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चोर कौन – शिक्षाप्रद कथा

चोर कौन - शिक्षाप्रद कथा

एक शहर में एक व्यापारी रहता था| उसका व्यापार काफी दूर-दूर तक फैला हुआ था| उसके काफिले तिब्बत, आसाम, बंगाल और कश्मीर तक जाते थे| व्यापारी धन-धान्य से परिपूर्ण था| लक्ष्मी की उस पर असीम कृपा थी|
उसे दुख था तो बस यही कि उसके कोई संतान नहीं थी| उसका सारा काम-काज सेवकों के बलबूते पर चलता था| वह अपने सेवकों के काम से प्रसन्न होकर उन्हें पुरस्कार भी दिया करता था| सेवक भी उसके मालिक से प्रसन्न रहते थे| व्यापारी के गोदाम में अथाह माल पड़ा रहता था| उसकी देखभाल के लिए चार पहरेदार नियुक्त थे| पहला पहरेदार ईमानदार था तथा लगन से माल की रखवाली करता था| दूसरा पहरेदार लापरवाह था| वह रात-भर वहीं सोया रहता था| तीसरे पहरेदार की आदतें खराब थीं| वह रात होते ही अपने नशे-पानी के जुगाड़ में लग जाता था| चौथा पहरेदार सबसे गया-बीता था| वह चोर था| जैसे ही रात होती, वह इधर-उधर चोरी करने निकल जाता|

गोदाम का माल अगर सुरक्षित था, तो सिर्फ ईमानदार पहरेदार की वजह से, लेकिन व्यापारी यही समझता था कि चारों पहरेदार लगन से चौकीदारी करते हैं और उसके गोदाम की हिफाजत करते हैं| इसलिए एक दिन खुश होकर व्यापारी ने चारों पहरेदारों को पुरस्कार देने का निश्चय किया|

उसने चारों को बुलाया| चारों पहुंच गए| व्यापारी मकान के छज्जे पर खड़ा था| उसने ऊपर से ही मोहरों की चार थैलियों नीचे फेंककर कहा – “चारों एक-एक बांट लेना|”

जब थैलियां नीचे आई तो चारों पहरेदार उन्हें लेने के लिए लपके| तीन पहरेदारों को तो थैलियां मिल गईं, पर जो ईमानदार चौकीदार था, उसे थैली न मिली| पता नहीं चौथी थैली कहां गायब हो गई थी? ईमानदार चौकीदार ने व्यापारी से शिकायत की| व्यापारी समझ गया कि किसी पहरेदार ने दो थैलियां हथिया ली हैं| व्यापारी को यह देखकर बहुत बुरा लगा कि उसका कोई सेवक बेईमान भी है| उसे किसी भी हालत में बेईमान सेवक स्वीकार नहीं था|

वह उसी समय राजमहल पहुंचा और राजा को साड़ी बात कह सुनाई| राजा ने कोतवाल को बुलाया और कहा – “कल तक चोर का पता लगाओ, नहीं तो नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा|”
कोतवाल परेशान हो गया| उसने चारों पहरेदारों को कोतवाली में बुलाया और पूछताछ की| साम-दाम-दंड-भेद की सारी नीतियां अपना लीं, लेकिन चोर का पता न चला| गुस्से में आकर उसने चारों पहरेदारों को हवालात में बंद कर दिया और घर आकर बिना खाए-पिए चारपाई पर लेट गया| यह तो स्पष्ट था कि उन चारों में से ही कोई एक चोर है, मगर वह सच्चाई स्वीकार करके अपना गुनाह कुबूल करने को राजी नहीं था| यही सब देखकर कोतवाल को नौकरी हाथ से जाती नजर आ रही थी| यही उसकी चिंता का कारण था|

कोतवाल की बेटी अपने पिता को चिंतित देखकर परेशान हो उठी| वह बड़ी सयानी और समझदार थी| उसने अपने पिता से उनकी परेशानी का कारण पूछा तो कोतवाल सबकुछ बताते हुए बोला – “अगर कल तक चोर का पता न लगा तो राजा मुझे नौकरी से हटा देंगे|”
लड़की ने थोड़ी देर सोचकर कहा – “आप चिंता मत कीजिए, चोर का पता मैं लगाऊंगी|”

लड़की ने हल्का-सा श्रृंगार किया और कैदियों को भोजन लेकर वह उस कोठरी में जा पहुंची, जिसमें उन चारों पहरेदारों को रखा गया था| पहरेदार एक युवती को अपने सामने देख हतप्रभ रह गए| कोतवाल की बेटी उनके मनोभावों को भांप मुस्कराकर बोली – “मैं यहां कैदियों को खाना खिलाती हूं| जो कैदी मेरी कहानियां सुनता है, उसे मैं भरपेट स्वादिष्ट भोजन खिलाती हूं|”

कहानी सुनने में भला उनका क्या जाता था| स्वादिष्ट भोजन पाने के लालच में चारों ने कहानी सुनना मंजूर कर लिया| तब लड़की कहानी आरंभ करती हुई बोली – “एक लड़की थी|

बचपन में ही उसकी शादी हो गई थी| वह अपने मां-बाप के साथ रहती थी| जब वह बड़ी हो गई तो मां-बाप ने उसे पति के घर भेजने का निश्चय किया| मगर ससुराल से उसे लेने कोई नहीं आया| अत: वह साज-श्रृंगार कर अकेली ही ससुराल की ओर चल दी| रास्ता दुर्गम था, पर वह बिना घबराए आगे बढ़ती गई| अचानक रास्ते में उसे एक चोर मिला| उसने लड़की से सारे गहने उतार कर देने को कहा| लड़की ने विनती की कि वह पहली बार पति के घर जा रही है, अगर बदन पर गहने न हुए तो ससुरालवाले बुरा मानेंगे, सो, पति के घर पहुंचकर वह गहने उसे सौंप देगी| चोर मान गया और उसके पीछे-पीछे चलने लगा| आगे चलकर एक शराबी ने लड़की का रास्ता रोक लिया| लड़की ने उससे कहा, ‘मैं ससुराल जा रही हूं, तुमसे बाद में मिलूंगी|’ शराबी लड़की पर मुग्ध हो गया था| वह भी उसके पीछे चल पड़ा| थोड़ी दूर चलने पर लड़की को एक दानव ने रोक लिया| वह भूखा था, बोला, ‘ऐ लड़की! मैं तुझे खाऊंगा|’ लड़की ने बिना घबराए उत्तर दिया, ‘पहले मुझे पति के दर्शन कर लेने दो, फिर खा लेना|’ दानव ने उसकी बात मान ली| वह भी लड़की के साथ हो लिया| लड़की ससुराल पहुंची| उसने अपने सास-ससुर और पति के पांव छुए| ससुरालवालों ने उसे भरपूर आशीर्वाद दिया| दरवाजे के बाहर चोर, शराबी और दानव खड़े थे| ऐसा मनोहर पारिवारिक दृश्य देखकर उनका मन पिघल गया| उन्होंने लड़की को आगे तंग करने का विचार त्याग दिया और वहां से वापस लौट गए|

कहानी सुनाकर लड़की ने चारों पहरेदारों से पूछा, “अब तुम लोग बताओ की चोर, शराबी और दानव में किसका स्वभाव अधिक अच्छा था?”

पहला पहरेदार ईमानदार था, उसने नाक-भौं सिकोड़कर कहा, “इनमें भला किसका स्वभाव अच्छा हो सकता है| तीनों दुष्ट प्रवृत्ति वाले थे|”

दूसरे पहरेदार ने दानव को अधिक अच्छा बताया| वह अपने उत्तर को तर्क की कसौटी में खरा उतारने की कोशिश करता हुआ बोला, “देखो न, भूखा होते हुए भी उसने लड़की को नहीं खाया|”

तीसरा पहरेदार बोला, “अरे, सबसे अच्छा शराबी था, देखो न किस तरह उसने चुपचाप लड़की को जाने दिया|”

चौथा बोला, “तुम लोग तो बेवकूफ हो| सबसे अच्छा तो चोर था| सामने इतने गहने होते हुए भी उसने लड़की को हाथ न लगाया|”

कोतवाल की लड़की चारों के उत्तर सुनकर समझ गई कि चोर कौन है| जो पहरेदार जिस प्रवृत्ति का था, उसने उसी प्रवृत्ति वाले की प्रशंसा की थी| वह अपने मकसद में कामयाब हो गई थी, अत: वह घर लौट आई| उसने अपने पिता को बता दिया कि असली चोर कौन है| दूसरे दिन सुबह होते ही कोतवाल हवालात में पहुंचा और चोर को राज-दरबार में पेश कर दिया|

राजा ने चोर को गौर से देखा और पूछा, “मोहरों की थैली कहां है?”

पर चोर चोरी से इन्कार करते हुए बोला – “मैं बेकसूर हूं महाराज, मुझे उस थैली के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है|”

काफी पूछने पर भी जब चोर ने मोहरों की थैली का पता न बताया तो राजा को क्रोध आ गया| उसने चोर को फांसी की सजा सुना दी| अब चोर के देवता कूच कर गए| मौत के भय से वह सच्चाई उगलने के लिए विवश हो गया| उसने तुरंत राजा को मोहरों की थैली का पता बता दिया| इस प्रकार असली चोर पकड़ा गया और व्यापारी की आंखें खुल गईं| उसने ईमानदार पहरेदार को ईनाम ही नहीं दिया बल्कि उसे सब पहरेदारों का मुखिया भी बना दिया| उसके बाद उसने अपने सेवकों पर अंधविश्वास करना छोड़ दिया|

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