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दूसरे फकीर की कहानी (अलिफ लैला) – शिक्षाप्रद कथा

दूसरे फकीर की कहानी (अलिफ लैला) - शिक्षाप्रद कथा

मैं एक बड़े राजा का पुत्र हूं| बचपन से ही मेरी विद्यार्जन में गहरी रुचि थी| मेरे पिता ने दूर-दूर से प्रख्यात शिक्षक बुलाकर मेरी शिक्षा के लिए रखे| थोड़े ही समय में मैंने न केवल लिखना-पढ़ना सीख लिया, बल्कि कुरान-शरीफ भी कंठस्थ कर ली| इसके अतिरिक्त नबी के कथनों यानी हदीसों और धर्म और दर्शन-शास्त्र की शिक्षा भी प्राप्त कर ली|

इसके अतिरिक्त भांति-भांति के कला-कौशल भी सीख लिए और इतिहास, पहेली और मनोरंजन वार्ता में भी पारंगत हो गया| मैंने काव्य-शास्त्र और गणित में भी अच्छा अभ्यास कर लिया, जैसा एक राजकुमार होने के नाते मुझसे आशा की जाती थी| इन सबके साथ ही मैंने सुलेखन में भी दक्षता प्राप्त कर ली| इस प्रकार अरबी लिपि के सातों लेखन पद्धतियों का मुझे ऐसा अभ्यास हो गया कि मेरे जैसा सुलेखक दूर-दूर तक नहीं पाया जाता था| इतने गुणों और कुशलता को प्राप्त करने पर भी मैं अपने दुर्भाग्य के लेख को न मिटा सका और दुरवस्था में पहुंच गया, जो तुम लोग देख रही हो|

हुआ यह कि मेरे विद्यार्जन और कला-कौशल में पारंगत होने की ख्याति जब दूर-दूर पहुंची, तो हिंदुस्तान के राजा ने मुझे देखने की इच्छा प्रकट की| उसने मुझे भेंट करने के लिए एक दूत के हाथ बहुत-सी बहुमूल्य वस्तुएं भेजीं और संदेशा भिजवाया कि मैं आकर उससे मिलूं| मेरे पिता इस बात से बड़े प्रसन्न हुए, क्योंकि एक तो एक महान सम्राट से उनके संबंध बन रहे थे, फिर राजकुमार होने के नाते मुझे देश-विदेश की जानकार और राजाओं-महाराजाओं से मेल-जोल तो बढ़ाना ही चाहिए था|

मैं अपने पिता कि आज्ञानुसार थोड़ी-सी यात्रा की सामग्री और कुछ चुने हुए सेवक लेकर हिंदुस्तान की ओर रवाना हुआ, क्योंकि बड़ी सेना ले जाने की न तो आवश्यकता ही थी और न यह बात उचित ही होती| कुछ दिन तक चलने के बाद हम लोगों को पचास के लगभग घुड़सवार डाकुओं ने घेर लिया और सबसे पहले वे दस घोड़े पकड़ लिए, जिन पर मेरे पिता की ओर से हिंदुस्तान के राजा को भेंट में दी जाने वाली बहुमूल्य वस्तुएं लदी थीं| मेरे सेवकों ने कुछ देर तक डाकुओं का सामना किया, किंतु हार गए|

मैंने यह सोचकर कि डाकुओं पर रौब पड़ेगा उनसे कहा, “मैं हिंदुस्तान के बादशाह का दूत हूं|”

इस पर डाकुओं ने घृणापूर्वक कहा, “हमें हिंदुस्तान के बादशाह की क्या परवाह है, हम न तो उसके शासित देश में रहते हैं, न उनके नौकर हैं|”

फिर उन डाकुओं ने हम लोगों पर आक्रमण कर दिया| हम भी कुछ देर तक लड़े, लेकिन उनका सामना ज्यादा देर तक न कर सके| मेरे कई साथी मारे गए| मैं तथा मेरा घोड़ा दोनों घायल हो गए, परंतु फिर भी मैं जान बचाकर अपने घोड़े पर भाग निकला और डाकुओं की पहुंच से दूर हो गया| कुछ दूर तक दौड़ने के बाद मेरा घोड़ा थकान ओअर घावों के कारण गिरकर मर गया|

मैंने यह सोचकर खुदा को धन्यवाद दिया कि माल असबाब जाता रहा, लेकिन जान तो बच गई| किंतु अब मैं नितांत अकेला और द्रव्यहीन हो गया था| यह भी डर था कि कहीं डाकुओं ने देख लिया, तो बगैर जान से मारे न रहेंगे| अत: किसी तरह कपड़ों की पट्टी फाड़कर अपने घाव बांधे और एक ओर को चल दिया| रात एक पहाड़ की गुफा में बिताई| सुबह को उठा तो सबसे पहले जंगली फल खाकर भूख मिटाई और फिर चल पड़ा| कई दिन तक इसी तरह भटकता रहा, फिर एक बड़े नगर में पहुंच गया, जो बड़ा सुशोभित लग रहा था| वहां एक नदी भी बहती थी, जिससे वह प्रदेश हरा-भरा था| मैं नंगे और बेवाइयों से फटे पांव, बढ़े बालों और दाढ़ी तथा गंदे-फटे वस्त्रों के साथ उस नगर में घूमने लगा| घूमते-घूमते मैं यह मालूम करने की कोशिश करने लगा कि यह कौन-सा देश है और यहां से मेरा देश कितनी दूर है|

फिर मैं एक आदमी के पास गया, जो सरकारी लिपिक था और शहर में आने-जाने वालों का हिसाब रखता था| उसने मेरा वृत्तांत पूछा तो मैंने सबकुछ, जो मुझ पर बीता था, उसे बताया| उसने धैर्यपूर्वक मेरी बातें सुनीं| मेरी सारी बात सुनने के बाद उसने जो कुछ कहा, उससे शांति की जगह मेरा हृदय विक्षोभ से भर गया|

उसने कहा, “तुमने मुझे अपना पूरा हाल बता दिया है, यह तो ठीक है – परंतु यहां के किसी और व्यक्ति को कुछ न बताना, क्योंकि यहां का बादशाह तुम्हारे पिता का शत्रु है| यदि उसे तुम्हारा पता चल गया, तो तुम्हारा क्या होगा, यह तो खुदा ही जानता है|”

मैंने उस बूढ़े लिपिक को बहुत धन्यवाद दिया कि उसने मुझ पर दया दिखाई और मुझे खतरे से आगाह कर दिया| मैंने उससे वादा किया कि अब यहां के किसी आदमी को अपनी सच्ची कहानी नहीं बताऊंगा|

वह लिपिक यह सुनकर प्रसन्न हुआ|

मेरा भूख से बुरा हाल हो रहा था, इसलिए उसने अपने घर से खाना लाकर मुझे खिलाया और वहीं एक कोने में लेटकर थकावट दूर करने को कहा| मैंने ऐसा ही किया|

जब मेरे शरीर में शक्ति और स्फूर्ति आ गई तो मैं फिर उसके पास गया| उसने पूछा, “तुम्हें कोई ऐसा हुनर आता है, जिससे तुम अपनी जीविका चला सको?”

मैंने अपने साहित्य, काव्य-कला, व्याकरण, सुलेखन आदि की निपुणता की बात कही| तब उसने कहा, “यह सब यहां बेकार है| यहां विद्या को कोई पूछ नहीं| तुम्हें इस विद्या से एक पैसा भी यहां मिलने वाला नहीं|” उसने थोड़ी देर रुककर फिर कहा, “तुम शरीर से तगड़े हो| तुम एक जांघिया पहनकर जंगल चले जाओ और लकड़ियां काटकर शहर में बेचो| इससे तुम्हें इतनी आय तो हो ही जाएगी कि किसी का आसरा लिए बगैर अपना खर्च चला सको| कुछ दिन इसी प्रकार दुख उठाकर मेहनत करके बिताओ| आशा है कि इसके बाद खुदा तुम पर कृपा करेगा और तुम फिर सुख-समृद्धि प्राप्त कर लोगे| मैं तुम्हारी इतनी सहायता कर दूंगा कि तुम्हें एक कुल्हाड़ी और एक रस्सी दे दूंगा|”

मरता क्या न करता| यद्यपि यह कार्य किसी प्रकार मेरे योग्य नहीं था, फिर भी मैंने यह करना स्वीकार कर लिया| और कोई रास्ता भी नहीं था| दूसरे दिन लिपिक ने मुझे एक जांघिया, एक कुल्हाड़ी और एक रस्सा लाकर दे दिया और मेरा परिचय कुछ लकड़हारों के साथ करा दिया| अब मैं जंगल में जाता और लकड़ियां काटकर शहर में ले आता| लकड़ियों के एक गट्ठे का मूल्य एक स्वर्ण मुद्रा मिलता था| यद्यपि जंगल उस शहर से दूर था, तथापि नगर निवासी बड़े आलसी थे और श्रम करने के अभ्यस्त न थे, इसलिए लकड़ी शहर में बहुत महंगी बिकती थी| कुछ ही दिनों में मेरे पास काफी मुद्राएं हो गईं, जिनमें से कुछ उस उपकारी लिपिक को दे दीं|

इस प्रकार पूरा एक वर्ष व्यतीत हो गया| एक दिन लकड़ी काटते-काटते मैं अपने साधारण स्थान से आगे बढ़ गया| आगे का जंगल मुझे और अच्छा लगा| मैंने एक वृक्ष काटा| जब उसकी डालें और तना काट चुका, तो मैंने उसकी जड़ भी काटकर ले जानी चाही| कुल्हाड़ी चलाते-चलाते मुझे एक लोहे का कड़ा दिखाई दिया| मैंने उस पर से मिट्टी हटाई तो देखा कि वह कड़ा लोहे के एक दरवाजे से लगा है| मैंने जोर लगाकर उसे ऊपर उठाया तो नीचे जाती हुई सीढ़ियां दिखाई दीं| मैं रस्सा और कुल्हाड़ी सहित नीचे उतर गया| नीचे एक बड़ा-सा दालान था, जिसमें तीव्र प्रकाश हो रहा था| मैं आगे बढ़ता गया तो देखा कि सामने एक बारादरी है, जिसके फर्श संगे-मूसा के बने हुए है और खंभे नीचे से ऊपर एक खालिस सोने के हैं| बारादरी के एक अत्यंत रूपवती स्त्री को देखा तो ठगा-सा रह गया| मैंने उसके निकट जाकर अभिवादन किया|

स्त्री ने मुझसे पूछा, “तुम कौन हो? मनुष्य या जिन?”

मैंने सर उठाकर कहा, “हे सुंदरी! मैं मनुष्य हूं, जिन नहीं|”

वह स्त्री शोकयुक्त स्वर में बोली, “तुम मनुष्य हो तो यहां मरने के लिए क्यों आए हो| मैं यहां पच्चीस वर्षों से रह रही हूं| इस काल में तुम्हारे सिवा और कोई दूसरा मनुष्य यहां दिखाई नहीं दिया|”

उस स्त्री के अनुपम रूप के साथ ही उसके स्वर की मधुरता का मुझ पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि कुछ देर तक मेरे मुंह से कोई बात नहीं निकली|

कुछ देर बाद मैंने उस स्त्री से कहा, “सुंदरी! मुझे तुम्हारा कुछ हाल नहीं मालूम, किंतु तुम्हारे दर्शन मात्र से मुझे अतीव सुख मिला है| मैं अपना सारा दुख-दर्द भूल गया हूं| मेरी अतीव इच्छा है कि तुम्हें यहां से छुड़ा दूं, क्योंकि यह स्पष्ट है कि तुम यहां सुखी नहीं हो|” फिर मैंने अपना सारा वृत्तांत उस स्त्री के समक्ष कह डाला|

मेरा पूरा हाल सुनने के बाद वह स्त्री ठंडी सांस भरकर बोली, “शहजादे! तुम ठीक कहते हो| यह मकान जादू का है और यहां प्रचुर धन और समस्त सुविधाएं उपलब्ध हैं, फिर भी मुझे यहां रहना तनिक भी पसंद नहीं| तुमने आबनूस के द्वीपों के बादशाह अबू तैमूरस का नाम सुना होगा, मैं उन्हीं की बेटी हूं| मेरे पिता ने मेरा विवाह अपने भतीजे के साथ कर दिया था| जब मैं शादी के बाद अपने पति के घर जाने लगी, तो रास्ते में मुझे एक दुष्ट जिन ने उठा लिया| मैं डर के कारण लगभग तीन पहर तक अचेत रही| जब मुझे होश आया तो मैंने अपने को इस मकान में पाया| अब केवल उसी जिन के साथ मेरा उठना-बैठना है| यह सारा धन और सुख-सामग्री जो यहां दिखाई देती है, मुझे कुछ भी संतोष नहीं दे पाती| हर दसवें दिन वह जिन यहां आता है और मेरे साथ रात बिताता है| उसका विवाह पहले ही उसी की जाति की एक स्त्री से हो चुका है| अत: वह अपनी स्त्री के भय से मेरे पास इससे अधिक नहीं रह पाता| इस दिन के अंदर यदि किसी दिन मैं उसे बुलाना चाहूं तो उसका भी प्रबंध उसने कर दिया है| यदि मैं यह इधर रखा हुआ जादू का यंत्र छूं दूं तो उसे खबर हो जाती है और वह आ जाता है|”

स्त्री ने आगे कहा, “उस दिन को यहां से गए चार दिन हो गए हैं| वह छह दिन बाद फिर यहां आएगा| यदि तुम्हें यहां की सुख-सुविधाएं और मेरा साथ पसंद है तो पांच दिनों तक यहां आराम से रह सकते हो| मैं तुम्हारा हर प्रकार से आदर-सत्कार करूंगी और तुम्हें सुख पहुंचाउंगी|”

मैं उसकी बातें सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ| मुझे इससे क्या आपत्ति हो सकती थी कि ऐसी सुंदरी के साथ रहूं| मैंने बड़ी प्रसन्नता से यह बात स्वीकार कर ली| तब वह मुझे एक स्नानागार में ले गई| मैंने अंदर जाकर अच्छी तरह स्नान किया और बाहर निकला| वह मेरे पहनने के लिए जरी के वस्त्र ले आई| जब मैंने वह शाही पोशाक पहनी तो वह मुझ पर और भी कृपालु हो गई| तत्पशचात एक सजे हुए दालान में उसने मुझे एक सुनहरी कमख्याब की मसनद पर बिठाया| फिर वह नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन ले आई और हम दोनों ने साथ बैठकर भोजन किया| दिन भर हम लोग इधर-उधर की बातें करते रहे| रात के भोजन के बाद उसने अपने साथ मुझे सुलाया| सुबह होने पर उसने और भी स्वादिष्ट व्यंजन बनाए और मेरे विशेष सत्कार के लिए पुरानी शराब की बोतलें ले आई| मैं बहुत-सी शराब पीकर मदमस्त हो गया|

मैंने उससे कहा, “प्रिय! तुम पच्चीस वर्षों से इस मकान में, जिस कब्र कहना चाहिए, बंद हो| यह बात ठीक नहीं है| तुम मेरे साथ यहां से निकल चलो और बाहर की ताजा हवा खाओ| इस दिखावे के ऐशो – आराम को छोड़ो, क्योंकि यह जादू से अधिक कुछ नहीं| तुम मेरे साथ चलो|”

वह सुंदरी बोली, “ऐसी बातें जिह्वा पर भी न लाना| तुम जिसे सूर्य का प्रकाश कहते हो, वह मैं भूल चुकी हूं| मुझे यहीं रहने की आदत पड़ गई है| मुझे यहीं रहने दो| जिस दिन वह जिन यहां आता है, उसे छोड़कर बाकी नौ दिन तुम यहां आराम से रह सकते हो|”

मुझे नशा चढ़ गया था| मैंने कहा, “तुम उस जिन से इतना क्यों डरती हो? मैं तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकता हूं| मैं इस जादू के यंत्र सहित उसकी जादुई लिखावट को तोड़-फोड़कर बराबर कर दूंगा| उस जिन को आने दो| मैं भी तो देखूं, उसमें कितनी ताकत है| मैंने निश्चय कर लिया है कि संसार के सारे जिनों का अंत कर दूंगा| सबसे पहले इसी जिन को मारूंगा, जिसने तुम्हें कैद कर रखा है|”

वह स्त्री भली-भांति जानती थी कि मेरी मूर्खता का क्या फल होगा| उसने मुझे बहुत समझाया, हर तरह रोका, कसमें दीं, कहा, “यंत्र को छुआ तो हम दोनों मारे जाएंगे| उस जिन की शक्ति को मैं जानती हूं, तुम उसे नहीं जानते|”

मैं नशे में धुत्त था, इसलिए मैंने उसकी चेतावनी को अनुसना कर दिया और ठोकर मारकर जादू के यंत्र को तोड़ डाला| एकाएक ही सारा मकान कांपने लगा और एक महाभयानक शब्द हुआ| सारी रोशनियां बुझ गईं और अंधकार छा गया| जिसमें रह-रहकर बिजली चमकने लगती थी| यह हाल देखकर मेरा नशा हिरन हो गया| मैंने सोचा कि वास्तव में मुझे भयानक भूल हो गई थी| मैंने अब उस सुंदरी से पूछा की अब क्या करना चाहिए तो उसने कहा, “मुझे अपने प्राण जाने का भय नहीं, मैं तो वैसे ही दुखी थी| तुम्हारी जान को जरूर खतरा है और इसी से मैं अत्यंत व्याकुल हूं| तुमने खुद ही अपनी जान के लिए यह आफत मोल ली| अब यहां से तुरंत भागकर जान बचाओ|”

यह सुनकर मैं बेतहाशा भागा कि अपनी कुल्हाड़ी और रस्सा भी वहीं भूल गया और गिरते-पड़ते उस सीढ़ी तक आया, जिससे उतरकर उस मकान में गया था| इतने में वह जिन भी अत्यंत क्रुद्ध होकर वहां आ पहुंचा और गरजकर स्त्री से पूछने लगा कि तूने मुझे क्यों बुलाया है?

वह स्त्री डर के मारे पत्ते की तरह कांपने लगी और बोली, “मैंने तुम्हें बुलाया नहीं है| मैंने इस बोतल से थोड़ी-सी मदिरा पी ली थी| मुझ पर ऐसा नशा चढ़ा कि हाथ-पांव काबू में न रहे| नशे की हालत में मैंने इस यंत्र पर पांव रख दिया, जिससे यह टूट गया|”

जिन यह सुनकर और भी कुपित हुआ और बोला, “तू झूठी, मक्कार और दुराचारिणी है| इस कुल्हाड़ी और रस्से को यहां कौन लाया है?”

स्त्री बोली, “मैंने तो इन्हें अभी-अभी देखा है| तुम भागते-दौड़ते आए हो, इसलिए तुम्हारे साथ लगी हुई यह चीजें आ गई होंगी| तुमने अपनी जल्दी में ध्यान न रखा होगा कि तुम्हारे पास कुल्हाड़ी और रस्सा भी है|”

इस पर जिन का क्रोध और भी बढ़ा| उसने स्त्री को भूमि पर पटक दिया और उसे निर्दयता से पीटने लगा| साथ में गालियां भी देने लगा| स्त्री तड़पने और रोने-चिल्लाने लगी| उसका करुण क्रंदन मुझसे नहीं सुना जाता था| लेकिन मैं कुछ कर भी नहीं सकता था| मैंने स्त्री के दिए वस्त्र उतारे और वही फटे-पुराने लकड़हारों के वस्त्र जिन्हें पहनकर मैं पिछले दिन आया था, पहन लिए| फिर मैं सीढ़ी से चढ़कर ऊपर आ गया| मैं अपने को बराबर कोसता जा रहा था कि मेरी मूर्खता और जिद्दीपन के कारण उस बेचारी स्त्री ऐसा अत्याचार हो रहा है| बाहर आकर मैंने फिर सीढ़ी के मुंह पर लोहे का दरवाजा रखा और उस पर मिट्टी डालकर उसे छुपा दिया|

फिर मैंने पिछले दिन की जमा की हुई लकड़ियां किसी तरह बांधी और नगर में आकर लकड़ी का गट्ठा बेच दिया| मैं बराबर सोच रहा था कि न जाने उस सुंदर स्त्री पर क्या बीत रही होगी| लकड़ी बेचकर जब मैं अपने निवास स्थान पर आया तो लिपिक मुझे देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ| उसने कहा, “तुम कल नहीं आए तो मुझे बड़ी चिंता हो गई थी| मैंने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि यहां के बादशाह को तुम्हारे यहां पर रहने की बात मालूम हो गई और उसने तुम्हें पकड़ मंगाया हो| भगवान का लाख-लाख धन्यवाद है कि तुम सकुशल वापस आ गए हो|”

मैंने उसकी बातों पर उसे हृदय से धन्यवाद दिया, किंतु यह न बताया कि कल मेरे साथ क्या बीती थी| मैं अपने कमरे में चला गया और फिर उसी शोक में निमग्न हो गया कि मैंने अपने दुराग्रह से अपनी उपकारिणी स्त्री को कैसा दुख पहुंचाया और अगर मैं वह यंत्र न तोड़ डालता तो उस राजकुमारी पर भी दुख न पड़ता और मैं पांच दिन बड़े सुख से रहता|

मैं यह सोच ही रहा था कि लिपिक मेरे पास आकर कहने लगा, “एक बूढ़ा एक कुल्हाड़ी और रस्सा लेकर आया है और कहता है कि तुम शायद इन्हें जंगल में भूल आए थे| लेकिन वह इन चीजों को तभी वापस करेगा, जब तुम बाहर चलकर उसे इनकी पहचान बताओगे|”

यह सुनकर मेरा चेहरा पीला पड़ गया और मैं भय के कारण सिर से पांव तक थर-थर कांपने लगा| लिपिक ने मुझसे कहा, “यह तुम्हें क्या हो रहा है?”

मैं अभी उसे उत्तर भी नहीं दे सका था कि कमरे की धरती फट गई और बूढ़ा जिन मेरे बाहर आने में देर होते देख कुल्हाड़ी और रस्सी लिए खुद वहीं आ गया| उस जिन को देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया| उसने मुझसे कहा, “तू जानता है मैं कौन हूं? मैं ऐसा-वैसा जिन नहीं हूं, स्वयं इबलीस (शैतान) का दोहित्र हूं| तू जानता है कि इबलीस सारे जिनों और दैत्यों का सरताज है| बोल, यह कुल्हाड़ी और यह रस्सा तेरे हैं या नहीं?”

मैं उसे देखकर ऐसा भयभीत हुआ कि मेरी वाक्-शक्ति ही समाप्त-सी हो गई और मैं अचेत होकर गिरने लगा| जिन ने मेरे होश में आने की प्रतीक्षा नहीं की| वह मुझे पकड़कर कमरे से बाहर ले उड़ा और दो ही क्षण में इतने ऊंचे पर्वत पर ले जाकर रख दिया, जिस पर चढ़ने में महीनों लगते हैं| फिर उसने पहाड़ की चोटी पर पांव पटका| इससे धरती फट गई| जिन मुझे लेकर उसमें उतर गया और पलक झपकते ही मुझे उठाए हुए उस मकान में आया, जहां मैंने राजकुमारी के साथ पिछला दिन बिताया था| यह देखकर मेरे दुख का पारावार न रहा कि राजकुमारी अब भी जमीन पर पड़ी तड़प रही थी और अधमरी-सी अवस्था में चीख-पुकार कर रही थी|

उस जिन ने कहा, “देख यह कुल्टा तुझ पर मोहित है|”

स्त्री ने मुझ पर सरसरी निगाह डालकर कहा, “मैं इसे बिलकुल नहीं जानती, इससे पहले मैंने कभी इसे देखा ही नहीं|”

जिन बोला, “तू झूठ बोलती है| यह जान ले कि इसी आदमी के कारण तेरी जान जाएगी|”

स्त्री ने कहा, “तू किसी-न-किसी बहाने से इसे मार डालना चाहते हो, इसीलिए मुझसे झूठ कहलवा रहे हो|”

जिन ने कहा, “अगर तू वास्तव में इसे नहीं जानती तो तलवार उठा और इसका सिर काट दे|”

स्त्री ने कहा, “मुझसे तलवार कैसे उठेगी? इसके अलावा मैं किसी निर्दोष व्यक्ति के प्राण क्यों लूं?”

जिन ने कहा, “तू इसे मारने से इनकार करती है, इसी बात से तेरा पापाचार सिद्ध हो जाता है|”

फिर जिन ने मेरी ओर देखकर पूछा, “तू इस स्त्री को जानता है या नहीं?”

मैंने अपने मन में सोचा कि राजकुमारी स्त्री होकर भी इतना साहस दिखा रही है, फिर मर्द होकर इसका भेद खोलना मेरे लिए उचित नहीं है| यही सब सोचकर मैंने कहा, “मैंने इससे पहले इस स्त्री को कभी नहीं देखा है|”

जिन बोला, “अगर तू सच कहता है तो उठा तलवार और काट दे इसका सिर|”

मैंने मन ही मन सोचा कि जो स्त्री मेरे कारण इस दुख में पड़ी है, उसे मारना उचित नहीं| उधर राजकुमारी ने सांकेतिक भाषा में मुझसे कहा – तुम विचार न करो, मेरी तो जान ऐसे भी जानी ही है| फिर क्यों न तुम अपने हाथ से मुझे मारकर इस कष्ट से मुक्त भी कर दो और अपनी जान भी बचा लो| पर मैं ऐसा न कर सका| मैंने जिन से कहा, “तुमने क्या मुझे बिलकुल कायर पुरुष समझ लिया है कि तुम्हारे कहने भर से किसी अपरिचिता को मार डालूं? फिर इस सुंदरी की तो तुमने पहले से दुर्दशा कर रखी है – इस पर मैं हाथ उठाऊं?”

जिन ने कहा, “तुम दोनों ही मेरे क्रोध को निरंतर बढ़ा रहे हो| तुम शायद यह नहीं जानते कि मुझमें कितनी शक्ति है|” यह कहकर उस अत्याचारी ने राजकुमारी के दोनों हाथ काट दिए| वह अधमरी तो पहले से ही थी, यह चोट खाकर तुरंत मर भी गई|

मैं यह देखकर मूर्च्छित हो गया| कुछ समय बाद होश आया तो मैंने जिन से कहा, “अब तुम मुझे भी मारकर अपना क्रोध शांत करो|”

जिन ने कहा, “हम लोगों का नियम है – किसी को व्यभिचार का दोषी पाने पर उसका वध कर देते हैं, पर तुम पर दोष सिद्ध नहीं हो पाया| तुम पर सिर्फ संदेह है, इसलिए तुझे मारूंगा नहीं – किंतु मानव नहीं रहने दूंगा| अब तू कुत्ता, गधा, सूअर या जो भी पशु-पक्षी बनना चाहो, बता दो, मैं तुझे वही बना दूंगा|”

मैंने उसका क्रोध कुछ कम देखा तो बोला, “जिनों के सरताज, मेरी प्रार्थना है कि एक भले आदमी ने अपना बुरा करने वाले के साथ जैसे उपकार किया था, वैसे ही तुम मुझे क्षमा कर दो और मुझे आदमी ही रहने दो|”

जिन ने पूछा, “यह भले आदमी का क्या किस्सा है?”

तब मैंने उसे यह किस्सा सुनाया|

 

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