कपटी न्यायाधीश

  • font size
  • 555 Views



एक बहुत बड़े और घने पीपल के तले एक तीतर ने अपना घोंसला बनाया| उस पीपल के इर्द-गिर्द और भी अनेक छोटे-बड़े पशु-पक्षी रहते थे| उन सभी से तीतर की अच्छी मित्रता थी|

"कपटी न्यायाधीश" सुनने के लिए Play Button क्लिक करें | Listen Audio

एक दिन वह तीतर अपने घोंसले से खाने की तलाश में निकल पड़ा| बहुत दूर जाने के बाद वह मक्का के एक खेत में जा पहुंचा| मक्का की फसल पक चुकी थी| यह तीतर का मनभाता भोजन था| 

अपनी आप बीती, आध्यात्मिक या शिक्षाप्रद कहानी को अपने नाम के साथ इस पोर्टल में सम्मलित करने हेतु हमें ई-मेल करें । (Email your story with your name, city, state & country to: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. ) Submit your story to publish in this portal

दानों की भारमार देखकर तीतर उसी खेत में रुक गया और जी भरकर मक्का खाता रहा| वहां उसने दूसरी बहुत-सी चिडियों से मित्रता कर ली और उनके साथ अपना समय मजे से बिताने लगा| उस दिन वह घर वापस नही आया| दूसरे दिन भी नहीं लौटा| इस तरह वह कई दिन तक उसी खेत में रुका रहा| 

जिन दिनों तीतर बाहर था उस समय कहीं से खरगोश उस पीपल के नीचे आ पहुंचा| उसके रहने का कोई ठिकाना नहीं था| जब उसने तीतर का खाली घोंसला देखा तो उसी में रहने लगा|

कुछ दिन बिताने के बाद जब तीतर लौटा तो अपने घर में एक खरगोश को रहते देखा| वह बड़ा नाराज हुआ| उसने खरगोश से पूछा, "तुम यहां क्या कर रहे हो? यह तो मेरा घर है|"

खरगोश ने कहा, "तुम्हारा जब था तब था| अब तो यह मेरा घर है| मै यहां एक-दो दिन से नही कई दिनों से रह रहा हूं|"

तीतर ने कहा, "लेकिन तुम यहां कैसे रह सकते हो? यह घोंसला मैंने खुद अपने लिए बनाया है| मै हमेशा से इसी घर में रहा हूं| अगर विश्वास न हो तो किसी भी पड़ोसी से पूछ लो|"

खरगोश ने कहा, "मै क्यों पूछूं? मै जब आया था तब यह बिलकुल खाली पड़ा था| तभी से मै इसमें रहने लगा| जिस घर में जो रहता है वह उसी का हो जाता है| अब तो यह घर मेरा है|"

तीतर बिगड़कर बोला, "यह सब झूठ है| मै कई दिनों के लिए बाहर चला गया था| अब मै वापस आ गया  हूं| मेरा घोसला अभी खाली करो और यहां से निकल जाओ|"

खरगोश ने कहा, "यह तो नहीं हो सकता| यह मेरा मकान है और मै इसी में रहूंगा|"

इस तरह तीतर और खरगोश लड़ने लगे| उनकी तू-तू मैं-मैं सुनकर अन्य कई पशु-पक्षी जमा हो गये| उन्होंने तीतर की बात सुनी और खरगोश की भी| मगर कोई भी यह तय नही कर सका की घर किसका होना चाहिए| तब उन्होंने सुझाया कि यह मामला कानून से तय होना चाहिए|

इस पर तीतर और खरगोश ने अपना मामला किसी न्यायाधीश के सामने रखने का निश्चय किया|

मगर ऐसे झगड़े तय करने के लिए किसी योग्य न्यायाधीश की जरुरत थी जो आसानी स मिलना कठिन था| इस खोज में वे दोनों घंटो तक इधर-उधर भटकते रहे|

अंत में वे गंगा तट पर पहुंचे| नदी किनारे कुछ दूरी पर एक बिलौटा दिखाई दिया| उस बिलौटे को देखते ही वे दोनों डर गये| उन्हें जान का खतरा था|

बिलौटा बड़ा ही धूर्त था| खरगोश और तीतर को इस ओर आते देख उसने चट से आँखे मूंद लीं| हाथ में माला ले ली और पिछले पैरों पर खड़े होकर राम नाम का जाप शुरू कर दिया|

तीतर और खरगोश ने बिलौटे का पूजा-पाठ देखा तो चक्कर में पड़ गये| ऐसा अच्छा बिलौटा उन्होंने पहली बार ही देखा था| उन्होंने मन ही मन सोचा, 'यह कितना अच्छा है जो भगवान का नाम जप रहा है|'

खरगोश ने कहा, "मेरी समझ में इसी बिलौटे को पंच बनाना चाहिए|"

तीतर ने कहा, "मै भी यही सोच रहा हूं| लेकिन हमें जरा संभलकर रहना होगा| यह हमारा जन्मजात  दुश्मन भी है तो|

बिलौटे का पूजा-पाठ खत्म होने तक दोनों चुपचाप खड़े रहे| पूजा खत्मकर बिलौटे ने धीरे से आंखे खोलीं और उन दोनों की ओर देखा|

तीतर ने बिलौटे से कहा, "श्रीमानजी, मेरे और इस खरगोश के बीच एक छोटा-सा झगड़ा उठ खड़ा हुआ है| मगर मामला कानूनी है| आप कृपाकर इस झगड़े का निपटारा कर दीजिये| हम में से जो भी गलती पर होगा उसे आप सजा दे सकते हैं|"

बिलौटे ने कहा, "राम-राम! कैसी बाते करते हो भाई? भगवान का नाम लो| ऐसी बातें न बोलो| मैं तो दूसरों को दुःख देख भी नहीं सकता हूं और तुम कहते हो 'हम में से एक को सजा दे देना|' हरे कृष्ण, हरे राम| जो दूसरों को दुःख देता है वह भगवान के कोप का भाजन बनता है| जाने दो इन बातों को| अपने झगड़े का किस्सा कह डालो| मैं बता दूंगा की गलती किसकी है|"

तीतर ने कहा, "किस्सा यों है कि मैं कुछ दिन बाहर रहने के बाद जब घर वापस लौटा तो देखता क्या हूं कि इस खरगोश ने मेरे घोंसले पर कब्जा कर लिया है|"

खरगोश ने चिल्लाकर कहा, "तुम्हारा घर कैसा? वह घर तो मेरा है|"

बिलौटे ने नरमी से कहा, "शान्ति, शान्ति! मुझे पूरा किस्सा तो सुन लेने दो|

पहले तो तीतर ने अपनी बात कही| फिर खरगोश ने अपनी|

दोनों की बाते सुनकर बिलौटा कुछ देर मौन रहा, फिर कहने लगा, "क्या बताऊं भाई, मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूं| मुझे न तो ठीक से दिखाई देता है और न सुनाई देता है| मै तुम्हारा मामला पूरी तरह से समझ ही नहीं सका हूं| तुम दोनों जरा नजदीक आकर बात करो तो अच्छी तरह से समझ आये|"

अब तक खरगोश और तीतर दोनों ही बिलौटे का डर भूल गये थे| उन्हें बिलौटे पर पूरा-पूरा विश्वास हो गया था| वे दोनों नजदीक खिसक आये|

तभी बिलौटे उन पर तेजी से झपटा और एक ही झपट्टे में दोनों का काम तमाम कर दिया| बिलौटा चटपट खरगोश और तीतर को चट कर गया| 

शेर और खरगोश किरात से युद्ध न माया मिली न राम अन्याय और बदला

Please write your thoughts or suggestions in comment box given below. This will help us to make this portal better.

SpiritualWorld.co.in, Administrator
अपनी आप बीती, आध्यात्मिक या शिक्षाप्रद कहानी को अपने नाम के साथ इस पोर्टल में सम्मलित करने हेतु हमें ई-मेल करें । (Email your story with your name, city, state & country to: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. ) Submit your story to publish in this portal

 

नम्रता का पाठ

एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन नगर की स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले। रास्ते में एक जगह भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। वह कुछ देर के लिए वहीं रुक गए और वहां चल रहे कार्य को गौर से देखने लगे। कुछ देर में उन्होंने देखा कि कई मजदूर एक बड़ा-सा पत्थर उठा कर इमारत पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। किंतु पत्थर बहुत ही भारी था, इसलिए वह more...

व्यर्थ की लड़ाई

एक आदमी के पास बहुत जायदाद थी| उसके कारण रोज कोई-न-कोई झगड़ा होता रहता था| बेचारा वकीलों और अदालत के चक्कर के मारे परेशान था| उसकी स्त्री अक्सर बीमार रहती थी| वह दवाइयां खा-खाकर जीती थी और डॉक्टरों के मारे उसकी नाक में दम था| एक दिन पति-पत्नी में झगड़ा हो गया| पति ने कहा - "मैं लड़के को वकील बनाऊंगा, जिससे वह मुझे सहारा दे सके|" more...

धर्म और दुकानदारी

एक दिन एक पण्डितजी कथा सुना रहे थे| बड़ी भीड़ इकट्ठी थी| मर्द, औरतें, बच्चे सब ध्यान से पण्डितजी की बातें सुन रहे थे| पण्डितजी ने कहा - "इस दुनिया में जितने प्राणी हैं, सबमें आत्मा है, सारे जीव एक-समान हैं| भीड़ में एक लड़का और उसका बाप बैठा था| पण्डितजी की बात लड़के को बहुत पसंद आई और उसने उसे गांठ बांध ली| अगले दिन लड़का दुकान पर गया| थोड़ी देर में एक more...
 

समझदारी की बात

एक सेठ था| उसने एक नौकर रखा| रख तो लिया, पर उसे उसकी ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ| उसने उसकी परीक्षा लेनी चाही| अगले दिन सेठ ने कमरे के फर्श पर एक रुपया डाल दिया| सफाई करते समय नौकर ने देखा| उसने रुपया उठाया और उसी समय सेठ के हवाले कर दिया| दूसरे दिन वह देखता है कि फर्श पर पांच रुपए का नोट पड़ा है| उसके मन में थोड़ा शक पैदा हुआ| more...

आध्यात्मिक जगत - World of Spiritual & Divine Thoughts.

Disclaimer

 

इस वेबसाइट का उद्देश्य जन साधारण तक अपना संदेश पहुँचाना है| ताकि एक धर्म का व्यक्ति दूसरे धर्म के बारे में जानकारी ले सके| इस वेबसाइट को बनाने के लिए विभिन्न पत्रिकाओं, पुस्तकों व अखबारों से सामग्री एकत्रित की गई है| इसमें किसी भी प्रकार की आलोचना व कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया|
Special Thanks to Dr. Rajni Hans, Ms. Karuna Miglani, Ms. Anisha Arora, Mr. Ashish Hans, Ms. Mini Chhabra & Ms. Ginny Chhabra for their contribution in development of this spiritual website. Audio & Video Production: VISIONHUNT (info@visionhunt.in) | Privacy Policy | Media Partner | Wedding Marketplace

Vulnerability Scanner

Connect With Us