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अब काँटे चुभेंगे नहीं

अब काँटे चुभेंगे नहीं

महाराष्ट्र के चन्द्रपुर जिले में आनन्दवन नामक एक बस्ती है| यहाँ पर जनसेवी बाबा आम्टे ने कुष्ठरोग से पीड़ित हजारों लोगों का रोग से मुक्त कर स्वावलम्बी बनाया|

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एक दिन उस आनन्दवन में एक अंधे बालक ने बाबा से प्रार्थना की- “बाबा, गुलाब कैसा होता है? सब लोग गुलाब की प्रशंसा करते हैं| मुझे बताओ गुलाब कैसा होता है? कहते हैं कि उसका फूल खूब रंगीन और खुशबू से भरा होता है|” बाबा आम्टे उसे फूलों के उधान में ले गए| वहाँ तरह-तरह के फूलों के पौधे खिले हुए थे| बाबा बच्चे को गुलाब के पौधे के पास ले गए| पौधा फूलों से लदा था, गंद से सुवासित था| फूलों की महक से बालक ने अपना हाथ फूलों की ओर बढ़ाया, परंतु गुलाब का काँटा उसे चुभ गया| बालक ने तुरंत अपना हाथ हटा लिया|

उस दिन से कुष्ठसेवी बाबा काँटो से शून्य गुलाब की खोज में संलग्न हो गए| कई वर्षों की मेहनत के बाद उन्हें कामयाबी मिली| अब कुष्टाश्रम आनन्दवन में गुलाब के ऐसे पौधे तैयार हो गए हैं, जिनमें काँटे नहीं हैं| अब आनन्दवन के अपंग बच्चे इन काँटों से शून्य गुलाब को छूकर मस्त होकर झूम उठते हैं|

हाँ, यह सेवाश्रती बाबा आम्टे को ही श्रेय है, जिन्होंने कुष्ठरोगियों और अपंगों के जीवन के काँटे ही दूर नहीं किए हैं, प्रत्युत उन्होंने दृष्टिहीनों को चुभने वाले काँटों से हीन गुलाब तैयार कर उसमें भी आनन्द की नई सृष्टि की है| दूसरों की राह से काटें हटाना सबसे महान कार्य है|

सेवक की
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