बेचारा कुंवर

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एक बार एक गांव में एक किसान रहता था, परिवार अत्यंत गरीब था और उनकी रोटी की गुजर-बसर मुश्किल से ही हो पाती थी | किसान के विवाह को आठ वर्ष हो चुके थे | परंतु उनके कोई संतान न थी | किसान और उसकी पत्नी को गरीबी का इतना दुख न था, जितना संतान न होने का |

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दोनों भगवान से प्रार्थना करते कि ईश्वर उन्हें एक संतान अवश्य दे, चाहे वह लड़का हो या लड़की | परंतु काफी वर्ष व्यतीत हो गए और उनके संतान न हुई | 

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इसी बीच किसान के पड़ोस में एक नव विवाहित जोड़ा रहने आया | वे बहुत खुश रहते थे | एक वर्ष पश्चात् ही उनके घर में पुत्र ने जन्म लिया तो किसान और उनकी पत्नी भी उनके घर बधाई देने पहुंचे | दोनों परिवारों में खूब मित्रता हो गई थी, इस कारण किसान व पत्नी की खूब आवभगत हुई |

घर आकर रात्रि को किसान ने गणेशजी की पूजा की और प्रार्थना की कि उसे संतान प्राप्त हो | ईश्वर ने किसान की प्रार्थना सुन ली | किसान अपने पड़ोसी के पुत्र को अपने बच्चे के समान प्यार करता था, कुछ ही समय बाद उसके घर में भी बालक ने जन्म लिया |

किसान ने अपने बेटे का नाम कुवंर रखा क्योंकि उसके घर के लिए वह राजकुमार से कम न था | किसान व पत्नी अपने पुत्र को बहुत अधिक लाड़ करते थे | धीरे-धीरे कुंवर बड़ा हो रहा था | वे उसकी हर इच्छा पूरी करते थे | इस कारण वह जिद्दी होता जा रहा था | वह अपनी मर्जी से खेलता था, अपनी मर्जी से खाता था | मां-बाप स्वयं परेशानी सहकर भी उसको अच्छे से अच्छा भोजन खिलाते थे |

कुंवर बेहिसाब खाने के कारण मोटा होता जा रहा था | बच्चे उसे पेटू कर कहकर बुलाने लगे थे | एक दिन कुंवर एक बगीचे से बहुत सारे आम तोड़ आया | मां के मना करने पर भी उसने सारे आम खा लिए | उसी रात उसके पेट में दर्द होने लगा | रात्रि में उसे दस्त होने लगे | कुंवर की मां परेशान थी कि वह क्या करे ताकि कुंवर ठीक हो जाए | कुंवर का पिता किसी जरूरी काम से दो दिन के लिए पास के गांव गया था |

सुबह होते ही मां ने कुंवर से कहा - "पास के गांव में मूढ़ामल वैद्य जी रहते हैं | उनकी एक पुड़िया से ही फायदा हो जाता है, तू जल्दी से उनके पास चला जा | सारी परेशानी बता कर जो वह बताएं वह ध्यान से सुनकर आना | तेरे पिता जी होते तो उन्हें साथ भेज देती |"

कुंवर पेट दर्द व दस्तों के कारण बेहाल हुआ जा रहा था | वह गांव की सड़क पर तेजी से चलते हुए पास के गांव में वैद्य मूढ़ामल के पास पहुंच गया | वैद्य जी कुंवर के पिता के परिचित थे, अत: उन्होंने दवाई तैयार करके कुंवर को एक पुड़िया दवा खिला दी | कुंवर को पेट दर्द व दस्तों से आराम महसूस हुआ | वैद्य जी ने घर के बाहर पड़ी चारपाई पर कुछ देर उसे आराम करने को कहा |

कुछ देर में कुंवर ने कहा - "वैद्य जी, मैं घर जाना चाहता हूं | आप यह बता दें कि मैं भोजन में क्या खाऊं ? ताकि जल्दी ठीक हो जाऊं |"

वैद्य जी ने कहा - "बेटा कुंवर दो दिन तक खिचड़ी के सिवा कुछ नहीं खाना है | कल को फिर आकर दवाई खा जाना | मैं तुम्हारे लिए दवाई तैयार करके रखूंगा |"

कुंवर ने खिचड़ी शब्द सुना न था, अत: फिर बोला - "क्या नाम बताया आपने, खचड़ी ?"

वैद्य जी ने कहा - "तुम बस मां को जाकर बता देना कि वैद्य जी ने खिचड़ी बताई है, मां खुद बना कर खिला देगी |"

कुंवर ने पुन: पूछा - "खिचड़ी ?" वैद्य जी बोले - "हां बाबा खिचड़ी, खिचड़ी |" कुंवर को खिचड़ी शब्द थोड़ा मुश्किल लग रहा था | अत: वह रटते-रटते चल दिया | वह धीरे-धीरे घर की ओर जा रहा था और मुंह से बोल रहा था - "खिचड़ी-खिचड़ी |"
वह कब खिचड़ी कहते-कहते खचड़ी कहने लगा, उसे पता ही नहीं लगा | कुछ ही देर में वह खचड़ी को खाचिड़ी बोलने लगा | वह खाचिड़ी रटते हुए एक खेत के पास से गुजर रहा था कि खेत में काम करने वाले किसान ने उसे आवाज दी - "ऐ छोकरे, इधर आ, क्या बोल रहा है ?" 

कुंवर ने मासूमियत से जवाब दिया - "खाचिड़ी, खाचिड़ी |"

किसान गुस्से में भर कर बोला - "मैं खेत में बीज बो रहा हूं और तू बोल रहा है खा चिड़ी, खा चिड़ी | अगर चिड़िया मेरा बीज खा गई तो पौधे कहां से निकलेंगे | अगर तुझे कुछ कहना है तो बोल उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी और यहां से भाग |"

कुंवर ने दुनिया देखी न थी | पहली बार घर से निकला था | अत: घबराकर रटने लगा 'उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी' | वह इसी प्रकार रटता हुआ घर की ओर चल दिया | कुछ कदम ही दूर गया था कि उसने देखा, एक बहेलिया जाल फैलाए बैठा है और पक्षियों के फंसने का इंतजार कर रहा है | बहेलिए ने कुंवर को 'उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी' रटते देखा तो क्रोध में चिल्लाया - "ऐ लड़के, इतना मारूंगा कि सब कुछ भूल जाएगा, उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी क्या बोल रहा है ? क्या तू चाहता है कि सारी चिड़ीयां तेरी बात सुनकर उड़ जाएं और मेरे जाल में एक भी न फंसे |"

कुंवर भोलेपन से बोला - "मैं तो वैद्य जी के पास से आ रहा हूं, उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी कह रहा हूं |" 

"अच्छा तू ऐसे नहीं मानेगा," बहेलिया क्रोध से बोला | फिर बहेलिए ने कुंवर को एक थप्पड़ लगाते हुए कहा - "लड़के ऐसा बोल, आते जाओ, फंसते जाओ, आते जाओ, फंसते जाओ |"

बेचारा कुंवर रोते-रोते बोला - "आते जाओ, फंसते जाओ |" फिर वह इसी प्रकार रटते हुए आगे चल दिया, वह थोड़ी ही दूर गया था कि उसे कुछ लोग इकट्ठे होकर बातें करते दिखाई दिए | वे सब चोर थे और किसी रईस के घर में चोरी की योजना बना रहे थे | तभी उधर से कुंवर रटते हुए निकला - 'आते जाओ, फंसते जाओ |'

एक चोर का ध्यान कुंवर की बात की ओर गया तो उसने फौरन बाकी चोरों का ध्यान कुंवर की रट की ओर लगाया | पांचों चोरों ने सुना तो दौड़कर कुंवर को पकड़ लिया और मारने लगे | कुंवर बेचारा हैरान था कि वे सब उसे क्यों मार रहे हैं |
वह बोला - "चाचा, मैं तो अपने घर जा रहा हूं, तुम मुझे क्यों मारते हो ?"

एक चोर बोला - "हम चोरी करने जा रहे हैं और तू हमें बद्दुआ दे रहा है कि हम आते जाएं और फंसते जाएं यानी एक-एक करके पकड़े जाएं | ऐसी बुरी बात तो हम अपने घर वालों की भी नहीं सुन सकते | तुझे अगर कुछ कहना ही है तो बोल - ले-ले जाओ, रख-रख आओ | अगर कुछ और बोला तो हम तुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे क्या समझा ?

कुंवर बोला - "कुछ नहीं समझा, आप जो कहोगे वहीं बोलूंगा, आप बताओ मैं क्या बोलूं |"

"तुम बोलो ले-ले जाओ, रख-रख आओ, समझे," एक चोर ने कहा | कुंवर बेचारा हैरान-परेशान था, वह यह रटते हुए घर की ओर चल दिया, 'ले-ले जाओ, रख-रख आओ' | कुंवर अभी कुछ ही दूर गया था कि उसने देखा कि कोई शव यात्रा निकल रही है | कोई जवान व्यक्ति मर गया था | रिश्तेदार व परिजन बुरी तरह रो रहे थे |

परंतु कुंवर को तो किसी से लेना-देना न था, वह धीरे से वही रटता रहा जो चोरों ने बताया था | अर्थी उठाने वाले एक व्यक्ति ने कुंवर की बात सुनी तो वह क्रोध से पागल हो उठा और जोर से चिल्लाया - "पकड़ो इस छोकरे को | देखो भागने न पाए | इसे देखो, यह क्या बक रहा है - ले-ले जाओ, रख-रख आओ | यह हमारे लिए इतनी अशुभ बात बोल रहा है | हम क्यों किसी की अर्थी बार-बार लाएं |" क्रोधित रिश्तेदारों ने सुना तो कुंवर से पूछने लगे कि वह क्या कह रहा है |

भोले कुंवर ने डरते-डरते बता दिया कि वह क्या बोल रहा है | रिश्तेदारों ने कुंवर को समझाया, तुम जो बोल रहे हो, वह बहुत गलत बोल रहे हो | तुम्हें कुछ बोलना ही है तो यह बोलो - "ऐसा दिन कभी न हो, ऐसा दिन कभी न हो |"

कुंवर बेचारा मरता क्या न करता, वह यही रटता हुआ चल दिया | ऐसा दिन कभी न हो, ऐसा दिन कभी न हो | वह बेचारा डर के मारे समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ इतना बुरा क्यों हो रहा है | बचपन से आज तक उसने मां-बाप से अधिक डांट तक नहीं खाई थी | पिटाई का तो सवाल ही न था | उसने घर के आस-पास के अलावा बाहरी दुनिया देखी ही नहीं थी |

शाम ढल चुकी थी रटते-रटते वह थोड़ी ही दूर आ गया था कि उसने देखा कि कोई बारात निकल रही है | वह सड़क के किनारे खड़े होकर अपनी बात रटते हुए बारात देखने लगा | उसे पता न था कि यह किसी राजा के बेटे की बारात निकल रही है | एक सैनिक ने सुना कि एक लड़का कुछ बोल रहा है | उसने ध्यान से सुना तो दौड़कर राजा के पास आया और उसे सारी बात बताई |

राजा को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि कोई लड़का कह रहा है कि ऐसा दिन कभी न हो | राजा के तुरंत उस लड़के को पकड़ने का आदेश दिया | सिपाही कुंवर को पकड़कर पीटते हुए राजा के पास ले गए, कुंवर बेचारा रोने लगा |

राजा ने पूछा - "ऐ लड़के, तुम्हें इस शादी से क्या दुख है ?"

कुंवर बेचारा समझ ही न सका कि राजा ऐसा क्यों पूछ रहा है | उसने कहा - "मुझे तो इस शादी से कोई दुख नहीं है |'

राजा ने कहा - "क्या तुम नहीं जानते कि यह राजा के बेटे की बारात है और अशुभ बात बोल रहे हो कि ऐसा दिन कभी न हो |"

कुंवर ने ज्यों ही अपने बात विस्तार से सुनानी शुरू की राजा समझ गया कि कुंवर बेचारा नादान है | उसने कुंवर से कहा - "तुम्हें यह बोलना चाहिए ऐसा दिन सभी का हो |"

कुंवर ने कहा ठीक है | तब राजा ने सिपाहियों को आदेश दिया कि कुंवर को उसके घर पहुंचा दो क्योंकि वह अपने घर का रास्ता भटक गया है |

सिपाही कुंवर को उसके घर छोड़ आए | मां सिपाहियों तथा कुंवर को देखकर हैरान-सी हो गई | कुंवर बेचारा रो रहा था, उसके बदन में पिटाई के कारण बहुत दर्द था |

कुंवर ने रोते-रोते अपनी मां को सारा हाल सुनाया, फिर पूछा - "मां ऐसा क्यों होता है कि कोई आदमी एक बात बोलने को कहता है और दूसरा आदमी उसी बात पर मारने लगता है |"

मां ने कहा - "बेटा समय व मौके के अनुसार शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं |"

कुंवर ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मां की ओर देखा तो मां ने कहा - "सो जाओ बेटा ! तुम बहुत भोले हो, इन बातों का मतलब नहीं समझ सकोगे |"

परंतु बेचारे कुंवर को बदन दर्द के मारे नींद नहीं आ रही थी | पेट-दर्द तो वह कब का भुल चुका था | 

अधिकार की रोटी धोखेबाज का अन्त ईर्ष्या जैसी करनी वैसी भरनी

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