा चेहरा खून से रंगा हुआ है!’

रोते हुए वसुदत्ता ने तब समुद्रदत्त की ओर संकेत करके अपने पिता से कहा – ‘पिताजी! रात्रि के न जाने किस प्रहर में ये कक्ष में पहुंचे और आते ही मुझसे झगड़ा करने लगे| पहले इन्होंने मुझे बहुत मारा-पीटा| इस पर भी जब मैं शांत रही तो इन्होंने क्रोध में आकर मेरी नाक काट दी|’

‘नहीं-नहीं, मैंने कुछ नहीं किया है|’ समुद्रदत्त ने प्रतिवाद किया – ‘मैं तो थकान की वजह से आते ही सो गया था|’

अपने बेटी की ऐसी दुर्दशा देखकर अग्रदत्त भभक उठा| वह बोला – ‘तुम झूठ बोल रहे हो| अपनी करनी का फल तुम्हें भोगना ही पड़ेगा| मैं अभी तुम्हें नगर रक्षकों के हवाले करता हूं|’

समुद्रदत्त ने अनेक प्रकार से समझाने की कोशिश की, लेकिन उसकी एक न सुनी हुई| उसे नगर रक्षकों के हवाले कर दिया गया| नगर रक्षकों ने समुद्रदत्त को कारावास में डाल दिया|

अगले दिन उसे राजदरबार में प्रस्तुत किया गया| नगर कोतवाल ने राजा को उसका अपराध बताया – ‘महाराज! यह एक भयंकर अपराधी है| इसने न सिर्फ अपनी पत्नी को बुरी तरह से मारा-पीटा, अपितु बेचारी की नाक ही काटकर उसे नकटी बना दिया है| इसे कठोरतम दंड दिया जाना चाहिए|’

समुद्रदत्त ने बहुत प्रतिवाद किया, किंतु उसके पक्ष का समर्थन किसी ने नहीं किया| अग्रदत्त नगर का एक संभ्रांत व्यक्ति था, इसलिए उसकी बात मानकर राजा ने समुद्रदत्त को फांसी की सजा सुना दी|

दूसरे दिन जब वधिक उसे बांधकर नगर में घुमाते हुए वधस्थल की ओर ले जा रहे थे तो अनेक लोगों ने उसे देखा| उन लोगों में वह चोर भी था, जिसने उस रात सारी घटना अपने सामने घटित होते हुए देखी थी| इस अन्याय को देखकर उसके मन में समुद्रदत्त के प्रति दया उमड़ आई| वह सोचने लगा – ‘अब मुझे राजा के समक्ष सारी बातें सच-सच बता देनी चाहिए, अन्यथा यह निर्दोष व्यक्ति फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा|’ ऐसा विचार कर चोर ने राजा के समक्ष सारी घटना सच-सच रूप में दोहरा दी| राजा ने जब उस चोर से अपनी बात का साक्ष्य मांगा तो चोर ने कहा – ‘अन्नदाता! मैंने जो कुछ बताया है, वह शत-प्रतिशत सत्य है| आप नगर रक्षक को घटनास्थल पर भेजकर मेरी बात की पुष्टि कर सकते हैं| इस स्त्री की कटी हुई नाक अभी भी मृत व्यक्ति के मुंह में दबी हुई मिलेगी|’ चोर ने आगे राजा से कहा कि यदि उसकी बात असत्य निकले तो इसे व्यक्ति के स्थान पर बेशक उसे फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाए|

यह सुनकर राजा ने अपना एक विश्वस्त अनुचर बुलाया और उस चोर के साथ घटनास्थल पर भेजा, ताकि वह वापस लौटकर सच्चाई राजा को बता सके| अनुचर जब चोर के साथ बाग में पहुंचा तो लाश उस समय भी यथास्थिति में थी| राजा के कर्मचारियों की लापरवाही के कारण मृतक के शव को वहां से हटाया नहीं गया था| हत्प्राण के मुंह में अभी भी वसुदत्ता की कटी हुई नाक दभी हुई थी| यह सब देखकर राजा के अनुचर ने वापस लौटकर राजा को सारी बात बता दी| राजा ने जब लाश बाग से उठवाकर मंगवाई तो सारा माजरा दिन की तरह स्पष्ट हो गया| राजा ने आदेश देकर समुददत्त ओके फांसी के फंदे पर न चढ़वाकर उसकी रिहाई का आदेश दे दिया| रिहा होते ही समुद्रदत्त उसी दिन उस नगर से कूच कर गया| उसने पीछे मुड़कर भी न देखा|”

राजा विक्रमसेन को यह कहानी सुनाकर तोते से उससे कहा – “आपने सुन लिया न महाराज! यह नारी जाति किस प्रकार की कृतघ्न और हृदयहीन होती है| भला हो उस चोर का, जिसने फांसी पर झूलने वाले समुद्रदत्त को ठीक मौके पर पहुंचकर राजा को वास्तविकता बताकर बचा लिया, अन्यथा वसुदत्ता और उसके पिता ने तो उसे मृत्यु के गाल में पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, इसीलिए मैं कहता हूं कि कृतघ्न तो स्त्रियां होती हैं, न कि पुरुष| जैसा कि सोमिका मैना कह रही है|”

तोता और मैना दोनों की दलीलें सुनकर भी राजा विक्रमसेन कोई निर्णय न दे सका, क्योंकि कथा की समाप्ति पर तोता और मैना दोनों ही शाप मुक्त हो गए और दोनों अपने पूर्व रूप में आ गए|

तोता चित्ररथ नाम का गंधर्व बनकर आकाश में उड़ गया और शाप के कारण मैना बनी तिलोत्तमा नामक अप्सरा अपने असली स्वरूप में आकर देवराज इन्द्र के दरबार में चली गई|

पाठकों! राजा विक्रमसेन तो कोई निर्णय न दे सका, किंतु यदि हमसे यह प्रश्न किया जाता तो हम यही कहते कि न तो स्त्रियां निंदित होती हैं – और न ही पुरुष| मनुष्य को निंदित अथवा पूजा योग्य उसके कर्म ही बनाते हैं| सभी पुरुष देवता स्वरूप नहीं होते और न सभी स्त्रियां सती होती हैं, फिर भी अक्सर स्त्रियां ही निंदा का पात्र बनती हैं| हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है, अत: यहां अपकर्म करते हुए भी पुरुष कम ही निंदित होते हैं|

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