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विश्वरूप का वर्णन (अध्याय 11 शलोक 9 से 13)

विश्वरूप का वर्णन (अध्याय 11 शलोक 9 से 13)

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 9

संजय उवाच (Sanjay Said):

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥11- 9॥

Hयह बोलने के बाद, हे राजन, महायोगेश्वर हरिः ने पार्थ को अपने परम ऍश्वर्यमयी रुप का दर्शन कराया।

EAfter speaking thus, O King, the Lord-the great master of yog-revealed his supreme, omnipresent form to Arjun.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 10, 11
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥11- 10॥

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्॥11- 11॥

Hअर्जुन ने देखा कि भगवान के अनेक मुख हैं, अनेक नेत्र हैं, अनेक अद्भुत दर्शन (रुप) हैं। उन्होंने अनेक दिव्य अभुषण पहने हुये हैं, और अनेकों दिव्य आयुध (शस्त्र) धारण किये हुये हैं। उन्होंने दिव्य मालायें और दिव्य वस्त्र धारण किये हुये हैं, दिव्य गन्धों से लिपित हैं। सर्व ऍश्वर्यमयी वे देव अनन्त रुप हैं, विश्व रुप (हर ओर स्थित) हैं।

EAnd (Arjun beheld before himself) the infinite, allpervading God with numerous mouths and eyes, many wondrous manifestations, decked with various ornaments, carrying many weapons in his hands, wearing celestial garlands and apparel, anointed with heavenly perfumes, and endowed with all kinds of wonder.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 12
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥11- 12॥

Hयदि आकाश में हज़ार (सहस्र) सूर्य भी एक साथ उदय हो जायें, शायद ही वे उन महात्मा के समान प्रकाशमयी हो पायें।

EEven the light of a thousand suns in the sky could hardly match the radiance of the omnipresent God.
सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता - अध्याय 11 शलोक 13
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥11- 13॥

Hतब पाण्डव (अर्जुन) ने उन देवों के देव, भगवान् हरि के शरीर में एक स्थान पर स्थित, अनेक विभागों में बंटे संपूर्ण संसार (कृत्स्न जगत) को देखा।

EPandu’s son (Arjun) then saw in the body of Krishn, the God of gods, the many separate worlds together.

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Munish Ahuja Founder SpiritualWorld.co.in

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