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अधूरा पाठ

अधूरा पाठ

एक बार एक गुरु अपने आश्रम में शिष्यों को समझा रहे थे| तभी कहीं से घूमता हुआ एक चोर उधर से आ निकला| उसने सोचा- ‘चलो देखें गुरुजी अपने शिष्यों को क्या ज्ञान दे रहे हैं|’

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लेकिन कुछ संकोच और कुछ डर से वह वहाँ रुक नहीं सका| उसके कान में गुरुजी के यही शब्द पड़े- ‘पैसा पैसे को खींचता है|’ चोर जल्दी में आगे बढ़ गया और आगे गुरुजी ने और क्या कहा उसने नहीं सुना| लेकिन उसने गुरुजी की जो बात सुनी थी, उसी को तुरंत आजमाने की सोची| वह आज राजा के खजाने में चोरी के लिये जा रहा था सेंध लगाकर आधी रात को जब उसने खजाने में प्रवेश किया तो सामने सोने के सिक्कों का ढेर लगा देखा| बस’ फिर क्या था वह अपनी जेब से एक सिक्का निकालकर खड़ा हो गया कि देखें कैसे पैसा पैसे को खींचता है| लेकिन उसकी अपेक्षा के अनुरुप उसके हाथ के पैसे की ओर कोई पैसा चुंबक की तरह खींचकर नहीं आया| चोर का मन यह मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं था कि गुरुजी अपने शिष्यों को झूठी शिक्षा दे रहे होंगे| उन पर भरोसा किये वह वहाँ खड़ा रहा|

अंततः उसके हाथ का सिक्का भी उसी ढेर में जाकर गिर गया| बेहद दुखी हुआ| उधर सिक्के के गिरने से हुई आवाज़ से पहरेदार आ गये और चोर पकड़ा गया| अगले दिन जब राजा के दरबार में चोर को प्रस्तुत किया गया तो चोर ने गुरुजी की शिक्षा और अपने प्रयोग की बात बतायी| जब यह सारी बात गुरुजी के सामने पहुँची तो वे बहुत हँसे और उन्होंने राजा से कहा- ‘चोर ने मेरे शब्दों के भावार्थ को नहीं समझा, शब्दार्थ में ही उलझ गया| यधपि उसके प्रयोग से मेरी बात ही सत्य सिद्ध हुई, क्योंकि उसके हाथ के पैसे को ढेर के पैसों ने खींच ही तो लिया| दूसरी बात यह राजन्, उसने अधूरा पाठ ही सुना था| मैंने आगे कहा था कि ज्यादा पैसा कम पैसे को अपनी ओर खींच लेता है| सो यही हुआ|’

शिक्षा- मनुष्य को पूरी बात जानकर उस पर अमल करने से लाभ होता है, अधूरी-बात पर अमल करना हानिकारक है|

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