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बुरे का फल

बुरे का फल

एक क्रूर राजा अपनी प्रजा पर बहुत अत्याचार करता था| इसीलिए प्रजा हमेशा उसका अहित चाहती थी| प्रजा को लगता है कि राजा या तो मर जाये या फिर उससे उसका राज्य छिन जाये|

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वह किसी भी हाल में राजा से मुक्ति पाना चाहती थी| लेकिन एक दिन अचानक लोगों ने देखा कि राजा में परिवर्तन आ गया| अब वह राजा प्रजा के हित की बातें सोचने लगा| उसमें आया परिवर्तन मंत्रियों और प्रजा ने भी अनुभव किया| आखिर एक बुजुर्ग मंत्री ने साहस बटोरकर राजा से इस परिवर्तन की वजह पूछी|

राजा ने बताया, एक बार मैं जब जंगल में गया था तो मैंने देखा कि एक लोमड़ी खरगोश को खा गयी| थोड़ी दूर जाने के बाद मैंने देखा कि लोमड़ी पर एक कुत्ते ने हमला किया और उसके पैर में काट खाया| कुत्ता जब गाँव में लौटा तो वह एक आदमी पर भौंका| उस आदमी ने पत्थर उठाकर कुत्ते को मारा| कुत्ते का पैर जख्मी हुआ| आदमी आगे चला तो रास्ते में खड़े एक घोड़े ने उस पर दुलती झाड़ी| वह जमीन पर गिर गया, उसकी दोनों टाँगें बेकार हो गयीं| वह जमीन वह जीवन भर के लिए अपाहिज हो गया| घोड़ा जब दौड़ने लगा, तो एक खड्डे में जा गिरा और उसकी टांग भी टूट गयी| यह सब देखकर मेरे मन में ख्याल आया कि बुरा काम करो तो उसका फल बुरा ही मिलता है| मैंने अब तक सिर्फ बुरा किया, अब पता चलने के बाद भी अगर मैं बुरा बर्ताव ही करता रहूँ, तो मुझे उसका फल भी बुरा ही मिलेगा| इस खयाल ने मेरी जिंदगी बदल दी और मैंने फैसला किया कि अब से मैं किसी पर कोई अत्याचार नहीं करूँगा| अपनी प्रजा की मैं पूरी देखभाल करूँगा|

शिक्षा- मनुष्य को किसी का बुरा नहीं करना चाहिये क्योंकि बुरे का फल बुरा होता है|

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