जगन्नाथधाम

जगन्नाथधाम

पुरुषोत्तम क्षेत्र (जगन्नाथधाम)-का महत्व वर्णनातीत है| यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम नाम से विख्यात है| अतः इस क्षेत्र को पुरुषोत्तम क्षेत्र भी कहते हैं| इस क्षेत्र का नाम लेने मात्र से मनुष्य मुक्त हो जाता है|

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बहुत पहले स्वयं भगवान् ने इस क्षेत्र में नीलमणि की प्रतिमा बनाकर स्थापित की थी| उस मुर्तिका इतना प्रभाव था कि उसके दर्शन मात्र से लोग मुक्त हो जाते थे| कारण विशेष से उस प्रतिमा का दर्शन दुर्लभ हो गया|

दूसरे सत्ययुग में राजा इन्द्रद्युम्न ने पुनः उस प्रतिमा को स्थापित करने का प्रयास किया| राजा इन्द्रद्युम्न की राजधानी अवन्ती (उज्जैन) थी| वे परमधार्मिक, शूरवीर और समस्त गुणों के आकर थे| वे प्रयत्नपूर्वक गुरुजनों की सेवा और सत्संग किया करते थे| इसी का परिणाम निकला कि उनके मन में इन्द्रियों को रोककर मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा जागृत हुई| इसके लिये उन्होंने तीर्थ-सेवन आवश्यक समझा| शीघ्र ही वे किसी तीर्थ के लिये उज्जैन से निकल पड़े| प्रजा उनसे पिता का प्यार पाती थी, अतः सारी प्रजा उनके साथ हो गयी| धीरे-धीरे वे दक्षिण समुद्र (बंगाल की खाड़ी)-तट पर आ गये|

एक ओर समुद्र लहरा रहा था, दूसरी ओर उसी तट पर एक विशाल वट-वृक्ष भी शोभा पा रहा था| राजा इन्द्रद्युम्न ने अनुमान से समझ लिया कि मैं पुरुषोत्तम तीर्थ में आ पहुँचा हूँ| उन्होंने इन्द्रनील-प्रतिमा की खोज की, पर वह न मिली| इससे उनके मन में आया कि यह क्षेत्र भगवान् की प्रतिमा के बिना शून्य है, अतः मैं तपस्या के द्वारा भगवान् को प्रसन्न कर उनका दर्शन प्राप्त करूँ और उनकी आज्ञा से मूर्ति की भी स्थापना करूँ| ऐसा सोचकर उन्होंने चारों दिशाओं के राजाओं को आमंत्रित किया| उस राजसभा में सर्वसम्म्पति  से यह प्रस्ताव पारित हुआ कि राजा इन्द्रद्युम्न एक साथ दो कार्य करें| एक ओर ये अश्वमेधयज्ञ का अनुष्ठान करें और दूसरी ओर भगवान् के मन्दिर का निर्माण भी प्रारम्भ करें|

राजा इन्द्रद्युम्न की तत्परता से समय पर दोनों कार्य सम्पन्न हो गये| मन्दिर बहुत ही आकर्षक बना था, किंतु यह तय नहीं हो पाता था कि पत्थर, मिट्टी, लकड़ी में से किसके द्वारा भगवान् जगन्नाथ जी की प्रतिमा बनायी जाय| इस समस्या के समाधान के लिये राजा ने पुनः भगवान् की शरण ली| भक्तवत्सल भगवान् ने स्वप्न में राजा से कहा-‘राजन! तुम्हारे यज्ञ और भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूँ, अब तुम चिन्ता छोड़ दो| इस तीर्थ में जो विश्वप्रसिद्ध प्रतिमा है, उसको प्राप्ति का उपाय बता रहा हूँ| कल सूर्योदय होने पर तुम प्रतिमा लाने के लिये अकेले ही समुद्र तट पर जाना वहाँ एक विशाल वृक्ष दिख पड़ेगा, जिसका कुछ भाग जल में और कुछ भाग स्थल पर है| कुल्हाड़ी से उसे काटना| काटने पर वहाँ एक अद्भुत घटना घटेगी और उसी से प्रतिमा का निर्माण होगा|’

राजा इन्द्रद्युम्न स्वप्न के आदेश से अकेले ही समुद्र-तट पर गये| वहाँ लाहलहता हुआ वह वृक्ष दिख पड़ा| उन्होंने स्वप्नादेश के अनुसार उसे काट गिराया| इसी समय भगवान् विष्णु और विश्वकर्मा ब्राह्मण के वेष में वहाँ आ पहुँचे| भगवान् विष्णु ने उनसे कहा-‘आइये हम दोनों वृक्ष की छाया में बैठ जायँ| मेरे ये साथी चतुर शिल्पी हैं| मेरे निर्देश के अनुसार ये उत्तम प्रतिमा बना देंगे|’

विश्वकर्मा ने एक ही क्षण में कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की प्रतिमा बना दी| यह चमत्कार देखकर राजा को बहुत आश्चर्य हुआ| उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की-‘भगवन्! आप दोनों के व्यवहार मनुष्य-जैसे नहीं हैं| मैं आपका यथार्थ परिचय पाना चाहता हूँ|’

भगवान् बोले-‘मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ| वर माँगो|’ भगवान् का दर्शन कर और उनके मधुर वचन सुनकर राजा को हर्षातिरेक से रोमांच हो आया| उन्होंने गद्गद वाणी से उनकी स्तुति करते हुए कहा-‘प्रभो! मैं चाहता हूँ  कि आपके दुर्लभ पड़ को प्राप्त करूँ|’ भगवान् ने कहा-‘मेरी आज्ञा से अभी तुम दस हजार नौ सौ वर्षों तक राज्य करो| उसके बाद तुम्हें मेरे उस पद की प्राप्ति होगी, जिसे प्राप्त करने के बाद सब कुछ प्राप्त हो जाता है| जब तक सूर्य और चन्द्र रहेंगे, तब तक तुम्हारी अक्षय कीर्ति फैली रहेगी| तुम्हारे यज्ञ से प्रकट होने वाला तालाब इन्द्रद्युम्न नाम से प्रख्यात तीर्थ होगा| इस सरोवर में एक बार भी स्नान कर मनुष्य इन्द्रलोक को प्राप्त करेगा| जो इसके तट पर पिण्डदान करेगा, वह इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार कर स्वयं इन्द्रलोक चला जायगा|’

राजा को वरदान देकर विश्वकर्मा के साथ भगवान् अन्तर्हित हो गये| राजा बहुत देरतक आनन्द में मग्न होकर वहीं ठहरे रहे| चेत आने पर वे विमानकार रथों में तीनों मूर्तियाँ बैठाकर बाजे-गाजे के साथ ले आये और शुभ मुहूर्त में  उन्होंने उनकी प्रतिष्ठा करवायी| इस प्रकार राजा इन्द्रद्युम्न के सत्प्रयास से जगन्नाथ जी का दर्शन सर्वसुलभ हो गया|

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