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ब्रह्मा बने शिव के सारथी (भगवान शिव जी की कथाएँ) – शिक्षाप्रद कथा

ब्रह्मा बने शिव के सारथी (भगवान शिव जी की कथाएँ) - शिक्षाप्रद कथा

वैदिक काल में त्रिपुर नाम का एक असुर राजा था| उसने नागों, यक्षों, गंधर्वों तथा किन्नरों को जीतकर अपना राज्य दूर-दूर तक फैला लिया| उसके तीन पुत्र ताराक्ष, कालकाक्ष तथा विद्युतकाली हुए| इन तीनों ने देवलोक पर विजय पाने के लिए तप के नियमों का पालन करते हुए पितामह ब्रह्मा की कठोर तपस्या की|

उनके दृढ़ संकल्प तथा तपोबल को देखते हुए ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और प्रकट होकर कहा – “तारक पुत्रो! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं| इच्छित वर मांगो|”

ब्रह्मा जी को साक्षात प्रकट हुआ देखकर तीनों ने उन्हें प्रणाम करके कहा – “भगवान! यदि आप हमारी तपस्या से प्रसन्न हैं तो हमें ऐसा वर दीजिए कि हम तीनों अलग-अलग पुर (नगर) बसाकर उस नगर समेत अंतिरक्ष, आकाश तक किसी लोक में जहां चाहें भ्रमण कर सकें तथा जब तक वे नगर मिलकर एक न हो जाएं तथा एक ही बाण से कोई उन्हें बेध न दे, तब तक न तो वे नगर नष्ट हों, न नगरवासी और न ही हमारी मृत्यु हो|”

ब्रह्मा जी ने कहा – “तथास्तु! ऐसा ही होगा|” ऐसा कहकर ब्रह्मा जी अंतर्धान हो गए|

ब्रह्मा जी से ऐसा वर पाकर वे तीनों दैत्य बड़े प्रसन्न हुए तथा अपने पिता त्रिपुरासुर को अपने वरदानी होने की बात बताकर असुरों के शिल्पी मय दानव को तीन पुर बनाने का आदेश दिया| मय ने अपने शिल्प तथा माया से तीन नगर – एक सोने का, एक चांदी का तथा एक लोहे का बनाया| तीनों पुर बन जाने पर एक पुर देवलोक, एक पुर मृत्युलोक और एक पुर पाताल लोक में उन तीनों पुत्रों ने स्थापित किए| तीनों पुरों का स्वामी हो जाने पर उनका पिता त्रिपुरासुर कहलाया|

इस प्रकार तीनों दैत्यों ने अपने बल तथा मायावी कौशल से तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया| युद्ध में उनका किसी प्रकार नाश नहीं हो सका था| वरदान के मद में चूर होकर वे तीनों लोकों में अत्याचार करने लगे| ऋषियों-ब्राह्मणों के आश्रम नष्ट कर दिए गए| देवगण प्राण बचाकर इधर-उधर छिपने लगे| त्रिपुरासुर तीनों लोकों में अपने वरदानी पुत्रों के साथ उत्पात मचाता रहा| उनके वरदानी नगर अभेद्य थे|

जब बचने का कोई उपाय नहीं रहा तो ऋषि और देवता प्रजापति ब्रह्मा के पास गए और उन दैत्यों के उत्पात तथा अत्याचार की कहानी बताते हुए कहा कि असुरों की आदतों को जानते हुए भी आप इन्हें इस तरह का वरदान दे देते हैं कि हम सबका जीना और रहना दूभर हो जाता है| अब इस संकट से मुक्ति का उपाय भी बताएं|”

देवों-ऋषियों का कष्ट सुनकर ब्रह्मा जी भी दुखी हुए और कहा – “अपने दिए वर का फल मैं भुगत रहा हूं| मेरे प्रति भी अपराध करने से वे चूक नहीं रहे हैं| अब उनका नाश करने के लिए केवल महादेव शिव ही समर्थ हैं| चलकर उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि इस संकट से वे ही उद्धार करें|”

सब मिलकर कैलाश स्थित भगवान शिव के निवास पर गए| देवता-ऋषियों तथा ब्रह्मा को एक साथ आया देखकर शिव बड़े प्रसन्न हुए| सबका आदर-सत्कार कर आने का कारण पूछा|

ब्रह्मा ने कहा – “सर्वेश्वर! तीनों लोकों पर संकट आ पड़ा है| त्रिपुरासुर के तीन पुत्रों को मैंने एक अमोघ वर दे दिया है| आपके सिवा कोई भी इस संकट से उद्धार नहीं कर सकता| उन तीनों पुरियों के एक साथ मिलने पर तथा एक ही बाण से उन्हें ध्वस्त करने पर इस संकट से मुक्ति मिलेगी|”

शिव ने कहा – “पितामह! जन कल्याण के लिए धनुष मैं धारण करूंगा| आप अपनी तथा देवों की सामूहिक शक्ति तथा तेज से एक दिव्य रथ तथा धनुष-बाण तैयार करें| मैं त्रिपुरासुर का उसके पुत्रों, नगरों तथा सैनिकों समेत संहार करूंगा|”

ऋषि-देवता और ब्रह्मा यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए| देव-शिल्पी विश्वकर्मा ने एक दिव्य रथ तैयार किया| विष्णु, चंद्रमा तथा अग्नि ने बाणों को अपना तेज दिया| वरुण, यम, कुबेर आदि लोकपालों ने रथ के अश्वों को अपनी शक्ति दी| अथर्वा, अंगिरा आदि ऋषियों ने रथ-चक्रों को अपना तेज दिया| वायु ने रथ को वेग शक्ति दी| इस प्रकार देवों तथा ऋषियों की सम्मिलित शक्ति तथा तप-तेज से तैयार रथ पर भगवान शिव दिव्य धनुष बाण के साथ ब्रह्मादंड, रूद्रदंड तथा कालदंड लेकर बैठे|”

शिव ने कहा – “अब इस रथ का सारथि कौन बनेगा?”

देवों ने कहा – “देवेश्वर महादेव! आप आज्ञा दीजिए, जिसे कहेंगे वही सारथि बनेगा|” वही त्रय देवों के आदिदेव प्रजापति ब्रह्मा जी रथ का सारथ्य स्वीकार करें| इन्हें ही पता है कि किस कौशल से रथ को कहां ले चलना है|”

देवों ने संपूर्ण लोकों के सृष्टा प्रजापति ब्रह्मा को शिव के रथ का सारथी बनाया| भगवान शिव का रथ आकाश मंडल में उड़ चला| शिव के प्रलयंकारी अस्त्रों-शस्त्रों के प्रभाव से जब त्रिपासुर की तीनों पुरियां अलग-अलग नष्ट होने लगीं तो तीनों अपनी तथा अपने नगरों की रक्षा के लिए भूमंडल पर एकजुट होकर शिव का सामना करने लगे| ब्रह्मा ने उन तीनों को एक साथ एकजुट होते देखा तो रथ को बड़े वेग से संयुक्त पुरों के सामने कर दिया और भगवान शिव से कहा – “सर्वेश्वर! त्रिपुरासुर के समूल वंश नाश का अवसर आ गया है| तीनों पुर इकट्ठे होकर आपका सामना कर रहे हैं| अब आप शर-संधान कीजिए और इन असुरों को मारकर त्रैलोक्य की रक्षा कीजिए|”

शिव ने देखा कि त्रिपुरासुर अपने पुत्रों तथा समस्त आसुरी-सेना के साथ अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार कर रहा है| शिव ने अपने धनुष की प्रत्यंचा खींची और पाशुपत अस्त्र चढ़ाकर जो छोड़ा तो प्रलयंकारी रथ के साथ पुरों से टकराया| पाशुपत अस्त्र से त्रिपुरासुर अपने पुत्रों तथा नगर समेत भस्म हो गया|

यह देखकर ऋषियों तथा देवताओं ने भगवान शिव का जयघोष किया| तीनो लोकों में शांति स्थापित हो गई|

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