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आत्मदीप बनो

आत्मदीप बनो

महात्मा बुद्ध ने सत्य-अहिंसा, प्रेम-करुणा, सेवा और त्याग से परिपूर्ण जीवन बिताया| जीवन-भर वह धर्म प्रचार के लिए, संघ को सुदृण करने के लिए प्रयत्नशील रहे| इस लंबी जीवन-यात्रा के बाद वह जब वह अंतिम यात्रा के लिए, निर्वाण के लिए प्रस्तुत हुए, तब उनका प्रिय शिष्य आनन्द रोने लगा| वह बोला- “गुरुदेव, आप क्यों जा रहे हैं? आपके निर्वाण के बाद हमें कौन सहारा देगा?”

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महात्मा बुद्ध ने कहा- “अभी तक तुमने मुझसे रोशनी ली है, भविष्य में तुम आत्मदीप बनकर विचरण करो| तुम अपनी ही शरण जाओ| किसी दूसरे का सहारा मत ढूँढो| केवल सच्चे धर्म को अपना दीपक बनाओ| केवल सच्चे धर्म की शरण लो|” महात्मा बुद्ध ने यह सीख भी दी थी- “भिक्षुओं! बहुजनों के सुख के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए और लोगों पर दया करने के लिए विचरण करो| एक साथ दो मत जाओ| अकेले ही जाओ, स्वतः ज्योति लो, दूसरों को रोशनी दो|”

भिक्षुओं ने गुरु की इस सीख का पालन किया| किसी का सहारा न लिया, किसी का साथ न लिया, एकाकी यात्री भिक्षुक अकेले दीप के रुप में दूसरों को रोशनी देते और सेवा के लिए चल पड़े| शायद यही कारण है कि कुछ ही शताब्दियों में महात्मा बुद्ध की सीख और शिक्षाएँ एशिया ही नहीं; विश्व के विस्तीर्ण क्षेत्र में व्याप्त हो गई| इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक मनुष्य को अपना सहारा खुद ही बनना चाहिए|

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